नीलम जगदीश गुप्ता
२०१५-१६ में इस कानून के अंतर्गत चलाये गए लगभग ६००० मामले फर्जी निकले. २०१६-१७ में तो इनकी संख्या ११००० के भी ऊपर पहुँच गयी थी. हमारी न्याय व्यवस्था के अंतर्गत कोई मुकदमा फर्जी है या असली इसका फैसला होने में लम्बा समय लग जाता है और तब तक, जिसके ऊपर आरोप लगाया गया है, उसे काफी समय जेल के पीछे बिताना पड़ता है. इससे उसका नौकरी या व्यापार चौपट हो जाता है और अनेक सामाजिक, पारवारिक समस्याएं पैदा हो जाती हैं.
पिछले कुछ दिनों से देख रही हूँ कि समाज बहुत उद्वेलित है. भारत बंद आदि उसी उद्वेलन का ही प्रगटन हैं. समाज के इस उद्वेलन का कारण है अजा जजा अत्याचार निवारण कानून. हमारा अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति समाज इसे अपने ऊपर हुए और हो रहे अत्याचार के खिलाफ एक हथियार के रूप में देखता है तो बाकि समाज इसे काले कानून के रूप में. दोनों के अपने अपने तर्क है जो उनके अपने दृष्टिकोण से सही हैं. पर क्या वास्तव में ये मामला एक के सही होने का और दूसरे के गलत होने का है, काले और सफ़ेद की तरह, या फिर ये भी हमारे जीवन के अनेक मामलों की तरह ही धूसर रंग लिए हुए एक जटिल मामला है.
इस बीच दक्षिण भारतीय शोधकर्ता डॉ सूफिया पठान के एक शोध पत्र के कुछ बिदुओ का उल्लेख समीचीन है । राष्द्रीय अपराध समाचार ब्यूरो (एनसीआरबी) द्वारा 1995 से ही उन अपराधों की अलग सूची जारी की जाती है जो समाज के कमजोर तबको के विरुद्ध होते हैं। लेकिन अनुसूचित जाति के लोगों द्वारा झेले गए सभी अपराधों को अनुसूचित जाति पर अपराध बता दिया जाता है । जवकि अत्याचार निरोधक कानून के अन्तर्गत हुए अपराधों की संख्या अत्यंत कम है । देश में अनुसूचित जातियों की कुल जनसंख्यां 17 प्रतिशत है 2016 में दर्ज मामलों में एक प्रतिशत ही अजा के विरूद्ध है । इसका अर्थ हुआ शेष 83 प्रतिशत जनता ने 99 प्रतिशत अत्याचार झेले |
पर न प्रेसमीङिया न एनजीओ न राजनीतिक दल इसका संज्ञान लेते हैं । उल्टे इसे भावनात्मक मुददा बनाकर अपनी रोटियां सेकते हैं । जैसे रोहित वेमूला का मुद्दा । (संदर्भ _शंकर शरण )
जब २० मार्च २०१८ को उच्चतम न्यायालय ने १९८९ में बने इस कानून की गड़बड़ियों को सुधारा तो वह पिछले ढाई दशक के हमारे कड़वे अनुभवों पर ही आधारित था. कानून की आड़ में लोंगों ने झूठे मुकदमे दर्ज करवा कर हजारों निर्दोष लोंगों को जेल के सींखचों के पीछे डलवा दिया था. २०१५-१६ में इस कानून के अंतर्गत चलाये गए लगभग ६००० मामले फर्जी निकले. २०१६-१७ में तो इनकी संख्या ११००० के भी ऊपर पहुँच गयी थी. हमारी न्याय व्यवस्था के अंतर्गत कोई मुकदमा फर्जी है या असली इसका फैसला होने में लम्बा समय लग जाता है और तब तक, जिसके ऊपर आरोप लगाया गया है, उसे काफी समय जेल के पीछे बिताना पड़ता है. इससे उसका नौकरी या व्यापार चौपट हो जाता है और अनेक सामाजिक, पारवारिक समस्याएं पैदा हो जाती हैं. अजा जजा वर्ग के सामाजिक और आर्थिक रूप से सक्षम कई लोंगों के ऐसे उदाहरण भी सामने आये हैं जिनमें उन्होंने सामान्य वर्ग के लोगों को धमकाने और ब्लैकमेल करने के लिए इस कानून का दुरूपयोग किया है. प्राइवेट और सरकारी दोनों तरह की नौकरी में यदि बॉस सामान्य वर्ग से है और अधीनस्थ अजा जजा वर्ग से तब तो बॉस उसे सही कारण होने पर भी नहीं डाट पाता है, उलटे अपने अधीनस्थ अजा जजा वर्ग के कर्मचारी से डरा हुआ ही रहता है. ग्वालियर में कई ऐसे परिवारों को जानती हूँ जो अपने अजा जजा वर्ग के पडोसी से डरे हुए रहते हैं. नॉएडा में सेना के सेवानिवृत अधिकारी के साथ उसके अजा जजा वर्ग के आर्थिक एवं सामाजिक रूप से सक्षम पड़ोसी द्वारा इस कानून के दुरूपयोग का प्रकरण अभी अखवारों की सुर्खियाँ बना ही था. वो तो सेना के हस्तक्षेप से सही स्थिति सामने आ सकी, अन्यथा की स्थिति में तो भगवान ही मालिक है. ये स्थिति ठीक नहीं है.
