अभी तक चीनी की बढ़ती कीमतो ने हाहाकार मचा रखा था अब प्याज ने आंखें तरेर कर देशवासियों को महंगाई का डबल डोज दे दिया है
भारत की राजनीति में प्याज सिर्फ रसोई का स्वाद नहीं, बल्कि कई बार सत्ता का समीकरण भी बदल चुका है। 1980 के लोकसभा चुनाव से लेकर 1998 के विधानसभा चुनाव तक प्याज की कीमतों ने राजनीतिक दलों को बड़ा सबक दिया है। अब एक बार फिर प्याज के बढ़ते दाम आम आदमी की रसोई से लेकर सरकार की चिंता तक बढ़ा रहे हैं।
देश के कई बड़े शहरों में प्याज की खुदरा कीमत 55 से 65 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई है। दिल्ली में इसका भाव 65 रुपये किलो के पार बताया जा रहा है। पिछले कुछ समय में प्याज की कीमतों में करीब 50 फीसदी की तेजी देखने को मिली है। ऐसे में पहले से महंगी चीनी के बीच प्याज की बढ़ती कीमत ने घरेलू बजट पर दोहरी मार कर दी है।
प्याज की कीमतों में 50 फीसदी तक उछाल
उपभोक्ता मामलों के विभाग के आंकड़ों के मुताबिक प्याज की औसत कीमत करीब 42 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई है। यह पिछले साल की तुलना में लगभग 50 फीसदी और पिछले महीने के मुकाबले करीब 19 फीसदी अधिक है।
देश की प्रमुख प्याज मंडी नासिक में भी थोक कीमतों में तेज उछाल आया है। बताया जा रहा है कि पिछले एक महीने में यहां प्याज की थोक कीमत करीब 76 फीसदी बढ़ी है।
बड़े शहरों में प्याज के दाम
दिल्ली: 65 रुपये किलो
चेन्नई: 58 रुपये किलो
लखनऊ: 60 रुपये किलो
भोपाल : 55रूपये किलो
नोएडा: 60 रुपये किलो
वाराणसी: 55 रुपये किलो
मेरठ: 50 रुपये किलो
कानपुर: 50-55 रुपये किलो
गाजियाबाद: 50-60 रुपये किलो
मुरादाबाद: करीब 40 रुपये किलो
आखिर क्यों महंगा हो रहा है प्याज?
प्याज की कीमतों में तेजी की बड़ी वजह खरीफ प्याज के उत्पादन में कमी और फसलों के बीच सप्लाई गैप को माना जा रहा है। महाराष्ट्र में खरीफ प्याज का उत्पादन करीब 5-7 फीसदी घटने से बाजार पर दबाव बढ़ा है।
इसके अलावा मानसून की अनिश्चितता, बुवाई में देरी और सरकारी खरीद में कमी का असर भी बाजार पर पड़ा है। रबी और खरीफ फसल के बीच आने वाले अंतराल में प्याज की उपलब्धता कम होने से कीमतों में तेजी देखी जा रही है।
हालांकि कृषि मंत्रालय के दूसरे अग्रिम अनुमान के मुताबिक वित्त वर्ष 2025-26 में देश में प्याज का कुल उत्पादन करीब 307 लाख टन रहने का अनुमान है, जो पिछले वित्त वर्ष के आसपास ही है। इसके बावजूद खरीफ प्याज की उपलब्धता में कमी ने बाजार में कीमतों को ऊपर धकेल दिया है।
NAFED-NCCF ने खरीदा 1.2 लाख टन प्याज
बढ़ती कीमतों को नियंत्रित करने के लिए किसान सहकारी संस्थाओं NAFED और NCCF ने मौजूदा वित्त वर्ष के लिए करीब 1.2 लाख टन प्याज का बफर स्टॉक खरीदा है।
मई में प्याज की खरीद का भाव करीब 1,270 रुपये प्रति क्विंटल तय किया गया था। बाद में इसे बढ़ाकर करीब 2,645 रुपये प्रति क्विंटल कर दिया गया।
