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हिंसा रोकने में नाकामयाब रहा पुलिस प्रशासन अब पैदा कर रहा है भय का वातावरण

 

हिंसा के पांच दिन बाद मुख्य सचिव और डीजीपी को क्यों याद आये ग्वालियर भिंड मुरैना

अब 10 अप्रैल के बन्द ओर अम्बेडकर व परशुराम जयंती पर प्रशासन खड़ा कर रहा है हौव्वा

हिंसा में मरे लोगों के समर्थकों की जारी हैं संदिग्ध गतिविधयां, प्रशासन बैठकों की खानापूर्ति में है व्यस्त


           प्रवीण दुबे

2 अप्रैल के भारत बंद को लेकर मध्यप्रदेश के पुलिस प्रशासन की निष्क्रियता का खामियाजा सभी भुगत चुके हैं ,अब पिछले दो दिनों से प्रदेश के उच्च प्रशासनिक पदों पर आसीन नोकरशाही इस जातिगत तनाव के वक़्त जिस नासमझी से काम कर रही है उससे ग्वालियर अंचल में आगामी 10,14 व 18 अप्रैल को लेकर भय का वातावरण निर्मित हो गया है।

उल्लेखनीय है कि 2 अप्रैल की जातिगत हिंसा का पूर्वानुमान लगाने और उसे नियंत्रित करने में ग्वालियर अंचल के सभी जिलों का पुलिस प्रशासन पूरी तरह से नकाम रहा था। परिणाम सबने देखा हिंसाचार में लिप्त लोगों ने घरों के भीतर तक घुस  घुस कर मारपीट, महिलाओं के साथ अभद्रता आदि को अंजाम दिया , तमाम लोगों की जान तक चली गयी। यदि शहरवासियों ने आत्मरक्षा के लिए अपने हथियार नहीं थामे होते तो हिंसक भीड़ ओर अधिक जानमाल की हानि पहुंचा सकती थी।
इस घटनाक्रम के बाद पुलिस प्रशासन ने अपनी नाकामी का ठीकरा बड़ी चतुराई से अंचल की जनता पर फोड़ते हुए यह कहकर इंटरनेट सेवाएं बन्द करा दीं की सोशल मीडिया इस  हिंसाचार के लिए जिम्मेदार हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि सोशल मीडिया इसके लिए जिम्मेदार है तो पुलिस प्रशासन समय रहते हाथ पर हाथ धरे क्यों बैठा रहा। वह क्या 2 अप्रैल को माहौल बिगड़ने का इंतजार कर रहा था ?
2 अप्रैल की हिंसा के बाद मध्यप्रदेश की उच्च नोकरशाही जिस प्रकार का रवैया अख्तियार किये  हुए है वह भी आश्चर्य में डाल देने वाला है। विडम्बना देखिए कि हिंसा को हुए पांच दिन बाद हमारे मुख्य सचिव बसन्त प्रताप सिंह और डीजीपी ऋषी कुमार शुक्ला को ग्वालियर भिंड मुरैना की याद आती है। उन्हें यह याद आता है कि वहां भीतर ही भीतर आग सुलग रही उन्हें इस बात की भी सुध आती है कि वैमनस्यता की आग को ठंडा करने में उच्च प्रशासनिक अधिकारी भी बड़ी भूमिका निभा सकते हैं।
लेतलाली का आलम यह है कि 2 अप्रैल की जातिगत हिंसा में कई बड़े पुलिस अधिकारियों पर हमले , उच्च  अधिकारियों यहां तक कि निगम आयुक्त के घर पर हमला, इतना ही नहीं प्रदेश सरकार के मंत्री के घर हमला पथराव आगजनी ओर मुरैना भिंड ग्वालियर में कई की मौत, करोड़ों की सम्पत्ति का नुकसान ओर लगातार जारी कर्फ्यू के बावजूद हमारे प्रदेश के मुख्य सचिव और डीजीपी को हिंसा की आग में जलते ग्वालियर अंचल की याद पांच दिन बाद आती है। वह भी तब जब दिल्ली का गृह मंत्रालय इनकी अकर्मण्यता पर इन्हें  लताड़ लगाता है।
 
