भोपाल से सुबोध अग्निहोत्री की रिपोर्ट
मध्य प्रदेश के इतिहास में यह पहिला मौका होगा जब बिना नेता प्रतिपक्ष के विधानसभा का बजट व वर्षा कालीन सत्र का समापन होगा।बजट सत्र 20 जुलाई से 24 जुलाई तक मात्र पांच दिन चलेगा।इस सत्र में विधिवत नेता प्रतिपक्ष न होकर विधायक दल के नेता के रूप में पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ मौजूद रहेंगे।यद्यपि कमलनाथ कांग्रेस विधायक दल के नेता हैं न कि सदन के।लेकिन सरकार गिरने के बाद से अभी तक नेता प्रतिपक्ष के लिए कोई कवायद नहीं हुई है।सरकार गिरने के बाद से कांग्रेस में गुट बाजी चरम पर पहुंच गई है।हालत यह है कि मुख्यमंत्री भी कमलनाथ रहना चाहते हैं,प्रदेशाध्यक्ष भी वही बने रहना चाहते हैं और नेता प्रतिपक्ष भी स्वयं ही रहनाचाहते हैं।जब सारे पदों पर कमलनाथ ही काबिज रहेंगे तो कांग्रेस के वरिष्ठ नेता क्या करेंगे?सही तो यहहै की कमलनाथ को चंद लोगो ने जकड़ लिया है,वे ही उनके आंख व कान बने हुए हैं।कमलनाथउन्ही की आखों से देखते हैं और उन्ही के कानों से सुनते हैं।सरकार गिरने की इतनी बड़ी चोट लगने के बाद भी कमलनाथ सम्भले नही है।वे न तो सबको साथ लेकर चलना चाहते हैं और न ही सामंजस्य बिठाना चाहते हैं।इसका खामियाजा प्रदेश में होने वाले 24 उप चुनावों में देखने को मिलेगा।कमलनाथ ने घोषणा कर दी है कि वे सर्वे के आधार पर टिकिट देंगे।ठीक भी है लेकिन जब स्थानीय नेता ही मदद नही करेंगे तो सर्वे क्या चूँ चूँ बोलेगा।ग्वालियर-चम्बल संभाग में कांग्रेस का जो भी नेट वर्क है वह दिग्विजय सिंह का ही है ।यहाँ कमलनाथ के लोग ही नही हैं, ऐसे में यदि दिग्विजय सिंह के लोगों को कमलनाथ ने नजरअंदाज किया तो उनका दुबारा मुख्यमंत्री बनने का सपना चूर हो जाएगा।
बताते हैं कि सरकार गिराने का पूरा ठीकरा कमलनाथ कंपनी दिग्विजय सिंह पर फोड़ रही है।जबकि दिग्विजय खेमे के लोग बताते हैं कि सरकार कमलनाथ की वजह से ही गिरी।इसके पीछे कारण यह बताए गए कि दिग्विजय सिंह ने कई बार कहा कि कमलनाथ,दिग्विजय और सिंधिया गुट के एक -एक मंत्री से स्तीफा लेकर तीन लोगों को एडजस्ट किया जाए और खाली पड़े छः पदों पर भी मंत्री बना दिये जायें।साथ ही निगम,मंडल,आयोगों में भी नियुक्तियां कर दी जाएं ताकि विरोध को समाप्त किया जा सके।लेकिन कमलनाथ इस काम को करते ,तब तक बहुत देर हो चुकी थी। कमलनाथ अच्छे व्यक्ति हैं यह तो सब स्वीकार करते हैं लेकिन उन्हें सफल राजनीतिज्ञ कोई मानने को तैयार नहीं है।क्योंकि अल्पमत सरकार को हर कदम सोच समझ कर उठाना चाहिए ,उसमे कमलनाथ का मैनेजमेंट फेल साबित हुआ।साथ ही रही सही कसर नोकरशाही ने पूरी कर दी।कमलनाथ की इंटेलिजेंस इतनी फेल रही कि उन्हें कानो कान विधायकों की खरीद फरोख्त या बेंगलुरु जाने की भनक तक नही लगी।बिसहलाल सिंह जैसे लोग लौटकर आये भी तो उनकी भी पूछ परक नही हुई।नतीजतन वे फिर लौटकर बेंगलुरु चले गए।अब जब चौबीस उप चुनावों में कांग्रेस को एक जुट होने की जरूरत है तब वे आपस में ही ताल ठोक कर मैदान में लड़ने को तैयार खड़े हैं।नेता प्रतिपक्ष के मुद्दे पर भी कांग्रेस में खेमे बाजी चल रही है।न वरिष्ठता का ध्यान रखा जा रहा है और न कनिष्ठता का।लिहाज़ा कांग्रेस अपने आप से ही जूझ रही है।एक दूसरे को नीचा दिखाने का काम भी बखूबी चल रहा है।ऐसे में कांग्रेस का पुनः सत्ता प्राप्ति का सपना सपना ही बना रहेगा।सत्ता में आने के लिए कांग्रेस को सभी चौबीस सीटें जीतना होंगी ,तभी वह 116 की संख्या पर पहुंच पाएगी।अन्य दलों व निर्दलीय जिनकी संख्या सात है वे कांग्रेस के साथ आते हैं या नहीं।यह परिस्थितियो पर निर्भर करता है।फिर ग्वालियर-चम्बल संभाग में जहां सोलह सीटों पर उप चुनाव होना है वहां कांग्रेस के पास दिग्विजय सिंह,डॉ. गोविंद सिंह,राम निवास रावत, लाखन सिंह,अशोक सिंह सहित दिग्गी राजा की टीम है।वहीं भाजपा के पास ज्योतिरादित्य सिंधिया,नरेंद्र सिंह तोमर,प्रदेश भाजपा अध्यक्ष विष्णु दत्त शर्मा (जो कि मुरैना के मूल निवासी हैं),कद्दावर मंत्री जो कि चुनावी रणनीति के कुशल शिल्पकार हैं नरोत्तम मिश्रा और राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रभात झा।ये सब ग्वालियर से ही जुड़े हुए हैं।इस स्थिति में भाजपा को कांग्रेस कितनी टक्कर दे पाएगी,यह समय ही बताएगा।यह अलग बात है कि भाजपा का नाराज खेमा कुछ गुल खिला दे।अन्यथा भाजपा को टक्कर दे पाना बहुत ही मुश्किल काम है।
तो क्या दिल्ली जाएंगे कमलनाथ
कमलनाथ के खास लोग बताते हैं कि सरकार जाने के बाद भी कमलनाथ भोपाल में ऐसे ही नही रुके हैं।वे कुछ न कुछ जुगाड़ में जरूर हैं।बताते हैं कि कमलनाथ को सरकार बनती दिख रहीहै इसीलिए वे रुके हुए हैं अन्यथा अभी तक तो दिल्ली चले जाते।कहते हैं कि उप चुनावो के बाद सरकार नही बनी तो कमलनाथ भोपाल नही रहेंगे।वे सरकार बनने के प्रति आशान्वित हैं और इसीलिए भोपाल में हैं।
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