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जयारोग्य के गुमनाम पत्र में संघ व भाजपा का नाम घसीटे जाने से चढ़ी त्योरियां, मास्टरमाइंड का पता लगाने गुपचुप सर्वे

ग्वालियर /गजराराजा चिकित्सा महाविद्यालय व उससे सम्बंधित जयारोग्य चिकित्सालय में गुमनाम पत्र के बाद अब ग्वालियर से लेकर भोपाल तक मामला गर्माया हुआ है । इस पत्र में जिस प्रकार से एक पूर्व सहायक अधीक्षक को टार्गेट करके जो कुछ भी लिखा गया है  राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर भी छींटा कसी की गई है उससे सत्ता व संगठन में दमदार छवि रखने वाले लोगों की त्योरियां चढ़ गई हैं। सूत्रों का कहना है की अब इस पत्र में लिखीं बातों व जयारोग्य चिकित्सालय समूह की अंदरूनी राजनीति का अपने स्तर पर पोस्टमार्टम प्रारंभ कर दिया गया है। यह कार्यवाही इतने गुपचुप ढंग से की जा रही है कि इसकी किसी को भी कानों कान खबर  नहीं है।

उल्लेखनीय है की जिस पत्र ने सत्ता और संगठन में तमाम लोगों के होश उड़ाए हुए हैं उसमें निशाने पर लिए डॉक्टर के भाजपा व संघ के शीर्ष माने जाने वाले क्रमशः संगठनमंत्री व प्रचारक सहित सरकार के मंत्रियों से सीधे सहयोग की बात उल्लेखित की गई है। 
जैसा की माना जा रहा है और पत्र की शब्दावली भी यह इशारा कर रही है की यह सब कुछ  अस्पताल के महत्वपूर्ण पदों पर तैनाती की बौद्धिक जंग का हिस्सा है। बावजूद इसके  एक सरकारी संस्थान में सत्ताधारी दल से लेकर आरएसएस को बीच में लाने का सार्वजनिक दुःसाहस करने की जो बात पत्र के माध्यम से की गई है वो बेहद गम्भीर होने के साथ छवि खराब करने वाली भी है। 
इस पत्र को जिसने भी तैयार किया है उसने इस बात का कदापि ध्यान नहीं रखा है की वो जिस भाजपा व संघ को पत्र में घसीट रहा है वर्तमान में न केवल उसकी सरकार है बल्कि संघ इस तरह की व्यक्तिवादी सोच  के तहत न तो काम  करता है न गलत कार्यों को संरक्षण देता है। 
ऐसी स्थिति में अब भाजपा खासकर संघ के लिए। यह पता लगाना बेहद जरूरी हो गया है की आखिर इसके पीछे का सच। क्या है ?
 वैसे गजराराजा चिकित्सा महाविद्यालय और उससे सम्बंधित जयारोग्य चिकित्सालय समूह के पिछले डेढ़ दशक के इतिहास पर नजर डाली जाए तो इस बात से कदापि इंकार नहीं किया जा सकता की यहां के प्रबंधकीय पदों पर कब्जे की जंग कोई नई बात नहीं है । चीकित्सा शिक्षा विभाग के नियम चाहे  जो भी हों यहां उन्हें बलाए ताक रखकर लोगों की नियुक्तियां कराई जाती रही हैं। पैसे और राजनीतिक वजूद के चलते यहां
बाबू भी अधीक्षक जैसे पद पर काबिज रह चुका है और जिन पदों का प्रावधान भी नहीं है वो केबिनेट के द्धारा निर्मित किए जाते रहे हैं।
 स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के चिकित्सकों ने डेपुटेशन पर जयारोग्य में न केवल वर्षों वर्ष नोकरी की बल्कि प्रबंधकीय पद भी हथियाए । 
 इसके पीछे का सच बेहद काला है । लेकिन यह सब चुपचाप पर्दे के पीछे चलता रहा जिसे सत्ता और लक्ष्मी के आशीर्वाद से पद मिला उसने मजे किए और जिसे नहीं मिला वो मन मसोस कर अपनी बारी आने का
इंतजार करता रहा लेकिन किसी ने इतनी हिम्मत नहीं जुटाई की सत्ता और संगठन से सेटिंग के इस गोरखधंधे को लिपिबद्ध करके सार्वजनिक कर सके। 
वर्तमान में जो पत्र दौड़ रहा है अब सबसे बड़ी परेशानी इसी बात की है की आखिर यह हिम्मत किसने दिखाई ? कौन है इसका मास्टरमाइंड ?
 शायद इसी लिए अब ग्वालियर से लेकर भोपाल तक माहौल सरगर्म है देखना दिलचस्प होगा की जिन लोगों को यह सच पता लगाने की जिम्मेदारी दी गई है वे इसे  सामने लाने का साहस दिखा पाएंगे या फिर इस सारे अध्याय को यहीं दबाने की तरकीब निकाली जाएगी। 
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