त्वरित टिप्पणी:प्रवीण दुबे
कर्नाटक के चुनाव परिणाम आ चुके हैं और यहां से भाजपा की विदाई और कांग्रेस की ताजपोशी तय हो चुकी है। साफ है यहां मोदी फैक्टर बुरी तरह नाकाम रहा और स्थानीय मुद्दे भाजपा को ले डूबे। आने वाले समय में मिजोरम, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और तेलंगाना में विधानसभा चुनाव होने हैं. इस लिहाज से कर्नाटक की हार भाजपा के लिए बड़ा झटका देने वाली कही जा सकती है।
मध्यप्रदेश जैसे राज्य की बात करें तो कर्नाटक की हार के बाद क्या भाजपा कोई सबक लेगी ? क्या मध्यप्रदेश में पनप रही एंटी-इनकम्बेंसी के कारणों को साफगोई से परखा जाएगा? क्या पार्टी हित में कड़े निर्णय लिए जाएंगे ? यह सवाल जोर शोर से उठने लगे हैं।
इस साल होने वाले राज्यों के विधानसभा चुनावों को ‘सत्ता का सेमीफाइनल’ कहा जा रहा है. दरअसल, इन विधानसभा चुनावों के खत्म होने के कुछ ही महीनों बाद 2024 के लोकसभा चुनाव होने हैं. इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि इन विधानसभा चुनावों के नतीजों का असर लोकसभा चुनाव 2024 पर भी पड़ेगा. यही वजह है कि कर्नाटक को भी जोड़ लें तो 6 राज्यों के विधानसभा चुनावों को लेकर तमाम सियासी दलों ने काफी पहले से तैयारियां शुरू कर दी हैं।
इसके बीच अब कर्नाटक चुनाव के परिणाम हमारे सामने आ चुके हैं और यहां भाजपा की रणनीति चारों खाने चित्त हो चुकी है। अब मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़, राजस्थान,मिजोरम और तेलंगाना में विधानसभा चुनाव होने हैं.
पार्टी के आंतरिक सर्वे और कार्यकर्ताओं की नारजगी के मद्देनजर अब कर्नाटक की हार के बाद चुनावी राज्यों में भाजपा के लिए मध्यप्रदेश की सत्ता को बचाए रखना सबसे बड़ी चुनौती मानी जा रही है।
साल 2018 में कांग्रेस ने मध्य प्रदेश की 230 विधानसभा सीटों में से 114 पर जीत हासिल कर बीजेपी को सत्ता से बेदखल कर दिया था. निर्दलीय विधायकों का समर्थन लेकर कमलनाथ को कांग्रेस ने सीएम बना दिया था. हालांकि, दो साल बाद ही ज्योतिरादित्य सिंधिया कके करीबी 22 विधायकों की बगावत से कांग्रेस सरकार गिर गई और शिवराज सिंह चौहान फिर से सत्ता पर काबिज हो गए. एमपी में बीजेपी के खिलाफ सत्ताविरोधी लहर पिछले चुनाव में ही नजर आ चुकी थी।
हालांकि ज्योतिरादित्य सिंधिया के पाला बदलने से भाजपा पुनः सत्ता में आ गई लेकिन पार्टी के नीतिनिर्धारकों ने न तो चेहरा बदला और न ही जमीनी कार्यकर्ताओं को निगम मंडल आयोग प्राधिकरण आदि में स्थान दिए गए। उल्टा ज्योतिरादित्य सिंधिया नरेंद्र सिंह तोमर शिवराज सिंह नरोत्तम मिश्रा जैसे नेताओं के नजदीकियों को ही सत्ता सुख की चासनी मिलती रही और आम कार्यकर्ता दूर खड़ा ललचाता रहा।
अब उसे पन्ना प्रमुख और बूथ प्रमुख बनाकर काम की सीख देने से जमीनी कार्यकर्ता भीतर ही भीतर आक्रोशित है। समय समय पर उसका यह गुस्सा बैठकों में दिखाई भी दिया है।
कार्यकर्ता ही नहीं तमाम बड़े नेता भी यहां आहत दिखते हैं राज्य सभा के पूर्व सांसद और भाजपा के वरिष्ठ नेता रघुनन्दन शर्मा ने भी सार्वजनिक तौर पर संगठन के कार्यकलापों की आलोचना करनी शुरू कर दी है।जो नेता मुखर हो कर पार्टी की आलोचना कर रहे हैं उनमे पूर्व विधायक सत्यनारायण सत्तन, पूर्व विधायक भंवर सिंह शेखावत, पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के भांजे और पूर्व राज्य मंत्री और पूर्व सांसद अनूप मिश्र, उमा भारती के अलावा जैन समुदाय से आने वाले कद्दावर नेता मुकेश जैन शामिल हैं.इसी असंतोष को ख़त्म करने के लिए विजयवर्गीय और उनके साथ 13 और नेताओं को नाराज़ नेताओं को मनाने की ज़िम्मेदारी सौंपी गयी है।
लेकिन इसी बीच संगठन को एक बड़ा झटका तब लगा जब पूर्व मुख्यमंत्री और जन संघ संस्थापकों में से एक कैलाश जोशी के पुत्र और तीन बार विधायक रह चुके दीपक जोशी ने औपचारिक रूप से कांग्रेस का हाथ थाम लिया.जोशी के साथ दतिया के पूर्व विधायक राधेलाल बघेल भी कांग्रेस में औपचारिक रूप से शामिल हो गए हैं।
कर्नाटक की हार जहां एक ओर नाराज भाजपा नेताओं को और अधिक मुखर करेगी वहीं हाशिए पर पड़े तमाम कार्यकर्ता भी अब खुलकर बोलेंगे। निश्चित ही आने वाले कुछ दिन भाजपा के लिए मध्यप्रदेश की राजनीति में भूचाल भरे हो सकते हैं। हाईकमान कर्नाटक की हार के बाद मध्यप्रदेश में सामने मुंह बाए खड़ी कमियों को दूर करने की कोशिश करेगा ऐसे में सत्ता और संगठन दोनों में ही कुछ बड़े चेहरों को हटाकर नए नेताओं को जिम्मेदारी दी जा सकती है कोई बड़ी बात नहीं मुख्यमंत्री से लेकर प्रदेश अध्यक्ष तक पर गाज गिराई जा सकती है। लेकिन जो भी हो भाजपा को यदि मध्यप्रदेश बचाना है तो कर्नाटक की हार से सबक लेकर बहुत जल्दी अपना ऑपरेशन शुरू करना होगा अन्यथा बहुत देर हो जाएगी।