विश्व की सबसे बड़ी औधोगिक दुर्घटना में शामिल भोपाल गैस त्रासदी को कल रविवार को 33 वर्ष पूर्ण होने जा रहे हैं।दुर्घटना के लिए जिम्मेदार लोग आज या तो देश छोड़कर भाग गये और बहुत सारे अब इस दुनिया में नहीं हैं। इतने वर्ष बाद भी आज भी पीथमपुर में वो जहर भारत में मौजूद है। जिसने हजारों भोपालवासियों को मौत की नींद सुला दिया था । आश्चर्य की बात यह है कि पूरे देश में
स्वच्छता अभियान संचालित करने वाली केन्द्र सरकार ने भी आज तक इस जहरीले कचरे को साफ करने अथवा इसके निष्पादन की कोई योजना न तो तैयार की न इसमें कोई रुचि दिखाई।
दुनिया के सबसे बड़े औद्योगिक हादसों में शुमार भोपाल गैस कांड के 33 साल बाद भी यूनियन कार्बाइड कारखाने में 346 टन जहरीला कचरा मौजूद है। इस जहरीले केमिकल को नष्ट करने का निर्णय ही नहीं हो पा रहा है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर इंदौर के पास पीथमपुर में 10 टन कचरे का निष्पादन प्रयोग के बतौर किया गया, लेकिन इस कवायद का पर्यावरण पर कितना दुष्प्रभाव हुआ, इसकी रिपोर्ट का खुलासा होना बाकी है। बचे हुए जहरीले कचरे को कैसे ठिकाने लगाया जाए, इसे लेकर सरकार आज भी धर्मसंकट में है।
पर्यावरण से जुड़े इस बेहद संवेदनशील मसले पर सरकार का कहना है कि उसके पास जहरीले कचरे को निपटाने की सुविधाएं और विशेषज्ञ नहीं है। यह जहरीला कचरा यूनियन कार्बाइड कारखाने के ‘कवर्ड शैड’ में रखा गया है। कचरे का आधिपत्य प्रदेश के गैस राहत एवं पुनर्वास विभाग के पास है। त्रासदी के करीब साढ़े तीन दशक बाद भी पर्यावरण पर खतरे की तलवार लटकी हुई है। मध्य प्रदेश सरकार इस मुद्दे पर केंद्रीय वन पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय का मुंह ताक रही है।