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हिंदू सम्मेलनों के द्वारा साकार होता समरस भारत का विराट स्वरुप 

प्रवीण दुबे

आरएसएस शताब्दी वर्ष शुरु होने से पूर्व जब  संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने प्रेस को सम्बोधित करते हुए कहा था कि संघ अपने100 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में देश भर में एक लाख से ज्यादा ‘हिंदू सम्मेलन’ या ‘धर्मसभाएं’ आयोजित करेगा तो अपनी आदत के अनुसार वामपंथी विचारों वाले मीडिया पर्सन ने इसपर न केवल आश्चर्य व्यक्त किया था बल्कि इसे हवा हवाई घोषणा भी निरुपित किया था। लेकिन आज पूरे देश की हर गली मोहल्ले बस्ती बाजार में हिंदू सम्मेलनों की बहार दिखाई दे रही है बल्कि सम्पूर्ण हिंदू समाज इन हिंदू सम्मेलनों के माध्यम से समरस दिखाई दे रहा है।

जैसा कि संघ ने संकल्प लिया था वह देशभर में चहुओर साकार हो उठा है इन ‘हिंदू सम्मेलनों’ का मुख्य उद्देश्य ‘पंच परिवर्तन’, हिंदुत्व का विस्तार, ‘कुटुंब प्रबोधन’, ‘सामाजिक समरसता’ और सामाजिक मुद्दों पर चर्चा को बढ़ावा देना तय है।” और यह पंच परिवर्तन इन हिंदू सम्मेलनों के माध्यम से समग्र हिंदू समाज तक पहुंच रहे हैं और पूरा हिंदू समाज अपने जीवन में इन्हें अंगीकार करने की ओर अग्रसर होता दिख रहा है।

जैसे कि अभी तक जानकारी मिल रही है उसके मुताबिक  सप्ताह भर में ही देश के हजारों स्थानों पर हिंदू सम्मेलन आयोजित किए जा चुके हैं ओर इसमें लाखों की संख्या में सनातन समाज शामिल हुआ है कई स्थानों पर संख्या थोड़ी कम तो अधिकांश बस्तियों में घर घर से सनातन परिवारों ने उत्सव जैसा माहौल निर्मित करके हिंदू सम्मेलनों में सहभागिता की है बताना उपयुक्त होगा कि अभी यह क्रम लगातार एक पखवाड़े तक जारी रहने वाला है।

समरसता और सांस्कृतिक पुनर्जागरण

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपनी स्थापना के उपलक्ष्य में जारी कार्यक्रमों की कड़ी में हिंदू सम्मेलनों के आयोजन    से समरसता और सांस्कृतिक पुनर्जागरण के काम में लगभग सफल होता दिखाई दे रहा है। इन सम्मेलननों में समरसता और सांस्कृतिक पुनर्जागरण के माध्यम से भारत को विश्वगुरु बनाने की दिशा में  बढ़ने के साथ साथ राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाने हेतु समरस हिंदू समाज को तैयार करना  जिसमें जाति-भेदभाव मिटाकर एकता, आत्मनिर्भरता, और अपनी जड़ों से जुड़ने पर जोर दिया जा रहा है, ताकि एक मजबूत और अनुशासित हिन्दू समाज का निर्माण हो सके।

 समाज में व्याप्त भेदभाव को दूर करना और सभी वर्गों के बीच समानता व सहयोग स्थापित करना, विशेषकर धर्मांतरण जैसी चुनौतियों का सामना करना। स्वदेशी, सामाजिक सेवा और जनभागीदारी के माध्यम से आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को प्राप्त करने में समाज की भूमिका सुनिश्चित करना।

ये सम्मेलन एक ऐसे सशक्त, अनुशासित और एकीकृत हिन्दू समाज के निर्माण में सफल होते दिखाई दे रहे हैं जो भारत के सांस्कृतिक गौरव और राष्ट्रीय उन्नति में योगदान दे सकेगा।

दिखाई दे रहे हैं अनूठे दृश्य 

 देशभर में आयोजित किए जा रहे हिंदू सम्मेलनों में ऐसे अनूठे दृश्य दिखाई दे रहे हैं जो इस बात को सत्यापित करते हैं कि इस देश ने आजतक अपनी राम ओर सबरी की समरस परम्पराओं को नहीं छोड़ा है,इन हिंदू सम्मेलनों में मंच से लेकर आमंत्रित सनातन समाज तक तथा भोजन प्रसादी निर्माण से लेकर उसे ग्रहण करने वाले श्रद्धालुओं तक न कोई छोटा न कोई बड़ा न कोई अगड़ा न कोई पिछड़ा न कोई ऊंच न कोई नीच सभी समरस दिखाई देते हैं।

 

पिछड़ी बस्तियों से लेकर वंचित समाज भी साथ

 

हिंदू सम्मेलन ऐसे स्थानों बस्तियों में भी आयोजित हो रहे हैं जिन्हे सामान्य बोलचाल की भाषा में पिछडी बस्ती बोला जाता है वंचित समाज पूरे स्नेह भाव से हिंदू सम्मेलनों को सफल बनाने अपनी सहभागिता दिखाता नजर आ रहा है।

 

  स्वक्छता वीरों का सम्मान ओर पैर पूजने जैसे दृश्य

 

हिंदू सम्मेलनों में कुछ दृश्य भावुक करने वाले भी दिखाई दे रहे हैं  सफाई कर्मियों को स्वक्छता वीरों की उपाधि से सम्बोधित करके उन्हें सम्मानित किया जा रहा है उन्हें हिंदू सम्मेलन आयोजन समितियों में आदरपूर्वक स्थान दिया गया है निःसंदेह संघ ने अपने शताब्दी वर्ष के इन आयोजनों से समरस हिंदू समाज को एकाकार करने का बड़ा संदेश देने में सफलता हासिल की है।

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