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जन्म जयंती पर विशेष : साधना, ज्ञान, वीरता, सेवा और समर्पण का प्रतीक बिरसा मुंडा

                जवाहर प्रजापति

     

 

जनजातीय गौरव भगवान बिरसा मुंडा की जन्म जयंती पर विशेष

हमारे देश में समय-समय पर ऐसे अनेक महापुरूष अवतरित हुए जिन्होंने भारत में अपनी साधना, ज्ञान, वीरता, सेवा और समर्पण के माध्यम से समाज को नई दिशा देने में अपनी महती भूमिका निभाई है। महापुरुषों की श्रृखला में भगवान बिरसा मुंडा भी प्रमुख है। उन्होंने पूर्ववर्ती महापुरुषों से अलग एक वनवासी परिवार में जन्मे भगवान बिरसा मुंडा ने न केवल एक संत और समाज सुधारक की भांति अपने वनवासी भाइयों और पूरे देश को आडंबर रहित सच्चे धर्म का रास्ता दिखाया, बल्कि तत्कालीन अंग्रेज सरकार को सीधी चुनौती देते हुए उसका विरोध करने का साहस भी दिखाया। शोषण, दमन और अन्याय के वातावरण में हुआ जन्म

भगवान बिरसा मुंडा का जन्म दक्षिण बिहार के छोटा नागपुर से जाना जाता है। इसी ़क्षेत्र के छोटे से गांव उन्निहात में 15 नवंम्बर 1875 को हुआ था उनके पिताजी का नाम सुगना मुंडा व माताश्री का नाम करमी मुंडा था। उनका जन्म बृहस्तीवार को होने के कारण उनका नाम बिरसा रखा गया। बाद में उनका परिवार आमुगानु गांव चला गया। जिस समय बिरसा मुंडा का जन्म हुआ, तब जमींदारों का शोषण चरम पर था। अंग्रेज सरकार से मिलने वाले कमीशन के लालच में वे लगान वसूली के लिए अमानवीयता की सीमा तक पहुंच जाते थे।

1857 के स्वतंत्रता संग्राम के बाद अंग्रेज सरकार को यह अहसास हो गया था कि भारत पर लंबे समय तक शासन करना भारतीयों में फूट डाले बिना संभव नहीं है। इसलिए अंग्रेज सरकार ने देशवासियों में फूट डालने की हथकंडेबाजी शुरू कर दी थी। वनवासियों को उनके परंपरागत निवास जंगलों से निकालकर असम के चाय बागानों में मजदूरी करने पर विवश किया जा रहा था। अंग्रेज सरकार ने कानून बनाकर जंगलों को सरकारी संपत्ति घोषित कर दिया था। वहीं 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के बाद भारत आए रोमन कैथोलिक मिशन और जर्मन लुथेरियन चर्च ने भी छोटा नागपुर क्षेत्र में अपनी गतिविधियां शुरू कर दी थीं। समाज सेवा के नाम पर भारत आए ये मिशनरी वनवासियों को उनके अधिकार और जमीन लौटाने का लालच देकर धर्मांतरण करा रहे थे।

साहसी नन्हे बिरसा ने पादरी को करारा जवाब दिया
बालक बिरसा की प्राथमिक शिक्षा उनके गांव में ही स्थित जयपाल नाग के विद्यालय में हुई। भारतीय संस्कृति, धर्म और अध्यात्म के प्रति उनके रुचि बराबर बनी रही। इसी दौरान बालक बिरसा खूंटी चाईनामा के वैष्णव भक्त आनंद पांडे के संपर्क में आए, जिससे उनकी रुचि भारतीय दर्शन और अध्यात्म के प्रति और बढ़ गई। उन्होंने वेद, पुराण, रामायण, हितोपदेश, भगवद् गीता आदि ग्रंथों का अध्ययन किया। इसी बीच एक ऐसी घटना घटी, जो यह बताती है कि भगवान बिरसा मुंडा बचपन से ही निर्भीक और वनवासी समुदाय के गौरव के प्रति पूरी तरह सतर्क थे। एक दिन चाईबासा मिशन में प्रार्थना के दौरान फादर नोट्रेट ने व्याख्यान दिया और आसपास के कुछ गांव व जंगल मिशन को सौंप देने की बात कही। जब वहां उपस्थित वनवासियों ने इससे इंकार किया, तो फादर नोट्रेट क्रोधित हो गए और वनवासियों को ठग, बेईमान व चोर कहने लगे। अपने समाज का यह अपमान साहसी नन्हे बालक बिरसा से सहन नहीं हुआ और उन्होंने भरी सभा में फादर नोट्रेट को करारा जवाब दे दिया। बिरसा ने कहा- आप किसे ठग, बेईमान और चोर कह रहे हैं हम वनवासियों ने आज तक किसी को ठगा नहीं है। बिरसा ने कहा कि आप गोरे हो और शासक भी गोरे हैं, इसलिए आप उनका पक्ष लेते हो। इस घटना के बाद बालक बिरसा को मिशनरी स्कूल से निकाल दिया गया। बाद में जब मिशनरियों ने वादा करके और कई मुंडाओं को ईसाई बनाने के बाद भी उनकी जमीन और अधिकार नहीं लौटाए, तो इस धोखेबाजी ने बालक बिरसा के अंतःकरण को झकझोर कर रख दिया। इसके बाद बिरसा मैं कौन हूं, यह संसार क्या है, धर्म क्या है जैसे सवालों के जवाब खोजने लगे और चार वर्षों तक कठिन साधना की। जब वे साधना से लौटे, तो उनका स्वरूप बदल चुका था और एक हिन्दू योगी की तरह पीली धोती, खडांऊ और यज्ञोपवीत उनके व्यक्तित्व में शामिल्र हो चुके थे।

