भाजपा भी अजीब राजनीतिक दल है,इसके बारे में ठीक ही कहा गया है पार्टी विद डिफरेंट अब नए प्रदेश अध्यक्ष के चयन को ही लीजिए बड़े बड़े कद्दावर नेता थे लाइन में लेकिन ऐसा नाम तय किया कि सब स्तब्ध रह गए।
rखासकर इस नाम ने सबसे ज्यादा परेशान किया ग्वालियर अंचल के उन नेताओं को जो पार्टी अध्यक्ष की कतार में थे यह सच है कि इनमें से एक केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह ने पहले ही खुद को अध्यक्ष पद की दौड़ से अलग बताया था,बावजूद इसके कम से कम दो नाम ऐसे थे जो इस दौड़ मैं आगे बने हुए थे, अंततः इन्हें निराशा ही हाथ लगी है।
हां आगामी विधानसभा चुनावों के मद्देनजर ग्वालियर अंचल के लिए एक बड़ी उपलब्धि यह रही कि दमदार केंद्रीय मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर को पार्टी ने चुनाव संचालन समिति का संयोजक बनाकर अंचल के दबदबे को बरकरार रखा गया है, अब भला जो नेता चुनाव में उतरने के इच्छुक होंगे उन्हें नरेंद्र सिंह के नजदीक आना ही होगा फिर भले ही उनके कितने ही मतभेद क्यों न हों।
खैर छोड़िये आज हम नजदीकी या दूरी का विश्लेषण नहीं करने जा रहे आज तो नए अध्यक्ष पर चर्चा करना हमारा उद्देश्य है।
अब जबकि ग्वालियर अंचल से बहुत दूर जबलपुर के सांसद चौधरी राकेश सिंह के सिर अध्यक्ष का ताज सज ही गया है तो पार्टी के इस निर्णय का थोड़ा बहुत विश्लेषण भी जरूरी है।
चुनावी वर्ष में तमाम कद्दावर नेताओं को दरकिनार कर एक नए चेहरे को अध्यक्ष की कमान सौंपे जाने के कई निहितार्थ नजर आ रहे हैं। जब एक माह पूर्व शीर्ष नेतृत्व ने मध्यप्रदेश में सत्ता और संगठन की नब्ज टटोलने के लिए पूर्व निर्धारित नाम अर्थात अखिल भारतीय संगठन मंत्री रामलाल जी की जगह सह संगठन मंत्री सौदान सिंह को यहाँ भेजा था तभी यह तय हो हो गया था इस बार भाजपा के संगठनात्मक फैसलों में भोपाल की जगह दिल्ली का दखल ज्यादा रहेगा।
सौदान सिंह ने जब तीन दिन तक भोपाल में सत्ता और संगठन की समीक्षा की थी तब इस बात के भी साफतौर पर संकेत थे कि चुनाव से पहले बहुत कुछ नया होने वाला है।
यह कयास सही साबित होने प्रारम्भ हो गए हैं पार्टी शीर्ष नेतृत्व ने इसी इसी थ्योरी पर काम प्रारंभ करते हुए बिल्कुल नए चेहरे को अध्यक्ष जैसी बड़ी जिम्मेदारी सौंपी है।
अभी तो यह शुरआत है
निसन्देह अभी तो यह शुरआत कही जा सकती है,पार्टी शीर्ष नेतृत्व के सामने मध्यप्रदेश की सत्ता और संगठन के भीतर से जो कुछ फीड बैक सामने आया है उसके मुताबिक तो पार्टी हाई कमान को अभी और कई बड़े व चोंकाने वाले निर्णय लेना होंगे और अब ऐसा लगता है कि पार्टी पूरी तरह से इसका मन बना चुकी है।
भाजपा के भीतर से छनकर आ रही खबरों को यदि सही माना जाए तो चुनावी वर्ष में शीर्ष नेतृत्व द्वारा सत्यता का पता लगाने कराये गए सर्वे की रिपोर्ट आने के बाद हाईकमान के होश उड़ गए हैं । सूत्रों की मानें तो इस सर्वे में मध्यप्रदेश भाजपा के लिए सबकुछ अच्छा नहीं कहा जा सकता है। खबर है कि सत्ता संगठन से जुड़े लगभग 70 प्रतिशत जनप्रतिनिधियों से जनता खुश नहीं है।
हम अभी जनता की नाराजगी के कारणों पर नहीं जा रहे इसकी चर्चा फिर करेंगे , इस नाराजगी के दुष्प्रभाव व उनके समाधान पर भी पार्टी में पिछले एक माह के दौरान जमकर विश्लेषण हुआ है लगातार जारी सरगर्मी और समन्वय बैठकों का दौर भाजपा में बढ़ रही बेचैनी और उसके समाधन खोजने की ओर इंगित करता है।
सूत्रों का कहना है कि पार्टी शीर्ष नेतृत्व ने इस गम्भीर समस्या से निपटने का जो फार्मूला निकाला है वह सत्ता का सुख भोग रहे नेताओं के माथे पर पसीना लाने वाला कहा जा सकता है।
यह फार्मूला है 70 प्रतिशत नए चेहरों को सामने लाकर उन्हें चुनाव में उतारने का है। यह फार्मूला पार्टी के लिए कितना कारगर होगा यह तो समय ही बताएगा लेकिन इतना जरूर है कि इससे चुनावी वर्ष में पार्टी के भीतर भारी उथलपुथल हो सकती है यही वजह है कि इससे निपटने के लिए शीर्ष नेतृत्व ने अपने सफल व धीर गम्भीर रणनीतिकार नरेन्द्र तोमर को चुनाव में आगे किया है।
एकबार फिर नरेंद्र शिवराज की जोड़ी
उल्लेखनीय है कि 2014 से पूर्व पार्टी शीर्ष नेतृत्व ने जिस जोड़ी पर विश्वास किया था ऐसा लगता है कि इसबार पार्टी उसी जोड़ी के नेतृत्व में चुनावी समर फतह करने का मूड बना रही है,यह तभी सम्भव होगा जब पार्टी शीर्ष नेतृत्व वर्तमान मुख्यमंत्री के भविष्य को लेकर कोई नया निर्णय नहीं लेता है। यह देखना भी दिलचस्प होगा कि नरेंद्र सिंह तोमर नई भूमिका में कितना सफल होते हैं,ऐसा इसलिये क्योंकि इस बार पूर्व की भांति स्थितियां अनकूल नहीं कही जा सकती है उन्हें एकतरफ टिकिट वितरण में बड़े तनाव का सामना करना होगा तो दूसरी ओर पार्टी को चुनावी समर में विजय दिलाने वाले नए चेहरों की तलाश भी करनी होगी।