पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जनपद मुजफ्फरनगर में शुकतीर्थ में शुकदेव आश्रम का प्राचीन वट वृक्ष देश के सबसे प्राचीन पांच वटवृक्षों में शामिल है। पौराणिक मान्यता है कि 5126 वर्ष पूर्व महर्षि शुकदेव जी ने गंगा तट पर एक टीले पर लगे इस विशाल वटवृक्ष के नीचे बैठकर ही राजा परीक्षित को श्रीमद्भागवत कथा सुनाई थी।
इस प्राचीन वटवृक्ष को देशभर में स्वामी कल्याण देव जी महाराज ने धार्मिक पहचान दिलाई। वट सावित्री व्रत पर देशभर से हजारों महिलाएं यहां पर विशेष पूजा करने के लिए पहुंचती रही हैं लेकिन इस बार कोरोना काल में लगातार दूसरे वर्ष भी यहां पर श्रद्धालुओं के लिए प्रवेश को सीमित किया गया है
देश मे पांच वृक्ष सबसे प्राचीन पेड़ माने जाते हैं। इनमें चार वटवृक्ष हैं, जबकि एक पीपल का वृक्ष है। जो पांच प्रावीन वटवृक्ष माने गए हैं, उसमें प्रयागराज का अक्षय वट, उज्जैन का सिद्ध वट, मथुरा का वंशी वट और शुकतीर्थ का प्राचीन अमरवट शामिल है। यह चारो वटवृक्ष लोगों की आस्था का केंद्र हैं। शुकतीर्थ के इस प्राचीन वटवृक्ष के नीचे कलियुग के प्रारंभ में राजा परीक्षित को सात दिन में तक्षक सांप के ढसने से मौत के श्राप के बाद महर्षि शुकदेव जी ने पहली बार श्रीमद्भागवत कथा सुनाई थी।
मान्यता है कि श्रीमद्भावगत सुनकर यह वटवृक्ष भी धर्ममय हो गया। इसकी पूजा करने को पूरे वर्ष में लाखों श्रद्धालु शुकतीर्थ पहुंचते हैं। स्वामी कल्याणदेव जी महाराज ने भागवत कथा के इस प्राकट्य स्थल पर शुकदेव आश्रम की स्थापना कर इस वटवृक्ष को धार्मिक महत्व दिलाया। प्रत्येक वर्ष इस वटवृक्ष की ज्येष्ठ अमावस्या को पूजा अर्चना करने पूरे देश से सुहागिन महिलाएं पहुंचती हैं और व्रत रखकर वट सावित्री व्रत की कथा पेड के नीचे ही सुनती है लेकिन दो वर्षो से कोरोना काल में यहां पर श्रद्धालुओं के आवागमन पर प्रशासन ने कोरोना गाइडलाइन के अनुसार रोक लगा रखी है।
अन्य वटवृक्षों की धार्मिक महत्ता
अक्षय वट के बारे में कहा गया है कि इसी पर सृष्टि के प्रारंभ में जब सब ओर पानी होता है तो भगवान बाल रूप में इस पर विराजमान रहते हैं। वृंदावन के वंशीवट का वर्णन पुराणों में भगवान श्रीकृष्ण के महारास के संबंध में किया गया है। इसी वंशीवट के नीचे श्रीकृष्ण महारास रचाया करते थे।