बलिप्रथा जैसी कुप्रथाओं से दूर रहने का पाठ वनवासियों को सिखाया

तबकी मुंडा जनजाति की एक धारणा थी कि किसी भी समाज के व्यक्ति को कोई रोग या दुर्घटना या अन्य कोई गंभीर बीमार को दूर करने के लिये देवता को प्रसन्न करना होता था। देवता प्रसन्न करने के लिए बलि चढ़ाने की परंपरा थी। ज्ञानशील युवा बिरसा को यह महसूस हुआ कि अपने परम्परागत मुंडा धर्म में भी सुधार की बहुत आवश्यकता है। उन्होंने अपने धर्म को विकृतियों से मुक्त कर एक नया स्वरूप देने का निश्चय किया। वे अपना धर्म छोड़कर ईसाई बने लोगों को समझाने लगे कि यह धर्म हमें अपने पूर्वजों की श्रेष्ठ परम्परा से दूर ले जाएगा। इसे अपनाकर हम अपने गौरवशाली इतिहास, संस्कृति व अपने गुरुओं, पूर्वजों के श्रेष्ठ ज्ञान से वंचित हो रहे हैं। उन्होंने लोगों को समझाया कि अगर हमें अंग्रेजों से अपने वन क्षेत्रों को वापस लेना है, फिर से वनों का सुखमय व स्वच्छंद जीवन जीना है, तो हमें अपनी संस्कृति के आधार पर अपने जीवन में प्रकाश लाने के लिये उन्हें शिक्षित किया जाना आवश्यक है। बिरसा ने वनवासियों को उनकी भाषा में पढ़ाना शुरू किया। तब उन्होंने वनवासियों को तुलसी की पूजा करने, गाय की हत्या न करने, रामायण, महाभारत, गीता का नित्यपाठ करने, मांसाहार छोड़ने और शुद्ध सात्विक जीवन जीने के लिए प्रेरित किया।

अनुयायियों ने सेवा और समर्पण को देख बिरसा को भगवान मानने लगे

एक संत और समाज सुधारक के रूप में बिरसा ने अपना मुख्यालय चाल्कंद में बनाया। धीरे-धीरे उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैल गई। लोग उन्हें देखने और सुनने आने लगे। उनके तेज, ज्ञान और देशप्रेम को देखकर बिरसा के अनुयायी उन्हें भगवान कहने ल्गे। अपने अनुयायियों का आत्मबल्न बढ़ाने के लिए बिरसा कहते थे – ‘‘मैं विदेशियों के अत्याचारों से पीड़ित इस धरती को फिर से सम्मानित करूंगा। इसी कार्य में आपको प्रवृत्त करने के लिए मैं आया हूं, मेरे साथ चलो।‘‘ लोग बिरसा द्वारा बताए गए नियमों पर चलने लगे। मांसाहार, गोहत्या बंद कर दी। तुलसी की पूजा, रामायण पाठ, दीपक जलाकर पूजा करना आदि उनकी दिनचर्या में शामिल हो गए। बिरसा के इस मत को बिरसाइयत कहा जाने लगा और उनके हजारों अनुयायी भोजन सामग्री तथा धर्मशास्त्रों की पुस्तकों के साथ चालकंद में रहने लगे। इसे देखकर अंग्रेज सरकार को डर लगने लगा कि कहीं बिरसा द्वारा धर्म के नाम पर स्थापित यह एकता सरकार के खिलाफ राजनीतिक आंदोलन में न बदल जाए, इसलिए बिरसा को दुष्चक्र रचकर 2 वर्ष के लिए जेल भेज दिया गया। लेकिन जेल से आने के बाद भी बिरसा ने लोगों को जगाने का अपना काम जारी रखा। लोगों के कड़े विरोध के बीच अंग्रेज सरकार ने 1895 में उन्हें फिर से 2 वर्ष के लिए हजारीबाग जेल भेज दिया।

