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कहीं यह सिंधिया जैसे नेताओं को मुख्यमंत्री बनाए जाने का संकेत तो नहीं ?

दुनिया के सबसे बड़े राजनीतिक दल के रूप में स्थापित भारतीय जनता पार्टी की पहचान विचार और संस्कार के साथ प्रबल राष्ट्रवाद को प्रमुखता देने वाले दल के रूप में की जाती है। उसे कांग्रेस और वामदलों की कट्टर विरोधी होने का तमगा भी प्राप्त है। लेकिन इस पार्टी का चाल चेहरा व चरित्र 2014 के बाद से जिस तेजी के साथ बदला है उसने इस दल के साथ जुड़े खाटी विचारकों को बहुत कुछ सोचने के लिए मजबूर कर दिया है। आज जब हम यह सम्पादकीय लिख रहे हैं उस समय भारत के पूर्वोत्तर राज्य आसाम में  हेमंत बिस्वा सरमा मुख्यमंत्री पद की शपथ ले चुके हैं। इस दृष्टि से भी अब भाजपा के भीतर बहुत कुछ सरगर्म है। इस सरगर्मी को न तो विरोध कहना उचित होगा और न ही मतभेद इसे केवल और केवल महसूस किया जा सकता है। जो कुछ घटित हुआ वह अस्वीकार तो कतई नहीं है लेकिन स्वीकार के साथ मस्तिष्क के भीतर प्रश्नचिन्ह अवश्य महसूस किए जा सकते हैं। आखिर क्या हैं यह सवाल जो इस राजनीतिक दल की पुरानी पीढ़ी को परेशान किए हैं। तो इसपर विचार करने के लिए मोदीयुग अर्थात 2014 तक पीछे जाना होगा। इस दौर से जो परम्परा भाजपा में शुरू हुई वह आजतक लगातार जारी है। इसके अंतर्गत भाजपा ने कांग्रेस जैसे धुर विरोधी दल के राजनीतिज्ञों को न केवल अपने यहां जगह देने के रास्ते खोल दिये बल्कि उन्हें मुख्यमंत्री तक बनाने में परहेज नहीं किया। चूंकि आज पूर्वोत्तर में ऐसा ही घटनाक्रम घटित हुआ है तो वहीं की चर्चा करना ज्यादा प्रासंगिक  होगा। आज मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने वाले हेमंत बिस्वा सरमा ने 2014 में भाजपा का दामन थामा फिर पिछली भाजपा सरकार में मंत्री बने और अब बीजेपी ने अपने ही मुख्यमंत्री को हटाकर आयतित हेमंत को मुख्यमंत्री बना दिया। यह कहानी अकेले असम की ही नहीं है अरुणाचल मैं प्रेमा खांडू जो 2016 में भाजपा में आये 2019 में मुख्यमंत्री बना दिये गए। एक और पूर्वोत्तर के राज्य मणिपुर में भी पार्टी ने कुछ ऐसा ही किया यहां एन बीरेन सिंह को 2016 में बीजेपी में लिया गया और चंद महीने बाद अर्थात 2017 मैं उन्हें मुख्यमंत्री पद की कमान सौंप दी गई।

