प्रवीण दुबे
देश के पूर्व सैन्य प्रमुख जनरल नरवाणे की पुस्तक फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी. पर संसद में विवाद की स्थिति बनी हुई है। इस किताब में प्रकाशित सामग्री में क्या सच है और क्या झूठ यह तो जांच का विषय है लेकिन एक पूर्व सेना अध्यक्ष द्वारा अपनी सेवानिवृति के बाद देश की सुरक्षा से जुड़े विषय को सरकार की रोक के बावजूद किसी पुस्तक में कोड करना और सरकार की रोक के बावजूद उसे सार्वजनिक करना बेहद शर्मनाक और अक्षम्य कृत्य कहा जा सकता है।
इस किताब के प्रकाशक पेंग्विन रेंडम हाउस हैं. ये किताब 2023-24 में प्रकाशित होने वाली थी, लेकिन ये अब तक अप्रकाशित है।अप्रैल 2024 में प्रकाशित होने वाली इस पुस्तक के कुछ अंश समाचार एजेंसी पीटीआई द्वारा दिसंबर 2023 में प्रकाशित किए गए थे जो कि राष्ट्रहित को प्रभावित करने वाले थे संवेदनशील खुलासों के कारण रक्षा मंत्रालय और सेना हेडक्वार्टर ने किताब की प्री-पब्लिकेशन रिव्यू कराई जिस पर अभी तक क्लियरेंस नहीं मिला है. अक्टूबर 2025 में जनरल नरवाणे ने खुद कहा, मेरा काम किताब लिखना था. अब गेंद पब्लिशर और रक्षा मंत्रालय के पाले में है।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि रोक के बावजूद सेना प्रमुख की पुस्तक कैसे प्रकाशित हुई?
सेना के नियमों में रिटायर्ड अधिकारियों के लिए स्पष्ट नियम नहीं लिखे हैं. लेकिन व्यवहार में लेफ्टिनेंट जनरल और ऊपर के रैंक के अफसरों को किताब के लिए रक्षा मंत्रालय और सेना मुख्यालय से प्री-पब्लिकेशन सिक्योरिटी क्लियरेंस लेना पड़ता है. अगर किताब में संवेदनशील ऑपरेशन, चाइना, पाकिस्तान संबंधी डिटेल, नीति-निर्माण या आंतरिक चर्चा हो तो रिव्यू करना अनिवार्य है। आश्चर्यजनक है कि इतने बड़े पद पर आसीन रहे एक एक सैन्य अधिकारी सरकार को (प्रधानमंत्री) को नीचा दिखाने देश की सुरक्षा जुड़े आंतरिक विषय को सार्वजनिक करने में तनिक भी नहीं हिचकिचाये इस मामले में जम्मू-कश्मीर के पूर्व डीजीपी एस.पी. वैद का बयान बेहद ध्यान देने योग्य है उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर जनरल नरवणे को नसीहत देते हुए कहा कि एक पूर्व सेना प्रमुख को ज्यादा समझदारी दिखानी चाहिए थी. उन्होंने लिखा कि सेना में रहते हुए जो संवेदनशील बातें पता चलती हैं, वे अक्सर कब्र के साथ ही दफन हो जानी चाहिए. अगर हर कोई ऐसी बातों को सार्वजनिक करने लगे तो सरकारें मुश्किल में पड़ सकती हैं