जैसा कि हमने शुरआत में लिखा है कि 2 अप्रैल के भारत बंद के दौरान भड़की पूर्वनियोजित हिंसा को भांपने में पूरी तरह नाकामयाब रही उच्च नोकरशाही अब भी समझदारी से काम लेती नहीं दिखाई दे रही। सोशल मीडिया पर माहौल गन्दा करने का आरोप लगाने वाला पुलिस प्रशासन माहौल को भयमुक्त बनाने के बजाए अपनी सरकारी सोशल साइटों के सहारे आगामी 10 अप्रैल के बन्द 14 अप्रैल की अम्बेडकर जयन्ती ओर 18अप्रेल की परशुराम जयन्ती को लेकर भयपूर्ण स्थिति निर्मित कर रहा है।
यह अच्छी बात है कि इन तारीखों की संवेदनशीलता को लेकर उच्च प्रशासनिक मशीनरी सतर्क रहे लेकिन सरकार तंत्र जिस प्रकार बन्द को लेकर बैठक कर रहा है। सार्वजनिक रूप से दिशा निर्देश जारी किए जा रहे हैं। यहां तक कि 10अप्रैल के बन्द को लेकर डेढ़ दर्जन जिलों को सम्वेदनशील घोषित कर दिया गया है। यह भी खबर आ रही है कि एक बार पुनः इंटरनेट सेवायें रोक दीं जाएंगी । स्कूलों में छुट्टी किये जाने पर भी पुलिस प्रशासन विचार कर रहा है इसके अलावा और भी न जाने क्या क्या ।
आखिर यह कैसा तमाशा है ?  सबसे बड़ा सवाल यह है  कि पुलिस प्रशासन जिस बन्द को लेकर इतनी तैयारी में है वह आखिर किसने बुलाया है ? इसमें कौन लोग कौन संगठन शामिल हैं प्रशासन के पास इसका जवाब नहीं। फिर यह भय क्यो पैदा किया जा रहा है ? जब यह पता है कि अंचल में जातिगत सौहार्द्र बिगड़ा हुआ है लोग डरे सहमे है फिर ऐसे समय जनता को भयमुक्त करना ज्यादा जरूरी है या भयग्रस्त करना।
अच्छा यह होता पुलिस प्रशासन चुपचाप अपने ख़ुफ़िया तंत्र के सहारे काम करे और ऐसे तत्वों का पता लगाकर उनपर कार्यवाही करे जो 10 अप्रैल ओर अम्बेडकर जयन्ती परशुराम जयंती की आड़ में वातावरण गन्दा कर अंचल में भय निर्मित करने का षडयंत्र रच रहे हैं।
 
मूर्ति लगाने की तैयारी
2अप्रैल के भारत बंद के दौरान हिंसा की चपेट में आकर मौत का शिकार हुए वर्ग विशेष के लोगों ने अब इन मौतों पर भी राजनीति शुरू कर दी है। सूत्रों का कहना है कि ग्वालियर के कुछ विशेष स्थानों पर इन मौतों को लेकर गतिविधियां तेज कर दी हैं। यह भी जानकारी मिल रही है कि मौत का शिकार हुए लोगों को शहीद बताकर उनकी मूर्ती स्थापित करने  की बात की जा रही है इसके लिए बाकायदा धन संग्रह किया जा रहा है जिसमें बड़े स्तर पर वर्ग विशेष के लोग सरकारी कर्मचारी प्रोफेसर आदि सहयोग कर रहे है । सूत्रों की मानें तो हिंसा में मरे दो लोगों की मूर्तियां बनाने का ऑर्डर भी दिया जा चुका है।
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