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गांधी, डॉ अंबेडकर व डॉ लोहिया तीनों ही के विचार समदृष्टि, समभाव पर आधारित हैं: रघु ठाकुर

भारत के वंचित समुदाय के उत्थान पर हुई परिचर्चा

ग्वालियर। ऐसी माटी ना भारत के खंड खंड में, जन्म दैयो रे दाता बुंदेलखंड में…. बुंदेलखंडी भाषा में इस स्वागत लोकगीत के साथ संस्था ओशन एजुकेशन एण्ड सोशल वेल्फेयर सोसाइटी द्वारा संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार के सहयोग से आयोजित दो दिवसीय कार्यक्रम “डॉ भीमराव अंबेडकर पर व्याख्यान व प्रदर्शनी” का शुभारंभ भारतीय पर्यटन एवं यात्रा प्रबंध संस्थान में किया गया।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के तौर पर  समाजसेवी चिंतक श्री रघु ठाकुर, विशिष्ट अतिथि के तौर पर शिक्षाविद् श्री जयंत तोमर उपस्थित रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ पत्रकार श्री राकेश पाठक ने की।
मां सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्ज्वलन के साथ ही “बुद्धम् शरणम् गच्छामि” पर अपने साथी कलाकारों के साथ साहित्य कथक केन्द्र की कथक नृत्यांगना संदीप तिवारी ने अद्भुत नृत्य प्रस्तुति दी। बुंदेलखंडी भाषा में स्वागत लोकगीत की प्रस्तुति वैशाली मिश्रा व कृतेन्द्र सिंह सूर्यवंशी ने अपने साथियों के साथ दी।
भारत का वंचित समुदाय और गांधी, लोहिया व डॉ अंबेडकर के के विचार” विषय पर विचार रखते हुए वरिष्ठ पत्रकार व शिक्षाविद् श्री जयंत तोमर ने कहा कि- डॉ भीमराव अंबेडकर के
कार्यक्रम में सन् 1915 में डॉ अंबेडकर ने एम ए परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके 10 वर्ष पश्चात् जब बाबा साहब ने अपनी पीएचडी पूरी की उसी दौरान में भारत के त्रावणकोर क्षेत्र में समाज के वंचित समुदाय के ऊपर होने वाले अत्याचारों ने अंबेडकर की आत्मा को झकझोर कर रख दिया।
डॉ अंबेडकर ने डॉ राममनोहर लोहिया के जाति मुक्त समाज की संकल्पना को साकार करने का पुरजोर प्रयास किया।
गांधी जी और डॉ अंबेडकर दोनों ने ही समाज से जातिवाद को मिटाकर एक हिन्दु समाज का निर्माण करने के लिए अनेकानेक कार्य किए। परन्तु फिर भी कुछेक विषयों को लेकर उन दोनों में लगातार मतभेद बने रहे। वर्तमान परिदृश्य में हम सब मिलकर ऐसा भारत बनाने का प्रयास करें जिसमें आर्थिक असमानता समाप्त हो सकें।
कार्यक्रम में मुख्यअतिथि के रूप से उपस्थित रघु ठाकुर ने विषय पर प्रकाश डालते हुए कहा कि- हमारा देश दो समुदायों में बंट गया है। वंचित समुदाय और संचित समुदाय।
वंचित समुदाय लगातार और अधिक पिछड़ता जा रहा है। इनके एक हिस्सा है जो आर्थिक तौर पर पिछड़ा हुआ और दूसरा है जो जातिवाद के कारण शिक्षा से दूर होने के कारण पिछड़ा हुआ है। गांधी जी हो या डॉ अंबेडकर दोनों ही बुद्ध के पथगामी रहे। बुद्ध ने जिस प्रकार सभी धर्मग्रंथों को मान-सम्मान दिया। उसी प्रकार भले ही गांधी जी ने स्वयं कभी मूर्ति पूजा न की हो, परन्तु उन्होंने कभी भी इसका विरोध भी नहीं किया।
गांधी जी और डॉ अंबेडकर दोनों ने ही समाज के सभी वर्गों अनुचित जाति, जनजाति, पिछड़ा वर्ग और महिलाओं सभी के उत्थान के भरसक प्रयास किया। महिलाओं के जीवन पर दोनों ही शख्सियतों ने प्रभाव डाला। एक ओर जहां गांधी जी की एक आवाज़ पर लाखों महिलाएं घरों से बाहर आ जाती थीं, वहीं डॉ अंबेडकर ने संविधान के माध्यम से महिलाओं के लिए कई कानून बनाए ताकि उन्हें समाज में उचित मान-सम्मान मिल सके।
समाज का बंटवारा यदि जल्द ही समाप्त नहीं हुआ तो यह न केवल देश के वर्तमान बल्कि भविष्य के लिए भी बेहद चिन्ताजनक हो सकता है। साथ ही इसके कई गंभीर परिणाम सम्पूर्ण भारत को आने वाले समय में झेलने पड़ सकते हैं। समाज को एक सूत्र में बांधने के गांधीजी, डॉ अंबेडकर और डॉ लोहिया तीनों के तरीकों में आंशिक तौर पर अंतर हो सकता है परन्तु अंततः तीनों समाज को सम दृष्टि सम भाव से देखने का ही संदेश देते हैं।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ पत्रकार डॉ राकेश पाठक ने कहा कहा कि- जिन बाबा साहब डॉ भीमराव अंबेडकर ने मूर्ति पूजा को नकारते हुए ब्रह्मा, विष्णु और महेश की पूजा से इंकार किया और स्वयं बौद्ध धर्म अपनाया, हमने उन्हीं डॉ अंबेडकर के आदर्शों और जीवन-मूल्यों को दरकिनार करते हुए उन्हीं की तस्वीरों और मूर्तियों की पूजा शुरु कर दी।
यदि वास्तव में डॉ अंबेडकर को हमें अपने जीवन में आत्मसात करना चाहते हैं तो उनके द्वारा समाज को एक सूत्र में बांधने के प्रयासों को अपनाना होगा। जातिवाद की रूढ़ियों को समाप्त करने के लिए कानूनी और मानसिक दोनों ही तरीकों से कार्रवाई करनी होगी। तभी हम गांधी, डॉ अंबेडकर और डॉ लोहिया के सपने के भारत को मूर्त रूप दे पाएंगे।
कार्यक्रम के अंत में नन्हीं बालिकाओं कु मिठी ने डॉ अंबेडकर पर अपने विचार रखे व बाल कवियत्री मंत्रिता शर्मा ने गांधी जी के जीवन पर आधारित काव्य पाठ किया। कार्यक्रम में मंच संचालन श्री अमन शिंदे ने व आभार व्यक्त श्री राजेश महोबिया ने किया।

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