प्रवीण दुबे
ये राजनीति भी बहुत अजीब है यहां शतरंज की शातिर चालों के मानिंद शह और मात के खेल में माहिर चतुर सुजान नेता आगे निकल जाते हैं तो दूसरी ओर जिन्हें यह प्रपंच नहीं आता वह तमाम खूबियों के बावजूद राजनीति की मुख्यधारा से कट जाते हैं या फिर उन्हें राजनीति के चक्रव्यूह में फांस कर आगे नहीं बढ़ने दिया जाता। 80 के दशक में भाजपा की राजनीति से जुड़कर अपनी कद्दावर छवि से बड़े बड़े धुरन्धर नेताओं जिसमें तमाम विपक्षी भी शामिल थे को धूल चटाने वाले तत्कालीन मुरैना सांसद अनूप मिश्रा आज कुछ ऐसी ही राजनीति का शिकार बन गए हैं।
आप सोच रहे होंगे आखिर आज ऐसा क्या हुआ जो हमें उनकी याद आई। तो हम बताना चाहेंगे कि आज अनूप मिश्रा का जन्मदिन है और उनके समर्थकों में इसको लेकर खासा उत्साह भी नजर आ रहा है साथ ही एक बेचैनी भी दिखाई दे रही है।
इसे आजकल की राजनीति का विद्रूप स्वरूप ही कहना चाहिए कि जिस नेता ने अपने राजनीतिक जीवनकाल मेंसफलता के कई झण्डे गाड़े आज कहीं खो सा गया है। इस नेता की काबिलियत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उस समय जब कांग्रेस की मध्यप्रदेश में तूती बोला करती थी तबके तत्कालीन मंत्रियों बालेंदु शुक्ल और भगवान सिंह यादव को उसने चुनावों में धूल चटाई। यह दोनों नाम कांग्रेस के उन नेताओं में शामिल थे जिनके खिलाफ चुनाव में उतरने का मतलब केवल हार ही हुआ करता था।
इतना ही नहीं श्री मिश्रा अपने जीवन काल में 5 बार विधायक चुने गये , उमाभारती, बाबूलाल गौर और शिवराज मन्त्रीमण्डल में मंत्री रहे वर्तमान में वे मुरैना से सांसद हैं साथ ही केंद्र सरकार की कई महत्वपूर्ण संसदीय समितियों में भी वे प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। दिग्विजयसिंह शासनकाल में अनूप मिश्रा ने विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की भी प्रभावी भूमिका निभाई। श्री मिश्रा ने कई बार देश के पूर्व प्रधानमंत्री रहे वरिष्ठ नेता व उनके मामा अटलबिहारी वाजपेयी के चुनावों में भी बतोर संचालक काम किया।
इतना सब होने के बावजूद आज जब भाजपा चौतरफा सफलता के सोपान चढ़ रही है,केंद्र सहित देश के 21 राज्यों में उसकी सरकार है वह देश ही नहीं दुनिया की सबसे बड़ी व सफलतम राजनीतिक पार्टी बन चुकी है ऐसे समय में अनूप मिश्रा जैसे कद्दावर नेता नेपथ्य में क्यों चले गए हैं ..?
मध्यप्रदेश के कद्दावर नेता होने के बावजूद आज पार्टी की कोई भी बड़ी जिम्मेदारी उन्हें क्यों नहीं दी जाती ? इन प्रश्नों का जवाब आज हर वो शख्स जानना चाहता है जो श्री मिश्रा की कार्यशैली को पसंद करता है। कहा जाता है कि मध्यप्रदेश भाजपा में श्री मिश्रा उन गिने चुने नेताओं में शुमार हैं जिनके भीतर कुशल प्रशासनिक क्षमता मौजूद है। वर्तमान में बेलगाम होती नोकरशाही भाजपा को सबसे ज्यादा डेमेज कर रही है ऐसे में श्री मिश्रा एक कुशल प्रशासक की भूमिका में बेलगाम नोकरशाही में नकेल डालकर समस्या का समाधान खोज सकते हैं लेकिन आश्चर्य की बात है भाजपा के नीतिनिर्धारकों की इसमें कोई रुचि दिखाई नहीं देती बल्कि देखने में यहां तक आया है कि राज्य शासन के तमाम लोकार्पण शिलान्यास के स्थानीय
कार्यक्रमों के आमंत्रण पत्रों तक से उनका नाम एक सुनियोजित राजनीति के अंतर्गत नहीं दिया जाता ताकि वे सार्वजनिक कार्यक्रमों से दूर रहें। आखिर क्या है इस राजनीति के मायने ?कौन है इसका सूत्रधार ? इन सवालों के उत्तर आज इस कारण आवश्यक हैं क्योंकि श्री मिश्रा के जन्मदिन पर उनके समर्थकों व उनके चाहने वालों में कुछ अलग प्रकार की बेचैनी सी दिखाई देती है। बहुत बड़ा वर्ग यह कहते सुना जा रहा है कि भाजपा के ही भीतर से एक वर्ग ऐसा है जो येन केन प्रकारेण एक योग्य और कद्दावर नेता के राजनीतिक भविष्य को चौपट करने में लगा है। कुछ लोग ऐसे भी दिखाई दे रहे हैं जो श्री मिश्रा को मध्यप्रदेश में हाशिये पर डाल दिये गए ब्राह्मण वर्ग का प्रभावी नेतृत्व करने की सलाह भी दे रहे हैं,फिर चाहे इसके लिए उन्हें पार्टी गाइड लाइन को ही क्रॉस क्यों न करना पड़े।
चुनावी वर्ष में पार्टी नीतिनिर्धारकों को इस तरह एक जननेता की अनदेखी और उसके कारण उनके समर्थकों में पनप रहे आक्रोश तथा इस घटनाक्रम से जनता के बीच हो रही पार्टी की बदनामी के मा9ओ9हौल को समय रहते नियंत्रित करने की कोशिश करना चाहिए अन्यथा समय निकलने के बाद हाथ मलने के सिवा कुछ नहीं बचेगा।


