नवम्बर 2012 जब तत्कालीन मुरैना सांसद और
मध्यप्रदेश के क़द्दावर भाजपा नेता में शुमार अनूप मिश्रा प्रदेश सरकार के स्वास्थ्य और शिक्षा मंत्री हुआ करते थे तब उन्होंने सरकारी मंच से नोकरशाही को चेतावनी देते हुए कहा था कि में खादी वाला गुंडा हूं, मुझसे बड़ा गुंडा कोई नहीं यदि नहीं सुधरे तो किसी को छोडूंगा नहीं।
बात भले ही 5 वर्ष पुरानी है लेकिन आज इस कारण याद आ रही है क्यों कि आज अनूप मिश्रा सांसद होने के बावजूद मध्यप्रदेश की गुटीय राजनीति का शिकार बनकर निष्प्रभावी हो नोकरशाही से इतने परेशान हैं कि उन्हें अपनी अनदेखी के लिए मुख्यमंत्री को पत्र लिखना पड़ रहा है यहां तक कि उनको तवज्जो न देने वाले कलेक्टर को हटाने की मांग को लेकर भोपाल तक लामबन्दी करना पड़ रही है और अब तो हद हो गई उन्होंने योजनाओं के क्रियान्वयन पर ध्यान न दिए जाने को लेकर संसद में भी अपनी सरकार को आगाह करके सबको चोंका दिया है।
एक समय था जब मध्यप्रदेश ही नहीं दिल्ली तक अनूप मिश्रा के नाम की तूती बोला करती थी। चूंकी श्री मिश्रा पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी के भांजे हैं इस कारण अटलजी के सक्रिय रहते श्री मिश्रा ने अपने राजनीतिक कौशल का खूब लोहा मनवाया मध्यप्रदेश की राजनीति में अनूपजी के दबदबे का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जब यहां सत्ता परिवर्तन हुआ तो अनूप का नाम मुख्यमंत्री की दौड़ में शामिल नेताओं में शुमार था। यह बात अलग है कि वे मुख्यमंत्री नहीं बन सके लेकिन वे पहले उमाभारती फिर बाबूलाल गौर और यहां तक कि शिवराज केबीनेट में नंबर दो जरूर बने रहे इतना ही नहीं उन्हें उच्च नोकरशाही की नाक में नकेल डालकर जनता का काम कराने वाला कुशल प्रशाशनिक क्षमता का नेता माना जाता रहा।
श्री मिश्रा का ग्राफ उस समय नीचे आना शुरू हुआ जब पूर्व प्रधानमंत्री अटलजी खराब स्वास्थ्य के चलते पार्श्व में चले गए। दूसरी ओर श्री मिश्रा के निजी कॉलेज में हुई एक हत्या ने राजनीतिक रंग ले लिया इसने श्री मिश्रा की छवि को गहरा आघात पहुंचाया। इस बीच मिश्रा से राजनीतिक विद्वेश रखने वाले राजनीतिज्ञ उन्हें विधानसभा चुनाव के दौरान भितरवार विधानसभा क्षेत्र में घेरने में कामयाब रहे, पार्टी के ही एक भितरघाती को उनके खिलाफ चुनाव लड़ा दिया गया। परिणाम स्वरूप वे चुनाव हार गए।
हालांकि उनके राजनीतिक विरोधियों ने इसके बाद श्री मिश्रा का राजनीतिक जीवन समाप्त करने के उद्देश्य से उन्हें ग्वालियर से दूर मुरैना जैसी परेशानी वाली सीट से लोकसभा चुनाव लड़ने को मजबूर कर दिया। यह श्री मिश्रा का राजनीतिक कौशल ही था कि वे इस सीट से भी जीतकर आये और सांसद बन गए।
वे सांसद जरूर बन गए लेकिन भाजपा की अंतर्कलह श्री मिश्रा को राजनीतिक नेपथ्य में ले गई। अब जबकि विधानसभा चुनाव नजदीक हैं ,श्री मिश्रा ने जहां एक तरफ अपनी राजनीतिक मुखरता बढ़ा दी है वहीं वे ग्वालियर से विधानसभा चुनाव लड़ने का मन बनाते भी दिखाई दे रहे हैं।
पिछले दिनों एक ओर जहां उन्होंने ग्वालियर में अपने समर्थकों को संगठित करने अन्नकूट का आयोजन कर हलचल पैदा की वहीं कांग्रेस के पूर्व वयोवृद्ध नेता रहे रघुनाथ राव पापरीकर की प्रतिमा स्थापना से जुड़े एक कार्यक्रम में अनूप कांग्रेस के मुख्यमंत्री पद का चेहरा जोतिरादित्य सिंधिया के साथ मंच साझा करते दिखे। जिसमें जोतिरादित्य से उनकी नजदीकी वार्तालाप ने कई सारे सवालों को जन्म दे दिया।
अभी यह घटनाक्रम समाप्त भी नहीं हुआ था कि मुरैना में एक धरने पर अनूप के बगावती तेवर सामने आए यहां स्टापडेम ओर नहर बनाने की मांग को लेकर दिए जा रहे इस धरने पर जनसुनवाई करने पहुंचे अनूप ने यहां कलेक्टर ओर एस पी को भी साथ चलने को कहा। लेकिन यहां एक बार फिर अनूप को नीचा दिखाने राजनीति सामने आई और कलेक्टर एस पी धरने में नहीं पहुंचे।
नोकरशाही की इस हरकत पर अनूप ने मुरैना ग्वालियर से लेकर भोपाल तक मोर्चा खोल दिया । पहले अनूप ने कलेक्टर एस पी को हटाने मुख्यमंत्री को पत्र लिखा उसको तवज्जो न मिलने पर अब वे अपने तकरीबन 200 समर्थकों के साथ भोपाल जा पहुंचे । उन्होंने यहां मुख्यमंत्री से मिलकर अपने गुस्से का इज़हार करते हुए कलेक्टर एस पी को तुरंत हटाने की मांग की । अनूप के इस बगावती तेवर को देख बड़ी संख्या में अपनी अनदेखी से नाराज कार्यकर्ताओं का समर्थन उन्हें मिला यही वजह है कि अपने संसदीय क्षेत्र मुरैना मेें तमाम सरकारी योजनाओं का क्रियान्वयन न कििये जाने की बाात अनूप ने जोरदाार ढंग से संसद में उठाकर अपने इरादे साफ कर दिए हैं । अब यह देखना दिलचस्प होगा कि भाजपा और शिवराज इस विवाद में अनूप की मानते है या फिर एकबार फिर वे अनदेखी का शिकार होते हैं।