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क्या इस हार के बाद खतरे की घण्टी की डरावनी आवाज को महसूस करेगा भाजपा शीर्ष नेतृत्व

 

मूंछ का बाल बनाकर मुख्यमंत्री सहित पूरे संगठन की ताकत झोंकने का दोषी कौन  ?

अब हो रही है जगहंसाई

प्रवीण दुबे

 

गुना लोकसभा क्षेत्र की कोलारस और मुंगावली विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस की जीत ने निसन्देह ज्योतिरादित्य सिंधिया का कद बढ़ा दिया है। इन उपचुनावों में सत्ताधारी दल को करारा झटका लगा है ऐसा इसलिए कि अब विधानसभा चुनावों की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है ऐसे में जनता का मूड भांपने का यह बड़ा मौका था। इतना ही नहीं पहले भिंड के अटेर  फिर चित्रकूट और अब कोलारस व मुंगावली में मिली हार इस बात का साफ संकेत कहा जा सकता है कि अगले विधानसभा चुनाव भाजपा के लिए आसान नहीं रहने वाले है।

यूँ तो पहले से ही कोलारस ओर मुंगावली दोनों ही स्थानों पर कांग्रेस का दबदबा रहा है और यहां से वो जीत का परचम भी लहराती रही है,लेकिन  भाजपा के नीति निर्धारकों ने सबकुछ जानते हुए भी इसे प्रतिष्ठा की लड़ाई बना डाला। मुख्यमंत्री ने तो यहां 45 से अधिक सभाएं करके भाजपा के लिए मूंछ का बाल बना दिया। दूसरी ओर भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रभात झा जरूरत से ज़्यादा सक्रिय दिखे ,इसमें नरेंद्र तोमर भी पीछे नहीं रहे कुल मिलाकर भाजपा ने यहां न केवल अपनी पूरी ताकत झोंक दी साथ ही पैसा भी पानी की तरह बहाया गया।
इतना ही नहीं सरकारी मशीनरी का जमकर इस्तेमाल भी किया और उसी के खिलाफ कांग्रेस के पक्ष में चुनाव प्रचार करने का आरोप लगाकर धमकी भरे लहजे में कर्मचारियों की शिकायत भी की गई इससे सरकारी तंत्र में नाराजी और गुस्सा को जन्म दिया जिससे माहौल ओर खराब होता ही चला गया।
जनता के गुस्से का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि  मध्य प्रदेश के अशोकनगर जिले के मुंगावली विधानसभा सीट के सेहराई और पिपरई गांवों में भी कांग्रेस ने बीजेपी का सूपड़ा साफ कर दिया । मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान खुद ने दोनों गांवों में रातभर रुककर डेरा जमाया था। तीन-चार बार इन गांवों का उन्होंने दौरा किया था। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सेहराई में रोड शो भी किया था। इसके अलावा उन्होंने किसान सम्मेलन में पहुंचकर सेहराई में डिग्री कॉलेज खोलने की घोषणा भी की थी।
चुनाव से ठीक पहले मिली इस हार से भाजपा के नीतिनिर्धारकों को बहुत कुछ सबक लेने की जरुरत है। सबसे बड़ा सबक तो यह है कि अब पिछले दो तीन विधानसभा चुनावों की तरह प्रदेश की हवा का रुख कतई पूरी तरह भाजपा के पक्ष में दिखाई नहीं दे रहा है।
विपरीत बह रही हवा  को पहचानने की जरूरत है इसके कारणों का भी पता लगाने की आवश्यकता है। आखिर वो कौन से कारण हैं कि जनता के बीच सर्वमान्य जादुई व्यक्तित्व रखने वाले मुख्यमंत्री शिवराज की लोकप्रियता आखिर क्यों घट रही है।
पार्टी में लगातार बढ़ रही गुटबाजी, बड़े नोकरशाहों  का लगातार बढ़ते दखल ने भी भाजपा की छवि और लोकप्रियता को नुकसान पहुंचाया है। सत्ता और संगठन दोनों में ही कुछ गिने चुने नेताओं को तवज्जो , पार्टी के विकास और लोकप्रियता बढ़ाने में योगदान देने वाले जनप्रभावशाली नेताओं की अनदेखी ने भी पार्टी को नुकसान पहुंचाया है।
एक तरफ जातिगत आधार पर अचानक तीन मंत्रियों की नियुक्ति तो दूसरी और पार्टी को आगे बढ़ाने में खासा योगदान देने वाले ब्राह्मण वैश्य मराठी आदि जातियों से जुड़े जनाधारित नेताओं की अनदेखी से पार्टी में टकराव टूट की स्थिति तक जा पहुंचा है। अनूप मिश्रा प्रकरण इसका ताजा उदाहरण है। इसको रोकना होगा।
दूसरी ओर कांग्रेस की बात करें तो पिछले कुछ दिनों में कांग्रेस के भीतर बदलाव साफ देखा जा सकतस है। इन उपचुनावों मै दिग्विजयसिंह जैसे बड़बोले नेता को दूर रखने में कांग्रेस हाईकमान पूरी तरह सफल रहा है । दिग्विजय कमलनाथ जैसे नेताओं ने ज्योतिरादित्य
के नेतृत्व को मूक समर्थन दिया परिणामस्वरूप पार्टी में एकजुटता दिखायी दी।
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