दूसरी ओर हम आज भी कभी कभी अख़बारों में पढ़ते है कि अजा जजा वर्ग के लोंगों को मंदिरों में प्रवेश नहीं है, उन्हें कुए / हैंडपंप से पानी नहीं भरने दिया गया, उनके लिए शमशान नहीं हैं, उनके दुल्हे को घोड़ी पर नही चढ़ने दिया गया, सार्वजानिक भोज में उन्हें मुख्य पंगत से अलग बिठाकर या बाद में भोजन करने दिया गया आदि आदि. आज के आधुनिक समाज में भी ये ख़बरें क्यों पढने को मिलती हैं? क्या हमने कभी सोचा है कि इस समस्या की मूल जड़ समाज में विद्यमान अस्पर्शयता की भावना है? जहाँ प्रशासन और मीडिया की पहुँच थोड़ी कम है ऐसे बहुत से गांवों में अभी भी कई दबंग समूह हैं जो अस्पर्शयता की इस अमानवीय भावना को विभिन्न रूपों में व्यव्हार में लाते हैं और बनाए रखना चाहते हैं. इससे न सिर्फ उनकी श्रेष्ठता का झूठा अहम् पोषित होता है बल्कि वे कई तरह से उनका शोषण भी करने का प्रयास करते हैं.
नगरों में रहने वाले पढ़े लिखे हम लोग मानव मात्र को एक समान मानते हैं और मानते है कि अस्पर्शयता समाज का कलंक है. तब भी नगरों में अस्पर्शयता की ये भावना कई तरह से महसूस की जाती है. क्या हम अपने बच्चों को अजा जजा वर्ग के बच्चों के साथ खेलने देते हैं? हमारे घर में आने वाले सफाई कर्मी के प्रति हमारा व्यव्हार कैसा है, हम खुद ही जाँच सकते हैं. हम उनके साथ बराबरी का व्यव्हार नहीं करते हैं, क्यों? क्या हमने कभी ये सोचने की जहमत उठाई है कि इसके पीछे कारण है उनकी अशिक्षा और उनकी अस्वच्छ जीवन शैली. केवल नारे लगाने या बौद्धिक चर्चा भर से कुछ नहीं होता. क्या हमने हमारे समाज के ही एक अंग, जो अशिक्षित है और अस्वच्छ जीवन शैली अपनाये हुए है, को शिक्षित करने, स्वच्छ जीवन शैली अपनाने के लिए प्रेरित करने और सार्वजनिक रूप से प्रतिष्ठा देने का कोई गंभीर प्रयत्न किया है?
मैं पहले ही कह आई हूँ कि सफ़ेद / काले की तरह ये कोई साधारण समस्या नहीं है. न इसे कानून या राजनीति से हल ही किया जा सकता है. दरअसल दुःख की बात तो यही है कि बिना समाज के विघटन की चिंता किये सभी राजनैतिक दल इस आग पर अपनी अपनी राजनैतिक रोटियां सेक रहे हैं और हम भी जाने अनजाने में इस या उस ओर खड़े होकर एक दूसरे पर दोषारोपण करने में लगे हुए हैं.
