सम्पादकीय
हमारे प्यारे अटल
देश के दुलारे अटल
राजनीति के ध्रुव तारे
वास्तव में चमकते सितारे थे अटल
एक ऐसा व्यक्तित्व जिसका जितनी भी कसौटियों पर आंकलन किया जाए हर बार 24 कैरेट गोल्ड ही निकलकर आता है, निःसन्देह उनका जीवन चरित्र वो आदर्श प्रस्तुत करता है जिसे न भूतो न भवष्यति की संज्ञा दी जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होना चाहिए। वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की व्यक्ति निर्माण पाठशाला का वो चमकता हीरा थे जिसकी चमक से न केवल यह भरत भू बल्कि पूरी दुनिया में अपनी छाप छोड़ी।
एक स्वयंसेवक के रूप में उन्होंने संघ की उस उक्ति को कृतिरुप में चरितार्थ किया जिसमें कहा जाता है की संघ की एक घण्टे की शाखा पर हम जो संस्कार सीखते हैं वह हमारे दैनंदिन जीवन के 23 घण्टों में परिलक्षित होना चाहिए। अटलजी ने जिस क्षेत्र में भी काम किया अपनी अलग पहचान छोड़ी एक पत्रकार के रूप में उनके द्वारा लिखी गई सम्पादकीय आज भी लेखन की श्रेष्ठता को परिलक्षित करती हैं। साहित्यकार, कवि के रूप में अटलजी ने जिन रचनाओं को सृजन किया वे हर क्षेत्र में काम करने वाले व्यक्तियों का मार्गदर्शन करती दिखाई देती हैं। वास्तव में उनकी रचनाओं में ही अटलजी का असली व्यक्तित्व के दर्शन हमें होते है। उन्होंने लिखा है
हार नहीं मानूंगा, रार नई ठानूंगा,
काल के कपाल पे लिखता मिटाता हूं,
गीत नया गाता हूं.
काल के कपाल पे लिखता मिटाता हूं,
गीत नया गाता हूं.
इसके साथ ही वे अटलजी ही हैं जिन्होंने अपनी लेखनी के द्वारा पुनः पुनः दिया जलाने का संदेश देते हुए लिखा
आओ फिर से दिया जलाएँ
भरी दुपहरी में अँधियारा
सूरज परछाई से हारा
अंतरतम का नेह निचोड़ें-
बुझी हुई बाती सुलगाएँ।
आओ फिर से दिया जलाएँ
भरी दुपहरी में अँधियारा
सूरज परछाई से हारा
अंतरतम का नेह निचोड़ें-
बुझी हुई बाती सुलगाएँ।
आओ फिर से दिया जलाएँ
सामान्य व्यक्ति से लेकर राजनीतिक क्षेत्र में कार्य करने वालों के लिए इन पंक्तियों में किसी से रार न ठानने लेकिन अपने उद्देश्यों के प्रति हार न मानते हुए बारम्बार दीपक जलाने अर्थात नैराश्य को त्यागने का जबरदस्त सन्देश अटलजी हम सबको देकर गए हैं।
आज देश के जो हालात हैं उस समय अटलजी जैसा व्यक्तित्व बहुत याद आता है। कुछ दिन पूर्व ही अयोध्या में राममन्दिर निर्माण के लिए भूमिपूजन का कार्यक्रम हुआ,मुझे अच्छी तरह से याद है 6 दिसम्बर 1992 का वह दिन जब कारसेवकों ने अयोध्या के विवादित ढांचे को ढहा दिया था। उस समय पूरे देश में तनाव चरम पर था । भाजपा के तमाम बड़े नेता सकते में थे लेकिन वो अटलजी ही थे जिन्होंने सड़क से लेकर संसद तक अपने बुद्धि चातुर्य के सहारे दृढ़ता के साथ अपनी बात रखी और विरोधियों खासकर ऐसे लोगों जो की देश का वातावरण बिगाड़ना चाहते थे की बोलती बंद कर दी थी।
महत्वपूर्ण बात यह है की अटलजी ने अपनी व अपने संगठन की वैचारिक प्रतिबध्दता को भी पूरी तरह कायम रखा। वर्तमान में राममन्दिर भूमिपूजन वाले रोज भी कुछ कट्टरपंथी मुस्लिम ने देश का वातावरण खराब करने की कोशिश की आज अटलजी होते तो बहुत आहत होते और अपने ही अंदाज में इसका जवाब भी इन कट्टरपंथी मुल्लों को मिल गया होता।
अटलजी भीतर से जितने सह्रदय और भावुक थे उससे कहीं अधिक वे भारत की एकता अखंडता और सम्प्रभुता की रक्षा के लिए दृढ़ प्रतिज्ञ थे कारगिल युद्ध में दुश्मन देश को उन्होंने ऐसा सबक सिखाया था की आज तक पूरी दुनिया उसे याद करती है,वे अटलजी ही थे जिन्होंने अमेरिका जैसी महाशक्ति की चिंता किये बिना डंके की चोट पर न केवल परमाणु परीक्षण किया बल्कि उसके बाद अपनी राजनीतिक सूझबूझ से तमाम आर्थिक प्रतिबंधों को धराशायी भी किया। भारत का भाल उन्होंने नहीं झुकने दिया।
अटलजी की चर्चा हो और ग्वालियर का नाम न आए ऐसा तो सम्भव ही नहीं आज शिंदे की छावनी स्थित कमलसिंह के बाग की वह गली बेहद भावुक नजर आती है उनके पैतृक मकान को शिक्षा वाचनालय के लिए समर्पित कर दिया गया है । अटलजी यहीं पढे खेले और यहीं से वे संघ के प्रचारक निकले। राजनीति के उच्चतम शिखर को छूने के बावजूद वे जब भी ग्वालियर आते थे अपनों के बीच ऐसे घुलेमिले दिखाई देते थे जैसे ग्वालियर वालों के लिए वे वही पुराने अटलू हैं। दौलतगंज में फुटपाथ किनारे जमीन पर चूल्हा जलाकर मंगौड़े तलने वाली बूढ़ी अम्मा हों या फिर नया बाजार में देशी घी के लड्डू बनाने वाले बहादुरा हलवाई अथवा फालके बाजार के स्पेशल चूड़ा बनाने वाले नमकीन वाले , अटलजी न कभी उन्हें भूले न वे कभी अटलजी को भूल पाए। खाने के इतने शौकीन की ग्वालियर के मेले में पानी की टिकिया अटलजी को हमेशा यहां खींच कर लाती रही। बिना किसी पद प्रतिष्ठा की चिंता किये अलमस्त अटलजी ग्वालियर मेले में ऐसे रम जाते थे जैसे किसी भूले हुए राही ने पुनः सही रास्ता पकड़ लिया हो,और हम जैसे नोसिखिया पत्रकार यह दृश्य देख अपनी आंखों पर विश्वास नहीं कर पाते थे की राजनीति का अजातशत्रु इतना सहज सरल ओर शालीन भी हो सकता है।
भारत को सबसे आगे, ऊंचाई पर, दुनिया की अगुवाई करते देखने का सपना भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी की आंखों में पलता था. अपनी चिरपरिचित मुस्कुराहट, सौम्यता, शब्दों की विरासत और कई खट्टी मीठी यादों को पीछे छोड़ कर अनंत यात्रा पर जाते हुए यह पथिक एक संदेश भी देता है…
मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूं,
लौटकर आऊंगा, कूच से क्यों डरूं?
धन्य थे अटलजी आज द्वितीय पुण्य तिथि पर shabdshaktinews उन्हें अपनी सादर श्रद्धाजंलि अर्पित करता है।
9425187667