मयंक चतुर्वेदी
भारत आज पंडित दीनदयाल उपाध्याय की 110वीं जयंती पर उन्हें स्मरण कर रहा है। यह स्मरण एक ऐसे राजनीतिक चिंतक का स्मरण है, जिसने स्वतंत्र भारत के सामने विकास की कसौटी सत्ता के शिखर पर खड़े व्यक्ति को न मानकर समाज की अंतिम पंक्ति में खड़े मनुष्य को बनाया। उनके चिंतन में गरीबी, सहायता का पात्र बनने के स्थान पर विकास का केंद्र थी।
दीनदयाल उपाध्याय की सबसे प्रसिद्ध वैचारिक कृति ‘एकात्म मानववाद’ है। अप्रैल 1965 में मुंबई में दिए गए चार व्याख्यानों में उन्होंने इस दर्शन को व्यवस्थित रूप से सामने रखा। मूल व्याख्यान भारतीय जनसंघ द्वारा प्रकाशित हुए। आधुनिक संस्करणों में यह पुस्तक विभिन्न प्रकाशकों से उपलब्ध है। भारत सरकार के प्रकाशन विभाग ने भी एकात्म मानववाद प्रकाशित किया है।
दीनदयाल के लिए मनुष्य शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा का समन्वित रूप है। मनुष्य की आवश्यकताओं को सिर्फ आर्थिक दृष्टि से देखना उनके विचार में अधूरा दृष्टिकोण है। उनकी दृष्टि में व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र और समूची सृष्टि एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। इसी कारण उनके चिंतन में संघर्ष की जगह सहयोग, प्रतिस्पर्धा की जगह पूरकता और अलगाव की जगह परस्परावलंबन का विचार सामने आता है।(पं. दीनदयाल उपाध्याय, ‘एकात्म मानववाद’, भारतीय जनसंघ, नई दिल्ली, 1965, व्याख्यान 1 से 4)।
अंत्योदय में छिपा विकास का भारतीय मानदंड
दीनदयाल उपाध्याय के चिंतन का सबसे जीवंत पक्ष अंत्योदय है। उनका प्रश्न सीधा था, विकास किसके लिए है और उसकी सफलता कैसे मापी जाएगी। उनका उत्तर था कि आर्थिक प्रगति का मूल्यांकन समाज की सबसे निचली सीढ़ी पर खड़े व्यक्ति के जीवन से होना चाहिए। उनका प्रसिद्ध वाक्य है, “आर्थिक नियोजन और आर्थिक प्रगति की सफलता का माप समाज की सबसे ऊंची सीढ़ी पर खड़े लोगों से नहीं, समाज की सबसे निचली सीढ़ी पर खड़े लोगों से किया जाएगा।”
वस्तुत: यह विचार आज भी उनके दर्शन की केंद्रीय पहचान बना हुआ है। गरीब परिवार के भोजन, किसान की आय, श्रमिक की मजदूरी, बेरोजगार को काम, असहाय को सामाजिक सुरक्षा, हर परिवार को आवास, शिक्षा और स्वास्थ्य की उपलब्धता जैसे विषय उनके आर्थिक चिंतन से जुड़ते हैं। दीनदयाल का आग्रह था कि योजनाओं की सफलता का पहला प्रश्न यह हो कि समाज के सबसे कमजोर व्यक्ति तक उसका लाभ पहुंचा या नहीं। इसी चिंतन धारा पर उनका अंत्योदय दर्शन आर्थिक नीति से सामाजिक दर्शन में बदल जाता है।
अर्थव्यवस्था का उद्देश्य मनुष्य
उनकी पुस्तक ‘भारतीय अर्थनीति : विकास की एक दिशा’ इस दृष्टि को समझने का महत्त्वपूर्ण स्रोत है। यह कृति 1958 के आसपास उनके आर्थिक चिंतन को सामने रखती है। इसी काल में उनकी अंग्रेजी कृति ‘द टू प्लान्स : प्रॉमिसेज, परफॉर्मेंस, प्रॉस्पेक्ट्स’ प्रकाशित हुई। 1958 में राष्ट्रधर्म प्रकाशन लिमिटेड से प्रकाशित इस पुस्तक के 282 पृष्ठ हैं। ‘द टू प्लान्स’ में उन्होंने ‘भारत में नियोजन का ऐतिहासिक पुनरावलोकन’ से संबंधित अध्याय के अंतर्गत भारत की पंचवर्षीय योजनाओं, कृषि, रोजगार, उद्योग, सार्वजनिक क्षेत्र, निजी क्षेत्र, सहकारिता और आर्थिक नियोजन की दिशा पर विस्तार से विचार किया है।
