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अंतरराष्ट्रीय महिला हिंसा उन्मूलन दिवस पर विशेष : हिंसा नहीं सम्मान की हकदार है नारी

डॉ. केशव पाण्डेय

दुनिया भर में महिलाओं पर होने वाली हिंसा को रोकने के लिए प्रतिवर्ष 25 नवंबर को विश्वभर में अंतरराष्ट्रीय महिला हिंसा उन्मूलन दिवस मनाया जाता है। इस दिवस में महिलाओं के अस्तित्व, अस्मिता एवं उनके योगदान के लिए दायित्वबोध की चेतना का संदेश छुपा है। जिसमें महिलाओं के प्रति बढ़ रही हिंसा को नियंत्रित करने का संकल्प लेना जरुरी है। इस वर्ष इस दिवस का आयोजन संयुक्त राष्ट्र द्वारा वर्ष 2030 तक महिला हिंसा उन्मूलन कार्यक्रम के तहत चलाए जा रहे यूनाइट (UNiTE) अभियान के अंतर्गत किया जा रहा है। वर्ष 2008 में संयुक्त राष्ट्र द्वारा महिलाओं के खिलाफ हिंसा के उन्मूलन के लिए यूनाइट अभियान शुरू किया गया था। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने दिसम्बर 1999 में, 25 नवम्बर को, महिलाओं के खिलाफ होने वाली हिंसा के उन्मूलन के लिए अन्तरराष्ट्रीय दिवस घोषित किया था। इसमें सरकारों, अंतरराष्ट्रीय संगठनों और ग़ैर सरकारी संगठनों को भागीदार बनाने का आह्वान किया गया। इसका उद्देश्य महिलाओं के बुनियादी मानव अधिकारों और लैंगिक समानता के विषय में जागरूक एवं शिक्षित करना है ताकि महिलाओं के खिलाफ हो रहे हिंसा को रोका जा सके।
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संयुक्त राष्ट्र की दो एजेंसियों की प्रकाशित एक हैरान करने वाली नई रिपोर्ट में कहा कि वर्ष 2021 में हर घंटे औसतन पाँच से अधिक महिलाओं या लड़कियों की हत्या, उनके ही परिवार के किसी सदस्य ने कर दी। संयुक्त राष्ट्र के ड्रग्स एवं अपराध निरोधक कार्यालय(UNODC) और यूएन महिला संगठन (UN Women) के एक नवीन अध्ययन में ये बात सामने आई है।महिलाओं के खिलाफ़ हिंसा के उन्मूलन के लिए अंतररराष्ट्रीय दिवस के मौक़े पर इस अध्ययन के नतीजे जारी किये हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2021 के दौरान, लगभग 81 हज़ार महिलाओं और लड़कियों की हत्या जान बूझकर की गई। जिनमें 45 हज़ार यानी लगभग 56 प्रतिशत महिलाओं व लड़कियों की हत्याएँ उनके अन्तरंग साथी या परिवार के अन्य सदस्यों के हाथों हुईं। इन हत्याओं में से 11 फीसदी परिवारों में ही हुइंर्। जो दर्शाता है कि बहुत सी महिलाएं और लड़कियां अपने घरों में ही सुरक्षित नहीं है।
संयुक्त राष्ट्र महिला संगठन की कार्यकारी निदेशिका सिमा बाहौस का कहना है, “हर महिला की हत्या के आँकड़ों के पीछे एक महिला या लड़की की कहानी होती है जिसे नाकाम कर दिया गया है। ये हिंसा रोकी जा सकती है और ऐसा करने के लिए उपकरण व जानकारी पहले से मौजूद है।”
यह रिपोर्ट एक भयावह चेतावनी जारी करते हुए ध्यान दिलाती है की महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ यौन शोषण, उनके साथ एक व्यापक भेदभाव और मानवाधिकार उल्लंघन है। वर्ष 2021 में लगभग 10 में से चार महिलाओं और लड़कियों की जानबूझकर हत्या की गई लेकिन उनकी मौतों को हत्या के रूप में दर्ज करने पर्याप्त जानकारी नहीं थी।
यूएनओडीसी की कार्यकारी निदेशिका ग़ादा वॉली ने कहा, “किसी भी महिला या लड़की को ये सोच कर असुरक्षित नहीं महसूस करना चाहिए के वो ख़ुद कौन हैं.”
“हमें महिलाओं और लड़कियों की लिंग आधारित हत्याओं के सभी रूपों को रोकने के लिए, हर जगह, हर पीड़ित को गिनना होगा और महिलाओं की हत्या के जोखिमों व कारणों की समझ में सुधार लाना होगा ताकि हम बेहतर और अधिक प्रभावी रोकथाम और आपराधिक न्याय योजनाएँ बना सकें.“ अलबत्ता, महिलाओं की हत्या हर देश की समस्या है, मगर ये रिपोर्ट क्षेत्रीय असमानताओं/विषमताओं की ओर भी इशारा करती है।
हालांकि अब महिलाएं सक्रियता दिखा रही हैं और अपने खिलाफ होने वाली हिंसा के खिलाफ आवाज उठा रही हैं इसे ऐसे भी देखा जा सकता है कि वर्ष 2006 में एक्टिविस्ट तराना बुर्के ने मीटू आंदोलन की विस्फोटक शुरूआत की थी। इसका असर यह हुआ महिलाओं के लिखाफ हिंसा को रोकने के लिए वैश्विक स्तर पर आंदोलन होने लगे थे और अभूतपूर्व जागरूकता देखने को मिली थी। ऐसे में जरूरत है कि महिलाओं के साथ ही हम सभी मिलकर सामूहिक रूप से कदम उठाएें ताकि हिंसा नहीं सम्मान की हकदार बन सके नारी। इसके लिए महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ हिंसा को समाप्त करने के लिए मजबूत, स्वायत्त महिला अधिकार संगठनों और नारीवादी आंदोलनों में समर्थन और निवेश करना अत्यंत महत्वपूर्ण होगा।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार और केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के मीडिया सलाहकार हैं 

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