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महाशिवरात्रि की तैयारी में डूबा देश, हरिद्वार में पहले शाही स्नान की धूम

पूरा देश महाशिवरात्रि की तैयारियों में जुटा है। देशभर के सभी शिवालयों को आकर्षक ढंग से सजाया जा रहा है। उधर हरिद्वार में पहले शाही स्नान की धूम देखी जा रही है। लाखों भक्त  स्नान के लिए यहां पहुंच रहे हैं।

फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को महाशिवरात्रि मनाई जाती है। यदि शिवरात्रि त्रिस्पृशा अर्थात त्रयोदशी, चतुर्दशी और अमावस्या के स्पर्श से युक्त हो, तो परमोत्तम मानी गई है। गुरुवार 11 तारीख को फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की प्रात:काल त्रयोदशी और दोपहर 2.39 के पश्चात चतुर्दशी तिथि है। गुरुवार को यदि शिवरात्रि पड़े तो इसे अत्यंत शुभ माना जाता है। इसे एश्वर्य योग भी कहा जाता है।

 

इस दिन शिव और सिद्ध योग है तथा श्रीवत्स और सौम्य योग भी है, जो कि अत्यंत शुभ है। यह पर्व सत्य और शक्ति दोनों को पोषित करता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी तिथि में चन्द्रमा सूर्य के समीप होता है। अत: इसी समय जीवन रूपी चन्द्रमा का शिवरूपी सूर्य के साथ योग होता है। अत: इस चतुर्दशी को शिवपूजा अभीष्ट फल देने वाली होगी। शिव पुराण की ईशान संहिता में बताया गया है कि फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की रात्रि में आदिदेव भगवान शिव करोड़ों सूर्यों के समान प्रभाव वाले लिंग के रूप में प्रकट हुए थे। उनका वर्णन कुछ इस प्रकार मिलता है: फाल्गुन कृष्ण चतुर्दश्याम आदिदेवो महानिशि।  शिवलिंगतयोद्भूत: कोटिसूर्य समप्रभ:॥

महाशिवरात्रि पर हरिद्वार में लग रहे कुंभ का पहला स्नान होगा। इस दिन भारी संख्या में भक्त गंगामें डुबकी लगाएंगे। हालांकि कोरोना महामारी को देखते हुए बचाव की सभी गाइडलाइंस का पालन किया जाएगा। यहां आने वाले सभी का कोरोना टेस्ट जरूरी है। आपको बता दें कि इस बार महाशिवरात्रि पर इस बार बहुत ही सुंदर योग बन रहा है, इसलिए इस दिन स्नान और पूजा विशेष फल भक्तों को मिलेगा। पहले शाही स्नान में नागा साधु स्नान करेंगे। आपको बता दें कि 11 मार्च के बाद 12 अप्रैल सोमवती अमावस्या पर दूसरा शाही स्नान होगा। इसके बाद 14 अप्रैल को बैसाखी के दिन तीसरा शाही स्नान और 27 अप्रैल चैत्र पूर्णिमा पर चौथा शाही स्नान होगा।

यह है कुंभ के पीछे की कहानी:

पुराणों के अनुसार समुद्र मंथन के समय देवताओं और असुरों में अमृत कलश को लेकर युद्ध हुआ। देवता और असुर दोनों ही अमृत का कलश लेना चाहते थे। तभी इंद्र का पुक्ष जयंत धनवंतरी के हाथों से अमृत का कलश लेकर भाग गया। उसे देखकर देवता  भी भाग गए। जयंत 12 सालों तक कलश लेकर भागा। इन 12 सालों में इस कलश को 12 स्थानों पर रखा। जहां 12 जगहों पर ये कलश रखा गया है अमृत की कुछ बूंदे भी उसमें गिर गईं। तभी से इन जगहों पर कुंभ लगता है। इनमें चार स्थान धरती पर हैं, जैसे हरिद्वार, प्रयागराज, उज्जैन और नासिक

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