उनकी आर्थिक दृष्टि में अर्थ का अभाव भी संकट है और अर्थ का अनियंत्रित प्रभुत्व भी है। अत: बचत, उत्पादन, रोजगार, कृषि, लघु उद्योग, स्थानीय संसाधन और आर्थिक विकेंद्रीकरण को भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप देखने की आवश्यकता पर वह पर्याप्त जोर देते हुए यहां दिखाई देते हैं।
आधुनिकता हो, भारतीय आत्मा के साथ
दीनदयाल उपाध्याय आधुनिक विज्ञान और तकनीक के विरोधी चिंतक के रूप में सामने नहीं आते। उनका प्रश्न तकनीक के इस्तेमाल से जुड़ा था। वह पूछते हैं कि विकास की दिशा भारत की परिस्थितियों और आवश्यकताओं के अनुरूप है या वह किसी विदेशी मॉडल की नकल बन रही है। उनका आग्रह था कि आधुनिकीकरण को पश्चिमीकरण का पर्याय न बनाया जाए। भारतीय समाज की प्रकृति, गांवों की संरचना, कृषि, स्थानीय उद्योग, पारिवारिक व्यवस्था और सांस्कृतिक जीवन को ध्यान में रखकर विकास की दिशा निर्धारित की जाए।
यह विचार ‘राष्ट्र जीवन की दिशा’, ‘राष्ट्र जीवन की समस्याएं’ और ‘राष्ट्र चिंतन’ जैसी कृतियों में विभिन्न रूपों में दिखाई देता है। यहां उल्लेखित है कि दीनदयाल उपाध्याय की प्रमुख साहित्यिक कृतियों की सूची में ‘राष्ट्र जीवन की समस्याएं’, ‘राजनीतिक डायरी’, ‘राष्ट्र चिंतन’ और ‘राष्ट्र जीवन की दिशा’ प्रमुख हैं।
राष्ट्र कोई प्रशासनिक इकाई भर नहीं
दीनदयाल की राष्ट्र अवधारणा उनके एकात्म मानववाद को व्यापक आयाम देती है। उनके अनुसार राष्ट्र का निर्माण भूमि, जन और संस्कृति के जीवंत संबंध से होता है। राष्ट्र के प्रति मातृभाव, सांस्कृतिक निरंतरता और समाज की सामूहिक चेतना उनके राष्ट्र चिंतन के आधार हैं। उनकी कृति ‘राष्ट्र जीवन की समस्याएं’ स्वतंत्रता के बाद भारत के सामने उपस्थित राजनीतिक और सांस्कृतिक प्रश्नों को समझने के लिए महत्त्वपूर्ण है। वहीं ‘राष्ट्र जीवन की दिशा’ में भारतीय राष्ट्रजीवन की दिशा, सांस्कृतिक आधार और राजनीतिक दृष्टि पर विचार मिलता है। उनके विचार में स्वतंत्रता का अर्थ अपने स्वभाव और अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप राष्ट्रजीवन का पुनर्निर्माण था।
राजनीति साध्य नहीं, राष्ट्रसेवा का माध्यम
दीनदयाल उपाध्याय का राजनीतिक चिंतन उनकी कृति ‘राजनीतिक डायरी’ में विशेष रूप से दिखाई देता है। यह पुस्तक 1968 में राष्ट्रधर्म प्रकाशन से प्रकाशित हुई। वर्तमान में सुरूचि प्रकाशन इसके हिंदी और अंग्रेजी संस्करण उपलब्ध कराता है। इस पुस्तक में आर्थिक विकास, खाद्यान्न नीति, सार्वजनिक और निजी क्षेत्र, विदेश नीति, कश्मीर, चीन, लोकतंत्र, राजनीतिक दल, चुनाव व्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे विषयों पर उनकी टिप्पणियां संकलित हैं। उपलब्ध विषय सूची में ‘आर्थिक विकास की समस्याएं’, ‘सार्वजनिक क्षेत्र बनाम निजी क्षेत्र’, ‘भारत, पाकिस्तान और अमेरिका’, ‘विदेश नीति और रक्षा’ तथा ‘लोकतंत्र और राजनीतिक दल’ जैसे विषय दर्ज हैं। यहां दीनदयालजी का राजनीतिक व्यक्तित्व सामने आता है। उनके लिए राजनीति सत्ता प्राप्ति की तकनीक से अधिक राष्ट्रजीवन को दिशा देने का माध्यम थी।