मातृभूमि के लिए दिया बलिदान

बिरसा 30 नवंबर, 1897 को जेल से बाहर आए, लेकिन तब तक उनके मन में विद्रोह के संकल्प उसके क्रियान्वयन की योजना आकार ले चुकी थी। बिरसा मुंडा ने अपने वनवासी बंधुओं से कहा कि यह घर केवल तुम्हारा घर नहीं है, हर घर सामाजिक संघर्ष का एक दुर्ग है। इसलिए शस्त्र जुटाओ, तत्रवार और तीर कमान बनाओ। अब बिरसा ने कई पर्वत श्रृंखलाओं से घिरे डोमबारी पहाड़ को अपना मुख्यालय बनाया। 24 दिसम्बर, 1899 को उल गुलान का मुहूर्त निश्चित हुआ और इसी रात को बिरसा और उनके सहयोगियों ने रांची से चाइबासा तक के 400 वर्ग कि.मी. क्षेत्र में पुलिस की चैकियों, मिशन दफ्तरों और अंग्रेज अफसरों के कलबों को निशाना बनाकर हमले किए। बिरसा द्वारा शुरू किया गया यह विद्रोह जंगल की आग की तरह बड़े भू-भाग में फैल गया। बिरसा और उनके अनुयायियों के डोम्बारी पहाड़ पर होने की सूचना मिलने पर अंग्रेज फौज और पुलिस ने पहाड़ को घेर लिया। दो दिन की घेराबंदी के बाद अंग्रेजों ने बिरसा और उनके साथियों से समर्पण के लिए कहा। इस पर नरसिंह मुंडा नामक एक सरदार ने जो जवाब दिया, वह बिरसा के आंदोलन की भावना को प्रकट करता है। उस सरदार ने चिल्लाकर कहा- किसको समर्पण के लिए कह रहे हो ? जो आक्रमणकारी हैं, वे समर्पण करेंगे। हम यहीं के मूल निवासी हैं, तुम बाहर से आए हो। धिक्कार है तुम पर। बिरसा मुंडा की प्रेरणा से वनवासी पुरुषों, महिलाओं और बच्चों ने तलवार, तीरकमान, कुल्हाड़ी और गुलेल से अंग्रेजों की गोलीबारी का डटकर मुकाबला किया। सरकार ने इस लड़ाई में हताहतों की संख्या सिर्फ 7 बताई, लेकिन स्थानीय निवासियों के अनुसार इस लड़ाई में मुंडाओं का इतना लहू बहा कि सैलरकब पहाड़ की मिट्टी में आज भी मुंडाओं के रक्त की गंध मौजूद है। इस भयानक लड़ाई के बावजूद बिरसा ने अपना काम बंद नहीं किया। सरकार ने उनकी गिरफ्तारी पर पांच सौ रुपये का इनाम घोषित किया। वनवासियों के लिये उस समय पांच सौ रूपये की राशि बहुत ज्यादा थी लेकिन किसी भी वनवासी ने उनके गिरफ्तार करने के लिये अपना मुंह नहीं खोला। आखिरकार सरकार ने बिरसा को गिरफ्तार कर रांची जेल में डाल दिया। बिरसा को जेल में भयानक यातनाएं दी गईं, लेकिन व न झुके न टूटे। लगातार शारीरिक प्रताड़ना के चलते 9 जून, 1900 की सुबह बिरसा को खून की उल्टी हुई और उनका निधन हो गया। 25 वर्ष के छोटे से जीवन में भगवान बिरसा मुंडा ने जो काम कर दिये, उन्हें करने में कई पीढियां खप सकती हैं। देश के लोगों और विशेषकर वनवासी समुदाय को स्वतंत्रता, स्वाभिमान और अपनी संस्कृति के प्रति समर्पण का पाठ पढ़ाकर भगवान बिरसा मुंडा तो इस दुनिया से चले गए, लेकिन परिस्थितियां नहीं बदली हैं। अंग्रेजों के चले जाने के बाद भी आजादी के बाद भी उन्हें मात्र वोट बैंक बनाये रखते हुए वनवासी समुदाय के विकास से दूर रखा गया उन्हें बांटने के प्रयास हो रहे हैं और उन्हें भ्रमित कर समाज की मुख्य धारा से अलग-थलग रखने का प्रयास किया जा रहा है। ऐसे में भगवान बिरसा मुंडा के विचार आज भी प्रासंगिक हैं।
जनजातीय गौरव और मातृभूमि के सम्मान के लिए अपना सर्वस्व बलिदान कर देने वाले भगवान बिरसा मुंडा के जन्मजयंती को जनजातीय गौरव दिवस के रूप में मनाने की मध्यप्रदेश सरकार की पहल अत्यन्त सराहनीय है। देश में विकास की गंगधारा बहाने वाले प्रधानमंत्री श्री मोदी ने राष्ट्रीय स्तर पर इसे मनाए जाने का जो निर्णय लिया है, उससे पूरे देश के लोगों को भगवान बिरसा मुंडा के त्याग और बलिदान के बारे में जानने का अवसर मिलेगा। जनजातीय गौरव और मातृभूमि के सम्मान के लिए अपना सर्वस्व बलिदान कर देने वाले भगवान बिरसा मुंडा की जयंती को जनजातीय गौरव दिवस के रूप में मनाने की मध्यप्रदेश की शिवराज सिंह सरकार की पहल सराहनीय है। मध्य प्रदेश सरकार द्वारा जनजातीय समाज के विकास के लिये चलाई गई अनेक योजनाएं भगवान बिरसा मुंडा की जन्म दिवस पर सच्ची श्रृद्धांजलि है।

लेखक प्रदेश सह मीडिया प्रभारी भाजपा म0प्र0

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