प्रवीण दुबे
“उल्टा चोर कोतवाल को डांटे” — यह कहावत इन दिनों मध्यप्रदेश की राजनीति में पूरी तरह चरितार्थ होती दिखाई दे रही है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी के बीच चल रहे वाकयुद्ध को लेकर कांग्रेस जिस तरह नैतिकता और मर्यादा का पाठ पढ़ाने की कोशिश कर रही है, वह कई सवाल खड़े करता है।
शाजापुर में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने जीतू पटवारी को “दो कौड़ी का प्रदेश अध्यक्ष” कहा तो कांग्रेस नेताओं ने इसे मुद्दा बनाकर प्रदेशभर में विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिए। पुतले जलाए गए, बयानबाजी हुई और मुख्यमंत्री पर अमर्यादित भाषा के प्रयोग का आरोप लगाया गया। लेकिन कांग्रेस यह बताने से बच रही है कि इस विवाद की शुरुआत आखिर किसने की थी?
वास्तविकता यह है कि कुछ दिन पहले सतना में आयोजित कांग्रेस के युवा संवाद कार्यक्रम में जीतू पटवारी ने मुख्यमंत्री मोहन यादव को “मोहन लाल अभिनंदन यादव” कहकर संबोधित किया था। केवल इतना ही नहीं, उन्होंने मुख्यमंत्री की विदाई का समय आ जाने और उनकी उल्टी गिनती शुरू होने जैसी टिप्पणियां भी की थीं। राजनीतिक आलोचना लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन जब व्यक्तिगत कटाक्ष और व्यंग्यात्मक संबोधन शुरू होते हैं तो फिर सामने से आने वाली प्रतिक्रिया पर आश्चर्य कैसा?

मुख्यमंत्री ने भी उसी शैली में जवाब देते हुए कहा, “हां, हम तो अभिनंदन लाल हैं, तुम टपोरी लाल हो।” इसके बाद उन्होंने पटवारी की चुनावी हार, इंदौर लोकसभा चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार खड़ा न कर पाने और कांग्रेस के संगठनात्मक प्रदर्शन पर भी निशाना साधा। स्पष्ट है कि यह राजनीतिक बयानबाजी थी, जिसकी शुरुआत कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष की टिप्पणी से हुई थी।
विडंबना यह है कि कांग्रेस आज भाषा की मर्यादा को लेकर सबसे अधिक चिंतित दिखाई दे रही है। जबकि राष्ट्रीय राजनीति में कांग्रेस और उसके कई नेता वर्षों से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए तीखे और विवादित शब्दों का इस्तेमाल करते रहे हैं। कभी “चौकीदार चोर है” जैसे नारे, कभी व्यक्तिगत टिप्पणियां और कभी ऐसे बयान जो राजनीतिक शिष्टाचार की सीमाओं को लांघते रहे हैं। ऐसे में जब वही कांग्रेस आज मर्यादा की दुहाई देती है तो उसकी विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है।
लोकतंत्र में आलोचना का अधिकार सभी को है। विपक्ष का काम सरकार से सवाल पूछना और सरकार का काम जवाब देना है। लेकिन यदि राजनीतिक संवाद की शुरुआत ही कटाक्ष, उपहास और व्यक्तिगत हमलों से होगी तो फिर जवाब भी उसी स्तर पर मिलने की संभावना बढ़ जाती है। ऐसे में केवल प्रतिक्रिया पर हंगामा करना और मूल कारण को छिपाना राजनीतिक ईमानदारी नहीं कहा जा सकता।
कांग्रेस को यदि वास्तव में राजनीतिक भाषा के स्तर की चिंता है तो उसे आत्ममंथन भी करना चाहिए। मर्यादा का आग्रह तब प्रभावी होता है जब वह सभी पर समान रूप से लागू हो, न कि केवल राजनीतिक सुविधा के अनुसार। अन्यथा जनता यही कहेगी कि यह वही स्थिति है जिसमें “उल्टा चोर कोतवाल को डांटे” वाली कहावत सटीक बैठती है।
राजनीति में असहमति आवश्यक है, लेकिन यदि मर्यादा की बहस होनी है तो उसकी शुरुआत स्वयं के आचरण से करनी होगी। यही लोकतांत्रिक शिष्टाचार का सबसे बड़ा मापदंड है।हम तो इतना ही कहेंगे पहले शब्दों की मर्यादा तो देखिए, फिर विरोध का ढोल पीटिए