व्यक्ति से समष्टि तक
एकात्म मानववाद में व्यक्ति और समाज का संबंध केंद्रीय है। पश्चिमी राजनीतिक विचार की कई धाराओं में व्यक्ति और राज्य के संबंध को प्रमुख प्रश्न बनाया गया। दीनदयाल ने भारतीय परंपरा के आधार पर व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्र के बीच स्वाभाविक संबंध को समझने का आग्रह किया। उनकी दृष्टि में व्यक्ति स्वतंत्र है, समाज से अलग नहीं। समाज व्यक्ति को पहचान देता है और व्यक्ति समाज को जीवन देता है। परिवार इस संबंध की पहली इकाई है। यही कारण है कि उनके दर्शन में परिवार, ग्राम, स्थानीय समुदाय और राष्ट्र सभी विकास की प्रक्रिया से जुड़े हैं।(सुरेश कुमार सोनी, ‘दीनदयाल उपाध्याय : ए वाइब्रेंट ह्यूमनिस्ट’, दीनदयाल रिसर्च इंस्टीट्यूट)।
आर्थिक योजना की कसौटी अंतिम व्यक्ति
1964 में ग्वालियर में हुए स्वाध्याय शिविर से लेकर 1965 के विजयवाड़ा अधिवेशन तक जनसंघ के सिद्धांत एवं नीति को व्यवस्थित करने का काम हुआ। दीनदयाल उपाध्याय के साथ अटल बिहारी वाजपेयी, दत्तोपंत ठेंगड़ी, बलराज मधोक और सुंदर सिंह भंडारी जैसे नेताओं की भूमिका इस प्रक्रिया से जुड़ी थी। स्वीकृत वैचारिक प्रारूप में भारतीय संस्कृति को एकात्मवादी बताया गया। व्यक्ति और समाज के भौतिक तथा आध्यात्मिक विकास को साथ देखने, परस्परावलंबन और सहयोग को सामाजिक जीवन का आधार बनाने तथा आर्थिक योजनाओं की कसौटी समाज के सबसे निचले स्तर पर मौजूद व्यक्ति को बनाने की दिशा सामने आई।
यहां दीनदयाल का अंत्योदय और एकात्म मानववाद एक दूसरे से जुड़ते हैं। एकात्म मानववाद मनुष्य को समग्र रूप में देखता है। अंत्योदय उस दर्शन की सामाजिक कसौटी बन जाता है। वस्तुत: दीनदयाल उपाध्याय को समझने का प्रभावी रास्ता उनके राजनीतिक जीवन को उनके दर्शन से जोड़कर देखना है। उनके लिए राष्ट्र निर्माण का अर्थ आर्थिक उत्पादन बढ़ाना भर नहीं था। मनुष्य का सम्मान, समाज की एकता, सांस्कृतिक आत्मविश्वास, आर्थिक स्वावलंबन और अंतिम व्यक्ति का उत्थान राष्ट्र निर्माण के समानांतर लक्ष्य थे।
आज जब विकास की चर्चा सकल घरेलू उत्पाद, निवेश, अवसंरचना और तकनीकी प्रगति के आंकड़ों में होती है, तब दीनदयाजी का मूल प्रश्न फिर सामने आता है। इन उपलब्धियों का लाभ उस व्यक्ति तक कितनी गहराई से पहुंचा जो गांव के अंतिम घर में रहता है, जिसके पास संसाधन सीमित हैं और जिसकी आवाज सत्ता के गलियारों तक सबसे देर से पहुंचती है। यहीं उनका अंत्योदय आज भी अपनी प्रासंगिकता रखता है।सबका साथ और सबका विकास यह कहने से अधिक आचरण का विषय है।