इस कठिन समय में मुझे स्वामी विवेकानंद के जीवन का एक प्रसंग याद आता है. उन दिनों भारत की दरिद्रता और गुलाम मानसिकता से ग्रसित समाज को देखकर स्वामी जी बहुत दुखी थे. भारत को समझने और इन विषमताओं को दूर करने का उपाय खोजने के लिए स्वामी जी परिव्राजक के रूप में भारत का भ्रमण कर रहे थे. कोलकाता से उत्तर भारत, हिमालय और वापस दिल्ली होते हुए वे राजस्थान के एक गाँव में पहुँचे थे. उन्होंने एक वट वृक्ष के नीचे आसन लगाया और उसी के नीचे रात्रि विश्राम किया. वहां दिन में एक हाट बाजार लगता था. सुबह लोगों ने वहां एक तेजस्वी साधु को आया देखा तो उनके मन में सतसंग की इच्छा हुई. स्वामी जी ने सहर्ष उनकी इच्छा पूरी की. स्वामी जी के अन्दर ज्ञान के भंडार से और उनकी प्रस्तुतीकरण की सरल सहज शैली से लोग अत्यंत प्रभावित हुए. थोड़ी ही देर में उनकी लोकप्रियता चारों ओर फ़ैल गई. स्वामी जी से मिलने उनके साथ चर्चा करने के लिए लोगों का ऐसा ताँता लगा कि उन्होंने स्वामी जी को एक क्षण की फुर्सत नही लेने दी. तीन दिन ऐसे ही बीत गए. उसी बाजार में जूता मरम्मत करने की एक छोटी सी दुकान लगाये बैठा एक बूढ़ा मोची ये सब देख रहा था. उसने सोचा कि तीन दिन से लगातार लोग आ रहे हैं, स्वामी जी से ज्ञान की चर्चा कर के अपना समाधान प्राप्त कर रहे हैं किन्तु किसी ने भी स्वामी जी के भोजन आदि का प्रबंध नही किया है और न ही स्वामी जी ने भोजन आदि किया ही है. स्वामी जी भूखे हैं ऐसा जान कर शाम को वह बूढ़ा अपनी झोपडी में से पत्तल पर सीधा ले आया. स्वामी जी को सीधा देते हुए उसने कहा – “महाराज आप तीन दिन से भूखे हैं. ये सीधा लीजिये. मैं चूल्हे और आग की व्यवस्था और किये देता हूँ, आप भोजन बना कर भोजन कर लीजिये”.
बूढ़े की बात सुन कर स्वामी जी भाव विभोर हो गये. उन्होंने उसे गले लगाते हुए कहा- “जब तक समाज में तुम्हारे जैसे धर्मात्मा हैं कोई साधु भूखा नही रह सकता. किन्तु तुम सीधा क्यों लाये हो? भोजन बनाकर ही ले आओ, मुझे बहुत भूख लगी है.”
“महाराज मैं नीच जाति का हूँ. मेरे हाथ का बना भोजन ग्रहण करके आप अपवित्र हो जायेंगे और मैं समाज से बहिष्कृत, इसलिए आप स्वयं ही भोजन बना कर ग्रहण कीजिये.” अत्यंत दीन भाव से हाथ जोड़ कर उसने स्वामी जी से निवेदन किया.
स्वामी जी तो अपने ही आनंद में मग्न थे, उसके कंधे पर हाथ रख कर बोले – “भाई भूखा तो मैं बहुत हूँ. पर ये भी तुम जान लो कि भोजन तो मैं तभी करूँगा, जब तुम इसे बना कर लाओगे.”
बूढ़े ने बहुत अनुनय विनय की किन्तु स्वामी जी कहाँ मानने वाले थे. अंततः बूढ़े बाबा को स्वयं ही भोजन बना कर लाना पड़ा. तब ही स्वामीजी ने उस बूढ़े मोची के साथ भोजन ग्रहण किया.
स्वामी जी कहा करते थे धर्म के मूल भाव को छोड़ कर स्वार्थ से प्रेरित होकर पाखंड को अपनाने से ही भारत का पतन हुआ है. आज की समस्या के लिए भी मैं इसी बात को जिम्मेदार मानती हूँ. हमारे वैदिक काल में हम इस तरह की कोई समस्या नहीं देखते हैं. हमारे कई ऋषि, आज जिन्हें हम अजा जजा वर्ग कहते हैं, उन वर्गों से आते है. वस्तुतः पिछले १२०० – १५०० वर्षो से इस समस्या ने जड़ें जमाई हैं. १२०० – १५०० वर्षों की इस समस्या को हम १२ – १५ वर्षो में कानून द्वारा हल नहीं कर सकते हैं. यह एक सामाजिक समस्या है और दोनों ओर से उठाये गये समझदारी भरे कदमों से ही धीरे धीरे इसे दूर किया जा सकेगा.
आज एक विशेष दिन भी है. आज ११ सितम्बर है. १२५ वर्ष पूर्व १८९3 में आज ही के दिन शिकागो धर्म सम्मलेन में अपना अद्भुत व्याख्यान दे कर इस योद्धा सन्यासी ने दुनिया के सामने जब भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक श्रेष्ठता सिद्ध की थी. आइये आज हम भी स्वामी जी के सपनों का, जाति वर्ग के भेदों से दूर, समरस भारत बनाने का संकल्प लें.