सरकार अब इसी बफर स्टॉक को बाजार में उतारकर कीमतों पर दबाव कम करने की तैयारी में है।
महंगाई रोकने के लिए फिर चलेगी ‘कांदा एक्सप्रेस’
प्याज की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए सरकार ने एक बार फिर ‘कांदा एक्सप्रेस’ के जरिए प्याज को महाराष्ट्र से देश के दूसरे हिस्सों तक पहुंचाने की योजना बनाई है।
महाराष्ट्र में प्याज को ‘कांदा’ कहा जाता है। इसी वजह से प्याज लेकर चलने वाली इस विशेष मालगाड़ी को ‘कांदा एक्सप्रेस’ नाम दिया गया है।
नासिक से दिल्ली, चेन्नई, कोच्चि और गुवाहाटी जैसे शहरों तक बफर स्टॉक पहुंचाने की तैयारी है। सरकार का मानना है कि रेल के जरिए बड़ी मात्रा में प्याज अपेक्षाकृत कम परिवहन लागत में तेजी से देश के अलग-अलग बाजारों तक पहुंचाया जा सकता है।
अक्टूबर 2024 में भी प्याज की कीमतों में तेज उछाल के दौरान सरकार ने ‘कांदा एक्सप्रेस’ का इस्तेमाल किया था।
चीनी के बाद अब प्याज ने बढ़ाई चिंता
रसोई के बजट पर पहले से ही चीनी की बढ़ती कीमतों का दबाव है। पिछले कुछ महीनों में चीनी की कीमतों में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। करीब 48 रुपये किलो से बढ़कर 70 रुपये किलो तक पहुंची चीनी के बीच अब प्याज के दाम में तेजी ने आम परिवारों की चिंता और बढ़ा दी है।
यानी खाने की थाली में रोज इस्तेमाल होने वाली दो अहम चीजें—चीनी और प्याज—महंगी हो रही हैं। इसका सीधा असर घरेलू बजट पर पड़ रहा है।
प्याज और सत्ता का पुराना रिश्ता
भारत की राजनीति में प्याज की कीमतों का इतिहास काफी दिलचस्प रहा है। 1980 के लोकसभा चुनाव में प्याज की महंगाई को इतना बड़ा राजनीतिक मुद्दा माना गया कि उसे ‘प्याज चुनाव’ तक कहा गया।
1998 में भी प्याज की कीमतों में अचानक तेज उछाल ने तत्कालीन भाजपा सरकार को बड़ा राजनीतिक नुकसान पहुंचाया था। उस समय दिल्ली में प्याज की कीमत करीब 40 रुपये किलो तक पहुंच गई थी, जो उस दौर में बेहद ऊंची मानी जाती थी।
यही वजह है कि प्याज की कीमतों में तेजी को सरकारें महज बाजार की समस्या नहीं मानतीं। प्याज की कीमत सीधे आम आदमी की रसोई और उसके घरेलू बजट से जुड़ी है और इसका राजनीतिक असर भी देखने को मिलता रहा है।
अब सवाल—क्या ‘कांदा एक्सप्रेस’ रोक पाएगी महंगाई?
सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती प्याज की उपलब्धता बढ़ाकर कीमतों को सामान्य स्तर पर लाने की है। बफर स्टॉक को बाजार में उतारने, कांदा एक्सप्रेस चलाने और जमाखोरी पर निगरानी बढ़ाने जैसे कदम इसी दिशा में उठाए जा रहे हैं।
लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या सरकारी हस्तक्षेप प्याज की बढ़ती कीमत पर तत्काल ब्रेक लगा पाएगा?
क्योंकि प्याज की कीमत सिर्फ बाजार का आंकड़ा नहीं है। यह सीधे आम आदमी की रसोई से जुड़ी है और भारतीय राजनीति का इतिहास बताता है कि जब ‘कांदा’ आंखों में आंसू लाता है, तो उसका असर कभी-कभी सत्ता के गलियारों तक भी पहुंच जाता है।