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अपने पिता माधवराव की तरह गांधी खानदान के परम्परागत विरोध का शिकार होते ज्योतिरादित्य सिंधिया

तमाम योग्यताओं, ईमानदार छवि, ऊर्जावान कार्यशैली व पार्टी को जबरदस्त सफलता दिलाने के बावजूद मुख्यमंत्री पद से  दूर रखे जाने का षडयंत्र

 

आज एकबार फिर स्व.माधवराव सिंधिया की याद आ रही है ,आप सोच रहे होंगे कि जब ज्योतिरादित्य चर्चा में हैं तब हमें स्व. माधवराव क्यों याद आ रहे हैं ? तो हम बताते हैं ,ऐसा इसलिए क्यों कि कांग्रेस को संचालित करने वाले गांधी परिवार ने तमाम योग्यता और जनाधार होने के बावजूद जिस प्रकार 1984 के बाद माधवराव की अनदेखी की और अर्जुन सिंह ,दिग्विजय सिंह जैसे नेताओं को  आगे बढ़ाया आज ठीक उसी प्रकार गांधी परिवार ज्योतिरादित्य की ऊर्जावान छवि , चम्बल सम्भाग में जबरदस्त जनाधार को नजरअंदाज करता दिखाई दे रहा है। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री पद के लिए ज्योतिरादित्य का नाम तय किये जाने की जगह उनके सामने उपमुख्यमंत्री पद स्वीकार करने का दबाव राहुल और सोनिया गांधी की तरफ से डाला जा रहा है ताकि मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री पद की कमान कमलनाथ को सौंपी जा सके।

 

सर्वविदित है कि स्व. माधवराव सिंधिया ग्वालियर अंचल ही नहीं पूरे मध्यप्रदेश में विकासपुरुष के नाम से प्रसिद्ध थे ग्वालियर अंचल की जनता उनकी ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठ कार्यव्यवहार के कारण बला का प्रेम करती थी, इतना सब होने के बावजूद माधवराव कभी मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री नहीं बन सके एक नहीं कई बार जब ये मौका आया गांधी परिवार ने माधवराव सिंधिया के नाम को दरकिनार करके कभी अर्जुन सिंह तो कभी दिग्विजय सिंह  को आगे कर दिया। यहां तक कि राजीव गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस में सबसे लोकप्रिय ईमानदार और योग्य नेता कोई था तो वो माधवराव सिंधिया ही थे लेकिन वे सदैव पीछे ही ढकेले जाते रहे।एकबार तो स्व.सिंधिया के खिलाफ हालात इतने खराब हो गए कि उन्हें कांग्रेस से इतर अलग दल बनाकर चुनाव में उतरना पड़ा था।

 

आज मध्यप्रदेश में जब कांग्रेस का 15 साल का वनवास समाप्त हुआ है और इस वनवास को समाप्त कराने के सबसे बड़े युवा हीरो के रूप में उभर कर आये ज्योतिरादित्य सिंधिया भी अपनी पिता की तरह गांधी परिवार व उसके सबसे नजदीकी सिपहसालार दिग्विजय सिंह जैसे नेताओं की चालाकी व अनदेखी का शिकार होते दिखाई दे रहे हैं।

 

यह सच है कि कमलनाथ सबसे बुजुर्ग व अनुभवी नेता हैं लेकिन यह भी उतना ही सच है कि पिछले चार पांच वर्षों में कांग्रेस के भीतर ज्योतिरादित्य ने जो योग्यता व परिपक्वता का परिचय दिया है वह उनके ग्राफ को बहुत ऊपर ले गया है। संसद की बात हो यह मध्यप्रदेश में चुनाव संचालन समिति के अध्यक्ष हो के नाते निर्णय लेने की बात हो अथवा कांग्रेस के सत्ता में रहते केंद्रीय मंत्री के रूप में उनके कार्यों व ईमानदारी का विश्लेषण हो ज्योतिरादित्य सिंधिया  मध्यप्रदेश के वर्तमान कांग्रेस नेताओं से कई गुना आगे नजर आते हैं।

 

हाल ही के विधानसभा चुनाव में उनकी जिम्मेदारी वाली ग्वालियर चम्बल की 34 में से 26 सीटों पर कांग्रेस को जीत दिलाने का श्रेय भी ज्योतिरादित्य को ही जाता है। इतना सब होने के बावजूद कांग्रेस में सक्रिय सिंधिया विरोधी नेताओं और गांधी परिवार की जुगलबंदी के कारण ज्योतिरादित्य मुख्यमंत्री पद से दूर होते दिखाई दे रहे है । उनके खिलाफ गांधी परिवार की मंशा को बड़ी चतुराई से भांपते हुए दिग्विजय, कमलनाथ पचौरी जैसे नेताओं ने एकजुटता दिखाते फिलहाल ज्योतिरादित्य को किनारे लगाने व कमलनाथ को मुख्यमंत्री बनाने का रास्ता साफ कर दिया है इसी सिंधिया विरोधी रणनीति के तहत ज्योतिरादित्य को मध्यप्रदेश की राजनीति में दोयम दर्जे पर रखने के लिए उपमुख्यमंत्री पद का ऑफर दिया जा रहा है जो सरासर गलत होने के साथ युवा नेतृत्व को आगे न आने देने की मानसिकता का भी परिचायक है।

 

 

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