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आरएसएस की ग्वालियर बैठक में दिखाई देगा संघ के समरसता भाव का अनूठा उदाहरण, होंगे लघु भारत के दर्शन

प्रवीण दुबे

ग्वालियर /समरसता, सदभावना के सही मायने में दर्शन करना चाहते हैं तो राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ को जानिये समझिये हम ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि ग्वालियर में होने जा रही आरएसएस की अखिल भारतीय स्तर की बैठक में जहां मिनी भारत का दृश्य दिखाई देने वाला है वहीं दीपावली त्यौहार पर समरसता का अनूठा उदाहरण दिखाई देगा।

इन दिनों शिवपुरी लिंक रोड स्थित सरस्वती शिशु मंदिर परिसर में  आरएसएस की अखिल भारतीय बैठक  को लेकर तैयारियां जोर शोर से जारी हैं।
जैसी की जानकारी है उसके अनुसार इस बैठक में देशभर से आरएसएस के तमाम  अनुषांगिक सांगठनों के लगभग 400 से अधिक पूर्णकलिक प्रचारक सहित संघ के प्रथम श्रेणी से जुड़े सभी अखिल भारतीय अधिकारी जिसमें सरसंघचालक डॉ मोहन भागवत भी शामिल होंगे ग्वालियर आ रहे हैं । कुल मिलाकर इस बैठक के लिए देशभर से  केदारधाम में 550  लोगों का जमावड़ा आरएसएस के शताब्दी वर्ष हेतु खुद को अपडेट करने के लिए एकत्रित होने जा रहा है।

समरसता का अनूठा उदाहरण

देशभर से आ रहे संघ के स्वयंसेवकों के इतने बड़े जमावडे में न तो जाति न धर्म केवल सत्य सनातन संस्कृति के दर्शन होंगे वहीं बैठक के दौरान पड़ने जा रहे दीपावली त्यौहार को ग्वालियर के स्वयंसेवक अनूठे अंदाज में मनाने की योजना बना रहे हैं। इसके माध्यम से जहां ग्वालियर के सभी संघ स्वयंसेवकों की इस बड़ी बैठक के साथ खुद की सहभागिता का भाव जागृत होगा वहीं समरसता के संदेश का प्रगटीकरण भी होगा।
इस योजना के अनुसार दीपावली त्यौहार पर ग्वालियर के संघ परिवारों में बनने वाले परम्परागत पकवानों को एकत्रित किया जाएगा और देशभर से   बैठक में आए लोगों तक पहुँचाया जाएगा।  ग्वालियर विभाग से जुड़े संघ स्वयंसेवकों ने इसकी व्यापक योजना तैयार कर ली है।
उधर केदारधाम में बैठक के दौरान सभी स्वयंसेवक एक साथ बैठकर  रहना खाना करेंगें न कोई बड़ा न कोई छोटा न जाति न वर्ण केवल समरसता और सदभावना का अद्भुत संगम साकार होता दिखाई देगा और यही संघ की सौ साल से चली आ रही परम्परा है।

संघ में सब बराबर

 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का एक ध्येय ‘परंम् वैभवम नेतुमेतत्वस्वराष्ट्रं’ यानी राष्ट्र को परम वैभव की ओर ले जाना है. संघ ने ऐसा किया भी है. जो संघ के ध्येय है उसके अनुरूप संघ ने अपनी कार्यपद्धति का भी निर्माण किया है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का संघ कार्य करने भी अपना तरीका है. यह तरीका स्वयं अपना प्रचार करने का नहीं है बल्कि व्यक्तिगत संपर्क का है. व्यक्तिगत संपर्क से संबंधों में आत्मीयता आती है. संघ शिविरों के इतर सहभोज भी संघ की कार्यपद्धति में से एक है. इसमें स्वयंसेवक किसी स्वयंसेवक के यहां बैठकर भोजन करते हैं. सभी अपने घरों से भोजन लेकर आते हैं और साथ में बैठकर मिल-बांटकर भोजन करते हैं. यहां सब बराबर होते हैं. किसी के बीच कोई भेद-भाव नहीं होता. इसी का जीवंत प्रमाण ग्वालियर बैठक में भी दिखाई देगा।

संघ की समरसता सदभावना देख बाबा साहेब भी हुए थे प्रभावित 

समाज को समरसता के सूत्र में पिरोकर उसे संगठित और सशक्त बनाने वाले महानायकों में से एक डॉ. भीमराव आंबेडकर  बाबा साहेब 1935 और 1939 में संघ शिक्षा वर्ग में गए थे. 1937 में उन्होंने कतम्हाडा में विजयादशमी के उत्सव पर संघ की शाखा में भाषण भी दिया था. इस दौरान वहां 100 से अधिक वंचित और पिछड़े वर्ग के स्वयंसेवक थे. जिन्हें देखकर डॉ. आंबेडकर को आश्चर्य तो हुआ ही बल्कि भविष्य के प्रति उनकी आस्था भी बढ़ी.

जब  संघ के शीत शिविर में पहुंचे गांधीजी 

सामाजिक समरसता का कार्य संघ अपनी स्थापना के पहले दिन से ही करता आ रहा है. 1934 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का शीत शिविर वर्धा में महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) के आश्रम के पास ही लगा था. उन्होंने शिविर को देखने इच्छा प्रकट की. वर्धा के संघचालक अप्पाजी जोशी ने उनका स्वागत किया. महात्मा गांधी ने बड़ी बारीकी से शिविर का निरीक्षण किया. उन्होंने अप्पाजी से पूछा, इस शिविर में कितने हरिजन हैं ? अप्पाजी ने जवाब दिया. यह बताना कठिन है, क्योंकि हम सभी को हिंदू के रूप में ही देखते हैं. इतना हमारे लिए पर्याप्त है. इसके बाद उन्होंने स्वयं शिविर में भाग ले रहे स्वयंसेवकों से उनकी जाति पूछी तो उन्हें पता लगा कि तमाम जातियों के स्वयंसेवक शिविर में मौजूद हैं लेकिन एक दूसरे की जाति को लेकर आपस में उनमें कोई भेद नहीं करता.

अगले दिन डॉ. हेडगेवार नागपुर से वहां आए तो वह महात्मा गांधी से मिलने गए. महात्मा गांधी ने उनसे जानना चाहा कि संघ में अस्पृश्यता निवारण का कार्य किस प्रकार किया जाता है. इस पर डॉ. हेडगेवार ने कहा ‘हम अस्पृश्यता दूर करने की बात नहीं करते बल्कि हम स्वयंसेवकों को इस प्रकार विचार करने के लिए प्रेरित करते हैं कि हम सभी हिंदू हैं और एक ही परिवार के सदस्य हैं. इससे किसी भी स्वयंसेवक में इस तरह का विचार नहीं आता है कि कौन किस जाति का है?

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