प्रवीण दुबे
नगरीय निकाय चुनाव की घोषणा के साथ ही प्रत्याशी चयन को लेकर सरगर्मियां तेज हो गई हैं। ग्वालियर की बात करें तो यहां नगरीय निकाय की 135 वर्ष पुरानी गौरवशाली परम्परा रही है।

ग्वालियर म्युनिसिपल कार्पोरेशन की स्थापना 6 जून 1887 में हुई ,समय समय पर इसके स्वरूप और संविधान में संशोधन होते रहे लेकिन इसकी कमान जिन महानुभावों के हाथ रही उन्होंने सदैव महान व्यक्तित्व और गौरवशाली परम्पराओं को सदैव जीवंत रखा। यहां के महापौर पद को विष्णु भागवत,राजा पंचम सिंह,नारायण कृष्ण शेजवलकर, रघुनाथ राव पापरीकर,चिमन भाई मोदी,भारत भूषण भार्गव, रघुनाथ भाऊसाहब पोतनीस, माधव शंकर इंदापुरकर,विवेक शेजवलकर जैसे निर्मल छवि वाले विकास को समर्पित कर्मठ राजनीतिज्ञों ने सुशोभित किया है।

यह कटु सत्य है कि ग्वालियर के वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में ऐसे नेता नजर नहीं आते हैं। आज छल कपट दम्भ और राजनीतिक विद्वेष को अंगीकार करके राजनीति करने वालों की भीड़ दिखाई देती है। ऐसे कटुतापूर्ण माहौल में महापौर पद के लिए ग्वालियर की गौरवशाली परम्पराओं को जीवंत रख काम करने वाले प्रत्याशी का चुनाव करना बेहद कठिन कार्य है। लेकिन लोकतंत्र में चुनाव एक अनिवार्य प्रक्रिया है और इस प्रक्रिया को पूर्ण करने के पहले प्रत्याशी का चयन तो करना ही होगा। चूंकि चुनाव अब सर पर है अतः सभी राजनीतिक दलों की महापौर पद प्रत्याशी के चयन हेतु माथा फोड़ी लगातार जारी है। इस आपा धापी भरे माहौल में सभी राजनीतिक दलों को यह ध्यान रखने की जरूरत है कि महापौर को किसी भी नगर का प्रथम नागरिक का सम्मान प्राप्त है,लिखने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि ग्वालियर में राजनीतिक दलों में जिन्होंने भी महापौर प्रत्याशी चयन की जिम्मेदारी का निर्वहन किया सदैव मान मर्यादाओं को सामने रखकर प्रत्याशी चयन किया गया। एकबार पुनः राजनीतिक दलों की परीक्षा का समय आ गया है। महापौर पद सामान्य महिला के लिए आरक्षित है,ऐसी स्थिति में कांग्रेस हो या भाजपा या अन्य कोई भी दल जिसका भी चुनाव करे यह ध्यान रहे कि उनमें से ही ग्वालियर की जनता महापौर चुनने वाली है,जब प्रत्याशी अच्छा होगा तभी ग्वालियर के प्रथम नागरिक की गौरवशाली परम्परा कायमरह पाएगी।