इस प्रकार के बाहरी नेताओं को पार्टी में स्थान देना और फिर वर्षों से पार्टी में रहकर कार्य कर रहे पुराने नेताओं को दर किनार कर मुख्यमंत्री के पद पर शोभायमान करना कहां तक उचित है ? पार्टी के भीतर अब इस प्रक्रिया को लेकर बड़ी बेचैनी व घुटन जैसा माहौल साफतौर पर देखा जा सकता है। मध्यप्रदेश जैसे बड़े राज्य में तो अब पार्टी के जमीनी व निष्ठावान कार्यकताओं व नेताओं में यह चर्चा जोर पकड़ती दिख रही है की कांग्रेस से भाजपा में आए ज्योतिरादित्य सिंधिया को लेकर मोदी पैटर्न पर काम कर रहा पार्टी का नीतिनिर्धारक खेमा मध्यप्रदेश में उन्हें मुख्यमंत्री पद की कमान सौंप सकता है। पार्टी की रीतिनीति की  जानकारी रखने वालों का तो यहां तक कहना है की यदि पिछले उपचुनाव में सिंधिया के प्रभाव वाले ग्वालियर चम्बल अंचल में  बीजेपी अच्छा प्रदर्शन करती तो सिंधिया को मुख्यमंत्री का ताज पहनाया जा चुका होता। सिंधिया भले ही मुख्यमंत्री नहीं बन सके हैं लेकिन अब आसाम घटनाक्रम ने जिसमें पार्टी के पूर्वमुख्यमंत्री सोनोवाल को हटाकर आयतित नेता को मुख्यमंत्री बनाए जाने के घटनाक्रम ने ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे कई अन्य नेताओं की महत्वाकांक्षाओं को भी हवा दे दी है।खासकर उन नेताओं को जो कांग्रेस छोड़ बीजेपी में आए हैं या ऐसी इच्छा रखते हैं, लेकिन कैडर आधारित पार्टी में अपने भविष्य को लेकर सशंकित हैं। इनमें राज्यसभा सांसद सिंधिया का नाम भी प
प्रमुखता से लिया जा सकता है जो मार्च, 2020 में बीजेपी में आने के बाद से पार्टी की ओर से कोई महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दिए जाने की प्रतीक्षा में हैं।

करीब सवा साल पहले जब सिंधिया ने कांग्रेस छोड़ बीजेपी का दामन थामा था तो उन्हें कैबिनेट मंत्री बनाने की चर्चा जोर-शोर से चली थी। यह भी कहा गया था कि उनके समर्थकों को पार्टी संगठन में एडजस्ट किया जाएगा। सिंधिया अपने साथ करीब 25 विधायकों को लेकर आए थे जिसके चलते मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सरकार गिर गई और बीजेपी को सरकार बनाने का मौका मिल गया। शिवराज सिंह चौहान मुख्यमंत्री बने तो सिंधिया समर्थकों को मंत्री पद मिला, लेकिन खुद महाराज अब भी प्रतीक्षा में हैं।

कैडर-आधारित होने के चलते बीजेपी के बारे में यह आम धारणा है कि पार्टी में नए आए लोगों को संदेह की नजरों से देखा जाता है। बीजेपी की रीति-नीति में रचे-बसे लोगों को ही महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दी जाती हैं। सुब्रमण्यम स्वामी से लेकर सतपाल महाराज तक इसके कई उदाहरण भी हैं। लेकिन सरमा को मुख्यमंत्री की कुर्सी देकर बीजेपी ने एक झटके में इस धारणा को तोड़ने की कोशिश की है। पार्टी ने यह संदेश दे दिया है कि अपनी उपयोगिता साबित करने वाले लोगों को महत्वपूर्ण पद देने से उसे गुरेज नहीं है।

यह संदेश सिंधिया के साथ उनके मित्र और राजस्थान के पूर्व उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट के लिए है। राज्य की सत्ता में कांग्रेस की वापसी कराने वाले पायलट मुख्यमंत्री का पद नहीं मिलने से असंतुष्ट हैं और कई बार इसे खुले तौर पर जता भी चुके हैं। बीच-बीच में उनके कांग्रेस छोड़ बीजेपी में जाने की चर्चाएं भी जोर पकड़ती रहती हैं। वे शायद बीजेपी में जाकर भी अपनी महत्वाकांक्षा पूरी होने को लेकर आश्वस्त नहीं हैं। सरमा को मुख्यमंत्री बनाकर बीजेपी ने पायलट और उन जैसे दूसरे नेताओं को भी संदेश दे दिया है। संदेश स्पष्ट है- बीजेपी में आइए, परफॉर्म कीजिए और पद लेकर जाइए।
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