वल्गाएं थम गयीं
प्रगति की संध्या वेला है
यह दुनिया लगती जैसे
दो दिन का मेला है
कहां गए वे दिन
पहले-से सरितप्रवाही के.
कितने खौफ़नाक मंज़र हैं यहां तबाही के
कहां खो गई वो दौड़ती भागती जिंदगी,वो सजे संवरे हाट बाजार चौतरफा सन्नाटा है, इस सन्नाटे के पीछे मौत की सिसकियां रह रहकर मातमी धुन परोसती सी नजर आती हैं ,इस सन्नाटे के पीछे किसी का भाई किसी की बहन किसी की मां किसी का पिता तो किसी का पूरा परिवार ही समा गया, इसलिए बेहद डरावना सा लगता है यह मंजर ।
कहते हैं अंधेरे के बाद सवेरा और दुख के बाद हर्ष जरूर आता है लेकिन यह अंधेरा छटने का नाम ही नहीं ले रहा दुख की समय सीमा बढ़ती ही जा रही है। धैर्य डोल सा गया है गुमसुम सी हो गई है जिंदगी न जाने कब आएगा वो दिन जब हम स्वतंत्रता के साथ बाजारों में घूम सकेंगे,न जाने कब आएगा वो दिन जब मानव के मुंह पर कसा यह मुसीका उतरेगा न जाने कब आएगा वो दिन जब अपने कंधों पर बैग लटकाए नन्हे मुन्ने सजे धजे स्कूल जाते दिखाई देंगे न जाने कब आएगा वो दिन जब जीवन की तमाम परेशानियों से अनभिज्ञ हमारे किशोर और युवाओं की टोलियां दोस्त यारों के साथ मस्ती करते दिखाई देंगी,न जाने कब आएगा वो दिन जब हमारे बुजुर्ग बेफिक्र होकर मंदिर में पूजा कीर्तन कर शांति का अनुभव करेंगे ।
ऐसी न जाने कितनी बातें अब यादें बन आहत मन को भावुक करने लगी हैं। महामारी ने अपनी शक्ति पर इठलाते मानव के गाल पर जैसे तमाचा सा जड़ दिया है।
आखिर एक छोटे से वायरस के सामने पूरी दुनिया असहाय हो ठिठक सी गई है। जिसे हम सबसे एडवांस व आधुनिक चिकित्सा पद्धति मानकर इठलाते थे। आज फेल हो गई है।
डेढ़ साल के लंबे अंतराल में छोटे से अदृश्य वायरस की कोई दवा आधुनिक चिकित्सा पद्धति नहीं खोज सकी है।
यही कारण है हम घरों में कैद होने के लिए मजबूर हैं हमारे सामने अपनो को लीलती मौत और जलती हुई चिताओं का कटु सत्य स्वीकारने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं रह गया है।
मौत का आंकड़ा लगातार बढ़ रहा है ,संक्रमण रुकने का नाम नहीं ले रहा। देश में कोरोना संक्रमितों के आंकड़ों के मामले में रोजाना नए रिकॉर्ड बन रहे हैं। बीते दिन देश में सबसे ज्यादा 2 लाख 60 हजार 533 नए संक्रमितों की पहचान हुई। इससे पहले शुक्रवार को 2.33 लाख मामले सामने आए थे। 1492 लोगों की जान भी गई।
एक्टिव केस यानी इलाज करा रहे मरीजों का आंकड़ा भी लगातार बढ़ रहा है। बीते दिन इनमें 1.20 लाख का इजाफा हुआ। फिलहाल देश में 17 लाख 93 हजार 976 लोगों का इलाज चल रहा है। पिछले कुछ दिनों से जिस रफ्तार से एक्टिव केस के आंकड़े में बढ़ोतरी हो रही है, आज यह आंकड़ा 18 लाख के पार पहुंच जाएगा।
निःसन्देह यह पहले से ही परेशान मन को और परेशान कर देने वाले आंकड़े हैं। यह भय भी पैदा करते हैं। यही कारण है की पिछले दो तीन दिनों के दौरान समाज के तमाम बुद्धजीवियों,सामाजिक कार्यकर्ताओं आदि ने मीडिया से कोरोना महामारी की डरावनी तस्वीरें प्रकाशित न करने का आग्रह किया है। इसे विडम्बना कहा जाएगा की कुछ मीडिया संस्थानों द्वारा प्रतिस्पर्धा और टीआरपी की चिंता में मानवीय संवेदनाओं को दरकिनार कर श्मशानों में जलती चिताओं,अस्पतालों में मौत से लड़ते हिचकियाँ लेते मरीज व चीखते बिलखते उनके परिजनों की तस्वीरें व विजुअल लगातार दिखाए व प्रकाशित किए जा रहे हैं।
ऐसे कठिन समय में लोकतंत्र के इस चौथे स्तम्भ को अपनी सकारात्मक भूमिका के निर्वहन का संकल्प लेना चाहिए। एक शोध में यह बात सामने आई है की अवसाद के हालात में नकारात्मक व दुख को बढ़ाने वाली तस्वीरें या रिपोर्टिंग के बेहद विध्वंसक परिणाम सामने आ सकते हैं।
ऐसे बुरे समय में अनेक समाजसेवी संगठन डॉक्टर नर्सेस व सेवाकर्मी सामने आए हैं जिन्होंने रुग्ण मानवता की सेवा के लिए निशुल्क अपने अस्पताल खोल दिए हैं। इनका मनोबल बढ़ाने की आवश्यकता समाज की है। हमारे सरकारी तंत्र के तमाम फ्रंट लाइन वर्कर भी अपनी जान जोखिम में डालकर हमारी और आपकी सुरक्षा व सेवा के लिए अपनों से दूर कार्य कर रहे हैं। इनके सहयोग की भी बहुत आवश्यकता है। किसी भी प्रकार से इनके मान सम्मान को चोट न पहुंचे यह भी बहुत जरूरी है। इन विषम परिस्थितियों में सबको एक साथ एक दूसरे की चिंता करते हुए महामारी से निपटना होगा। मैं सबका और सब अपने के भाव को जागृत करना होगा।