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आरएसएस ने वीरांगना प्रणाम कर स्वतंत्रता समर की महानायिका लक्ष्मीबाई को किया नमन

1857 के स्वतंत्रता समर की महानायिका वीरांगना लक्ष्मीबाई  के बलिदान दिवस पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा ग्वालियर स्थित  उनके समाधिस्थल पर वीरांगना प्रणाम कर उन्हें नमन किया गया।

वीरांगना लक्ष्मीबाई बलिदान दिवस पर आयोजित श्रद्धांजलि कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित आरएसएस के  अखिल भारतीय सह संयोजक समरसता गतिविधि श्री रविंद्र ने अपने प्रबोधन में कहा कि जो समाज इतिहास का अध्ययन नहीं करता ,वह समाज कभी उन्नति नहीं कर सकता है । इतिहास से कटे हुए समाज की स्थिति जड़ से कटे हुए वृक्ष के समान होती है,अतः हमें सदैव अपने प्रेरणास्पद महापुरुषों का स्मरण करना चाहिए। देश के उज्ज्वल भविष्य के लिए भी इतिहास का स्मरण आवश्यक है । इतिहास के संबंध में उन्होंने कहा कि यदि हम 2000, 1000 व 150 वर्ष के कालखंड पर अलग-अलग विचार करें तो अनेक महापुरुषों के नाम ध्यान में आते हैं किंतु अट्ठारह सौ सत्तावन के संग्राम के नेताओं में रानी लक्ष्मीबाई का नाम सर्वाधिक आदर के साथ लिया जाता है।
लोगों को बताया जाता है कि अंग्रेज व्यापार के लिए आए थे और देश में जब उन्होंने अव्यवस्था फैली देखी तो एक -एक कर सभी राज्य अपने हाथ में लेकर शासन करने लगे,यह धारणा पूरी तरह भ्रामक है ,इसे हमें अपने मन से निकालना पड़ेगा ।वास्तविकता तो यह है कि इस्लाम के अनुयायियों ने अंग्रेजों का समुद्री मार्ग से व्यापार रोक दिया था। हम आज के भू राजनैतिक परिप्रेक्ष्य में इसका विचार भी अवश्य करें कि समुद्री मार्ग रोक देने के पश्चात् पोप ने पूरी दुनिया को पूर्व व पश्चिम में बांटकर कहा था कि बीच का भाग जो इस्लामिक है, हमें उसको भी ईसाइयत में बदलना होगा । इससे स्पष्ट है कि अंग्रेज व्यापार करने नहीं आए थे बल्कि उनकी संपूर्ण दुनिया को ईसाइयत में बदलने की योजना थी ।हमें यह भी पता है व्यापार करते समय भी वे सुरक्षा हेतु सेना नहीं रखते थे । किसी भी देश में जब कोई व्यापार करता है तो उसकी फैक्ट्रियों की जमीन पर भी उसी देश का अधिकार होता है लेकिन अंग्रेजों ने अपनी फैक्ट्री सूरत में लगाई हो,मद्रास में लगाई हो या अन्य स्थानों पर, उन फैक्ट्रियों में भारतीयों को कोई अधिकार नहीं देते थे। इससे स्पष्ट है कि भूमि हमारी और शासन उनका था ।उन्होंने कहा कि अंग्रेज सदैव फूट डालो और राज करो के आधार पर आगे बढ़ते रहे।
नाना साहब पेशवा, तात्या टोपे तथा लक्ष्मीबाई ने 1857 के संग्राम में पूरे देश में नई चेतना पैदा कर दी।उस समय रानी से लड़ने वाली अंग्रेजी सेना का सेनापति ह्यूरोज रानी की युद्ध कला को देखकर कहता है कि रानी युद्ध में सर्वश्रेष्ठ थी ,इससे अच्छी युद्धकला मैंने नहीं देखी। फ्रांस में आजादी के लिए जो संघर्ष हुआ ,उस समय वहां की रानी ने जब युद्ध लड़ा तो फ्रांस के लेखक ने उस रानी के चरित्र को फ्रांस की रानी लक्ष्मीबाई बताया था।भारत की जनता को रानी का यह विश्वविख्यात चरित्र हमें बताना होगा ।अपने समय में स्वतंत्रता संग्राम के सर्वमान्य नेता लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने महारानी के बारे में कहा कि हमारा सौभाग्य है कि महारानी लक्ष्मीबाई हमारे देश में पैदा हुईं।अंग्रेजों ने स्वतंत्रता संग्राम के नेताओं के खिलाफ एक अभियान छेड़ा। उन्होंने सावरकर को कायर, सुभाष चंद्र बोस को जर्मनी व जापान का एजेंट बताया। चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों पर भी बिकाऊ इतिहासकारों द्वारा टीका टिप्पणी करना अंग्रेजों की इसी नीति का हिस्सा तथा हमें हमारे गौरवशाली इतिहास से दूर रखने का कुत्सित प्रयास है।अंग्रेज व उनके भारतीय पिट्ठू कितना भी कीचड़ उछालें लेकिन हमें रानी की वीरता व देशप्रेम पर सदैव गर्व रहेगा।

