सम्पादकीय
एक समय था जब स्व राजमाता सिंधिया के बाद ग्वालियर अंचल में सबसे लोकप्रिय नेता यदि कोई था तो वह थे स्व. माधवराव सिंधिया और उन सिंधिया के सबसे निकट यदि कोई था तो वह थे बालेन्दु शुक्ला श्री शुक्ला को स्व सिंधिया के बालसखा का सम्बोधन प्राप्त था। दोनों की नजदीकियों का आलम यह था की श्री सिंधिया के कहने पर श्री शुक्ला ने एक झटके में बैंक की मैनेजरी को तिलांजलि देकर सिंधिया की सहायतार्थ राजनीति में प्रवेश किया था। कांग्रेस में श्री शुक्ला की राजनीतिक सफलता का आलम यह था की सत्ता और संगठन दोनों में ही उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा वे राज्य सरकार में सफल मंत्रियों में से एक रहे तो संगठन में प्रदेश अध्यक्ष जैसे शीर्ष पद को भी उन्होंने सुशोभित किया। लेकिन जैसा कहा जाता है ये राजनीति भी बड़ी अजीब है कब क्या रंग दिखाए किसी को नहीं मालूम। श्री शुक्ला के बालसखा चले गए और छोटे महाराज ने रिश्तों को तरजीह नहीं दी मन खटास से भर गया और कांग्रेस के इस कद्दावर नेता ने थाम लिया कमलदल का हाथ। यह सही है जबसे शुक्ला जी भाजपा में आए कभी भी उनके रिश्ते किसी से खराब होने की बात कभी भी सामने नहीं आई लेकिन यह भी उतना ही सच है की कांग्रेस के भीतर रहकर जो राजनीतिक ऊंचाई उन्होंने प्राप्त की थी वह भाजपा में उन्हें कभी प्राप्त नहीं हो सकी हालांकि वे एक आयोग के अध्यक्ष रहे साथ ही उन्हें पार्टी में वरिष्ठ नेताओं के बीच पूरा सम्मान प्राप्त था बावजूद इसके एक अनकही टीस हमेशा उन्हें सालती सी दिखाई देती थी भले ही उन्होंने कभी सार्वजनिक रूप से इसे प्रगट नहीं किया। यह टीस कितनी गहरी थी आज इसका अंदाजा स्वतः दिखाई दे गया जब उन्होंने भाजपा को छोड़कर एकबार पुनः कांग्रेस का दामन थाम लिया। ऐसा लगता है की जब ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भाजपा में आने की घोषणा की थी शायद तब ही बालेंदु शुक्ला की परेशानी बढ़ गई थी और तब ही उन्होंने खुद के बारे में मंथन चिंतन शुर कर दिया था। बड़े आश्चर्य की बात है की भाजपा के तमाम नेताओं को इस बात की भनक तक नहीं लगी और आज वे अपने पुराने दल में वापस लौट गए किसी बड़े नेता के राजनीतिक पाला बदलने के ऐसे भी साइडइफेक्ट हो सकते है यह बात भी समझने वाली है। हालांकि बालेंदु शुक्ला के कांग्रेस में जाने से भाजपा को कोई बड़ा नुकसान होगा ऐसा फिलहाल तो दिखाई नहीं देता लेकिन लगातार झटके पर झटके झेल रही कांग्रेस को कुछ राजनीतिक फायदा जरूर हो सकता है। पहला तो यह की उन्हें श्री शुक्ला के रूप में ग्वालियर से उपचुनाव के लिए एक अच्छा चेहरा मिल गया है दूसरा यह की संगठनात्मक रूप से ग्वालियर अंचल में टूट चुकी कांग्रेस के लिए सिंधिया विरोधी नेता मिल गया है जिसका उपयोग स्व माधवराव की याद दिलाकर ज्योतिरादित्य पर राजनीतिक हमला करने में किया जा सकता है।
खेर यह सारी बातें तो समय के गर्भ में छुपी हैं लेकिन ऐसे समय में जब यह कयास लगाए जा रहे थे की उपचुनाव से पहले ग्वालियर अंचल में ज्योतिरादित्य सिंधिया के समर्थक बड़ी संख्या में कांग्रेस से भाजपा में आएंगे बालेंदु शुक्ला ने इस कयास से ठीक उलट भाजपा से कांग्रेस में जाकर सभी राजनीतिक पंडितों को चोंका दिया है। इस घटनाक्रम ने इस बात के भी संकेत दिए हैं की असंतोष केवल कांग्रेस में ही नहीं भाजपा के भीतर भी है और समय रहते अगर इसे नहीं पहचाना गया और इसका समाधान नहीं किया गया तो पलायन के खतरे से इंकार नहीं किया जा सकता है।