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क्या ग्वालियर चम्बल की तीन सीटों पर भाजपा की नईया पर लगा पाएगा मोदी फेक्टर ?

अपनी आक्रामक चुनाव शैली से विपक्ष के मंसूबों को तार तार करने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी  की 6 मई को ग्वालियर में होने वाली चुनावी सभा के बाद क्या वास्तव में मुकाबला एक तरफा हो जाएगा ?

 

यह बात हम नहीं कह रहे बल्कि प्रदेश के तमाम भाजपा नेताओं का ऐसा मानना है। पार्टी के प्रदेश प्रभारी स्वतंत्र देव सिंह पिछले दो दिनों से ग्वालियर में डेरा डाले हुए हैं चिलचिलाती धूप और सांय सांय करती लपट के बीच मंगलवार को जब वे सभास्थल का मौका मुआयना कर रहे थे तो उनकी बॉडी लैंग्वेज साफ तौर पर यह इशारा करती दिखाई दे रही थी की 12 मई के मतदान से मात्र पांच दिन पूर्व भाजपा ग्वालियर अंचल के चुनावी युद्ध को मोदी रूपी ब्रम्हास्त्र से एक तरफा बनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ना चाहती है।

 

यही वजह है कि पार्टी ने इस सभा के लिए वातावरण निर्माण हेतु अपने पूरे घोड़े खोल दिये हैं। सूत्र बताते हैं कि एक ओर प्रदेश प्रभारी यहां डेरा डाले हुए हैं तो दूसरी ओर पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमितशाह ने मंगलवार को अपने मुरैना दौरे के दौरान केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह से प्रधानमंत्री की चुनावी सभा को लेकर गूढ़ चर्चा की।

 

उल्लेखनीय है कि नरेन्द्र मोदी की चुनावी सभा को ग्वालियर में आयोजित करने के पीछे पार्टी की सीधी सीधी रणनीति यही है कि यहां से तीन लोकसभा सीटों पर मोदी का लाभ लेना चाहती है। यही वजह है कि तीनों लोकसभा के प्रत्याशी सहित पूरे अंचल की जनता को सभा में लाने का निर्णय लिया गया है।

 

जहांतक ग्वालियर चम्बल अंचल में भाजपा की चुनावी स्थिति और मोदी की आमसभा का सवाल है तो अब जबकि चुनाव प्रचार लगभग प्रथम चरण समाप्त हो चुका है भाजपा यह कतई नहीं कह सकती की मामला पूरी तरह उसके नियंत्रण में है। मोदी की सभा जिन तीन लोकसभा सीटों पर सीधा प्रभाव डालने वाली है उनका अलग अलग आंकलन किया जाए तो तीनों ही सीटों पर दिन प्रतिदिन समीकरण बदलते दिखाई दे रहे हैं यह सच है कि तीनों ही सीटों पर स्थानीय मुद्दों की जगह मोदी फैक्टर हावी है। लेकिन यहां के राजनीतिक स्वभाव में रचा बसा जातिगत फैक्टर किसी भी अन्य मुद्दों पर भारी पड़ने की ताकत रखता है। यही वजह है कि अंचल में तेजी से जारी जोड़ तोड़ की राजनीति के साथ आयाराम गयाराम के खेल ने राजनीतिक पण्डितों के चुनावी गणित को लगातार असमंजस में डाल रखा है।

 

इन तीन सीटों में जहां ग्वालियर सीट पर फिलहाल कड़ा मुकाबला दिखाई दे रहा है लेकिन कांग्रेस प्रत्याशी का दिग्विजयसिंह गुट से सम्बंधित होना उसके लिए बड़ी समस्या बनता दिखाई दे रहा है। यह बात अलग है कि भाजपा प्रत्याशी के रणनीतिकार इस बात पूरा फायदा उठाने में सफल होते दिखाई नहीं दे रहे । भाजपा के लिए सबसे बड़ी मुश्किल पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं यहां तक कि संघ से जुड़े लोगों का जीत के प्रति अतिआत्मविश्वास होना है। यह लोग मोदी लहर को प्रभावी मानकर जीत के प्रति पूर्ण आशान्वित नजर आ रहे हैं जिस वजह से कार्यकर्ता नेता फील्ड से गायब हैं यह स्थिति किसी भी प्रत्याशी के लिए खतरनाक संकेत कहे जा सकते हैं। हालांकि संघ से जुड़े एक बड़े पार्टी नेता जो कि ग्वालियर से ही सम्बन्धित हैं पूरे संगठन  की ताकत को झोंकने में जुटे हैं। इसका कितना प्रतिफल प्राप्त होगा यह तो समय ही बताएगा।

 

अंचल की एक और महत्वपूर्ण सीट मुरैना है। यहां मोदी केबिनेट के दमदार चेहरा रहे मध्यप्रदेश के कद्दावर नेता नरेंद्र तोमर मैदान में हैं। जिज़ समय ग्वालियर से पलायन करके उन्होंने मुरैना से लड़ने का मन बनाया था तब से तुलना की जाए तो आज स्थिति थोड़ी बेहतर हुई है बसपा से चुनाव मैदान में उतर रहे एक बड़े नेता रामलखन सिंह को नरेंद्र तोमर ने मैनेज करके चुनावी गणित को मोड़ने का प्रयास किया लेकिन यहां सिकरवारों के एक दमदार नेता वृंदावन सिंह ने कांग्रेस का दामन थामकर नरेंद्र सिंह की राह को फिर कठिन बना दिया है। सोमवार को पार्टी अध्यक्ष अमितशाह की मुरैना में आमसभा थी लेकिन उम्मीद से कम भीड़ ने कई सवालों को जन्म दिया है।

 

अंचल की एकमात्र भिंड सीट ऐसी है जहां भाजपा सबसे मजबूत स्थिति में दिखाई दे रही है। बसपा छोड़कर कांग्रेस में आए देवाशीष  यहां प्रभाव छोड़ने में असफल नजर आ रहे है। यहां भी सिंधिया गुट देवाशीष के प्रचार में सक्रिय दिखाई नहीं दे रहा। देवाशीष की दलबदलू छवि और राष्ट्रीय मुद्दों पर उनके व्यक्तित्व की तुलना कन्हैया कुमार जैसे देशघाती नेताओं से करने में सफल रही भाजपा को इसका पूरा लाभ मिल रहा है।

 

कुल मिलाकर भाजपा इस बात से पूरी तरह से आशान्वित है कि मोदी के प्रवास के बाद भगवा लहर अंचल के वोटरों के दिलोदिमाग पर छा जाएगी लेकिन इसके साथ ही भाजपा को यह भी ध्यान रखना होगा कि विधानसभा चुनाव के दौरान अभी छह माह पूर्व भी मोदी की ग्वालियर में सभा हुई थी लेकिन जनता ने उनकी अपील को नकार दिया था परिणाम सबको पता है। हालांकि विधानसभा ओर लोकसभा चुनाव में अंतर होता है लोकसभा चुनाव केंद्र सरकार के कार्यों और नीतियों पर लड़ा जाता है जिसमें निश्चित ही मोदी फैक्टर अपना काम करेगा। लेकिन बावजूद इसके पार्टी नीतिनिर्धारकों को अति आत्मविश्वास की मनःस्थिति बनाए घर बैठे संघ व भाजपा से जुड़े नेताओं व स्वयंसेवको को बाहर निकालने की रणनीति बनाने की जरूरत है नहीं तो परेशानी खड़ी हो सकती है।

 

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