रविंद्र जी ने कहा कि वीरांगना का चरित्र एवं कृतित्व अपने आप में महान है और आज की महिलाओं को प्रेरणा देने वाला है। उन्होंने कहा कि 23 वर्ष की आयु तक जीने वाली वीरांगना को आज 21वीं सदी में भी दुनिया भर की महिलाओं द्वारा आदर्श बनाया जा रहा है ,यह उनके चरित्र के कारण ही है।
नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने भी कहा था कि वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई दुर्भाग्य से अपनी झांसी में ही हार गईं, यदि आज वह यशस्वी होतीं तो हमारा भारत देश भी यशस्वी होता।

रविंद्र जी ने बताया कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के समकालीन व उनके बाद के लोगों ने भी एक दृष्टि से महारानी के कृतित्व का वर्णन किया है। अनेक इतिहासकारों ने अंग्रेजों के प्रभाव में आकर अनेक इस प्रकार की बातें लिखी हैं की महारानी का स्वतंत्रता संग्राम स्वार्थ की लड़ाई थी। यह एक क्षेत्र विशेष की लड़ाई थी , देशभर के राजाओं में संवाद की कमी थी । जबकि 1857 के स्वतंत्रता समर के 2 वर्ष बाद ही इतिहासकारों के गुरु कालमार्क्स ने 1959 में लिखा है कि अंग्रेजों ने भारत में स्थानीय लोगों के साथ पशुओं की तरह शोषण किया है, लूट मचाई, राष्ट्रीय स्वाभिमान को आहत किया। यहां के राज्य और संपत्ति का नुकसान किया। इन्हीं के कारण भारत के किसान एवं जनता संतप्त हो गई और नतीजा स्वतंत्रता संग्राम के समर के रूप में सामने आया। यह युद्ध नहीं स्वतंत्रता युद्ध था।
उन्होंने लिखा कि वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई ने देश के सभी राजाओं के साथ पत्राचार किया तथा देश की स्वतंत्रता व अखंडता के लिए सहयोग मांगा और विरोधियों को यहां से हटाने के लिए सभी को मिलकर प्रयास करने का आग्रह किया।
1857 के स्वतंत्रता समर के ऊपर जितने भी आक्षेप लगाए जाते हैं उन आक्षेपों का का जवाब वीरांगना के जीवन चरित्र में ही है।
महारानी के जीवन का समकालीन महत्त्व की दृष्टि से अभी हम देखें तो महारानी के समान समरसता का भाव रखने वाला कोई दूसरा नहीं हो सकता। वीरांगना महारानी ने जो सेना बनाई थी उस सेना में 35 जातियों की वीरांगना शामिल थी और प्रत्यक्ष युद्ध के दौरान रानी स्वयं सभी वीरांगनाओं को अपने हाथों से रोटियां देती थी। एक महारानी द्वारा 35 जातियों को अपने हाथ से रोटी खिलाना, समरसता का इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है।
आज देश भर की महिलाओं के लिए वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई, अहिल्याबाई जीजामाता एवं रानी चिन्नम्मा आदर्श के रूप में स्थापित हैं और उन्हीं के आदर्शों पर चलते हुए आज की महिलाएं देश का ऐसा कोई क्षेत्र नहीं है ,जहां पर अपना कर्तव्य सिद्ध न कर रहीं हों अर्थात् सभी क्षेत्रों में महिलाओं का वर्चस्व है। आज की महिला घर में अच्छी ग्रहणी है ,अच्छी मां है, अच्छी बहू है, अच्छी बेटी है ,अच्छी पत्नी है और घर के बाहर अच्छी डॉक्टर है, अच्छी शिक्षिका है, अच्छी वकील है और भी सभी क्षेत्रों में पूर्ण क्षमता के साथ कार्य कर रहीं हैं।
देश के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वालों को हमेशा देश स्मरण करता है, जिस प्रकार अपने देश की आजादी के लिए अपना जीवन न्योछावर करने वाली वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई को आज हम सभी याद कर रहे हैं।

कार्यक्रम में मंचासीन विभाग संघचालक विजय गुप्ता रहे।मंचस्थ अधिकारियों का परिचय विभाग कार्यवाह डॉ.देवेन्द्र सिंह गुर्जर ने कराया।कार्यक्रम में प्रांत कार्यवाह श्री यशवंत इंदापुरकर सहित सैकड़ों स्वयंसेवक उपस्थित रहे।उद्बोधन के उपरांत सभी ने महारानी लक्ष्मीबाई की समाधि पर श्रद्धासुमन अर्पित किए।

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