प्रहलाद भारती
ग्वालियर के जयविलास पैलेस को लोग दुनियाभर से देखने आते हैं। यह शाही महल दुनिया के सबसे महंगे और आकर्षक महलों में एक है । लेकिन इस महल की महारानी राजमाता विजयाराजे सिंधिया को इसके कंगूरे, परकोटा, ऐतिहासिक झूमर, डायनिंग टेबल पर चलती खाने की ट्रेन ,घोड़े बग्गी,और शाही वैभव के दूसरे दस्तूर कतई प्रभावित नही करते थे। ऐसा लगता था कि राजमाता सिंधिया ने खुद को सांसारिक सुख सुविधाओं से काफी ऊपर उठा लिया था। 12 अक्टूबर, 1919 को जन्मी राजमाता सिंधिया भारतीय जनता पार्टी की संस्थापक सदस्य थीं। उन्होंने मध्य प्रदेश में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा के विस्तार के लिये अपने शाही प्रभाव और ताकत का खुलकर उपयोग किया। हमारे मौजूदा लोकतंत्र में उनके जैसे व्यक्तित्व बिरले ही हैं जिन्होंने सत्ता पद की अभिलाषा को कभी भी खुद की मौलिकता पर हावी नही होने दिया। आज राजमाता विजयाराजे सिंधिया की राजनीतिक विरासत भाजपा में उनके उत्तराधिकारी सहेज रहे हैं।
भाजपा में अटलजी, आडवाणी, जोशी, ठाकरे आदि की पीढ़ी के नेताओं ने विजयाराजे सिंधिया को जनसंघ, भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मामलों में अपना सब कुछ दांव पर लगाते हुए देखा है। संभव है आज की पीढ़ी राजमाता को सिर्फ इतना भर जानती हो कि वे वसुन्धरा राजे, माधवराव सिंधिया, यशोधरा राजे की मां और केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया की दादी हैं। लेकिन राजमाता के व्यक्तित्व का कैनवास इससे भी बहुत बड़ा है। वे भारत मे जेन्डर केस स्टडी हैं। सच्चाई यह है कि राजमाता सिंधिया को उनके लोकतांत्रिक अवदान के अनुपात में अधिमान्यता देने के मामले में हम पिछड़ गए हैं। मंचों पर राजमाता के चित्र पर रस्मी माल्यार्पण या जयंती और पुण्यतिथि पर स्मरण से आगे उनके विचार प्रवाह और कृतित्व की कर्णीयता को समाज में सुस्थापित करने की भी आवश्यकता है। उन्हें त्याग और तपस्या की देवी की तरह पूजने के विचार शून्य उपक्रम से आगे सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्र में कृपणता निर्मित परिस्थितियों से निपटने में एक लोकतांत्रिक हथियार के रूप में स्वीकार करने की आवश्यकता अधिक है।
क्या राजमाता सिंधिया सिर्फ त्याग की और कतिपय वात्सल्य की मूर्ति थीं? जैसा उनके कुछ अनुयायियों द्वारा दावा किया जाता है। हकीकत यह है कि राजमाता को लेकर यह उनका सतही मूल्यांकन है। त्याग तो उन्होंने किया यह तथ्य है। वह चाहतीं तो 1967 में ही मध्य प्रदेश की मुख्यमंत्री बन सकती थीं। 1977 और 1989 में उनके पास यही अवसर विनय की मुद्रा लिए खड़े थे। 1996, 1998, 1999 में वह भी राष्ट्रपति भवन में मंत्री पद की शपथ ले सकती थीं। वह खुद भैरोसिंह शेखावत की जगह उपराष्ट्रपति हो सकती थीं। बीजेपी की राष्ट्रीय अध्यक्ष तो जब चाहतीं तब बन सकती थीं। लेकिन विजयाराजे सिंधिया ने इन सभी अवसरों को दूसरों के लिये छोड़ दिया। यह उनके राजनीतिक त्याग की मिसाल है। वाकई आज की पीढ़ी में यह त्यागभाव असंभव है। इसलिये इस त्याग भाव को केवल पूजने से काम नही चलेगा। आवश्यकता आज इस बात की है कि उनके इस त्याग भाव को समाज के सामान्य राजनीतिक जनजीवन में स्थापित कैसे किया जाए ? इसे सोशल ट्रांसफॉर्मेशन की केस स्टडी बनाकर कैसे आगे बढ़ाया जाए? क्योंकि इसी भावना के लोप ने आज की सियासत को गंदा कर दिया है।
सवाल यह है कि राजमाता को क्या सिर्फ भाजपा की एक दिग्गज नेत्री के रूप याद किया जाना चाहिये? असल में राजमाता सिंधिया जम्हूरियत में लोकतांत्रिक मूल्यों की स्थापना, लोकशाही और राजशाही के बीच अद्भुत समन्यवक हैं। उन्हें शाही वैभव के बावजूद सत्ता से सदैव दूरी बनाने, पितृसत्ता को सफलतापूर्वक जमींदोज करने वाली शख्सियत के रूप में याद की जाना चाहिये। राजमाता सिर्फ दूसरे राजाओं की तरह अपनी रियासतों और सुख-सविधाओं को बचाने के लिये परकोटे से बाहर नहीं आई थीं। उनका अपना सामाजिक और राजनीतिक चिंतन था। इसलिये वे राजनीति में नेहरू की पहल पर कांग्रेस में शामिल तो हुईं लेकिन सत्ता की हनक के आगे जब राजमाता ने आम आदमी खासकर अपनी पुरानी रियासत में (छात्र आंदोलन) दमनभाव को देखा तो भारत की राजनीति के सबसे मजबूत मुख्यमंत्री डीपी मिश्रा से भिड़ने में लेश मात्र संकोच नही किया। क्या आज के नेता यह साहस कर सकते है?
भारत के संसदीय इतिहास में राजमाता प्रेरित ऑपरेशन डीपी मिश्रा सियासत में नारी शक्ति की स्वतंत्र ताकत का ही प्रदर्शन था। सियासत में संयम और शालीनता के गायब हो चुके अपरिहार्य तत्व की तालीम आज के सियासी लोग उनसे हासिल कर सकते हैं। डीपी मिश्रा की सर्वशक्तिमान सरकार को गिराने के बाबजूद उन्होंने अहंकार को अपने सियासी शिष्टाचार में कभी फटकने भी नही दिया। मृत्युपर्यंत उनका सम्मान भारत के सभी राजनीतिक दलों में अनुकरणीय हद तक बना रहा। इंदिरा गांधी की सत्ता को भी उन्होंने खुलेआम चुनौती दी।लेकिन उनका राजनीतिक विरोध सदैव नीतिगत रहा। डीपी मिश्रा ने पचमढ़ी के अधिवेशन में उन्हें अपमानित करने का प्रयास किया लेकिन उन्होंने इसका बदला पूरे संसदीय तरीके से लिया।
असल में राजमाता का मूल्यांकन सिर्फ राजनीतिक नजरिये से नहीं किया जा सकता है। वे शाही परकोटे में जनता की महारानी थीं जिनकी ताकत रियासतों की रवायतों से नहीं उनके सतत सम्पर्क और नए भारत में शाही लोगों को लोकतांत्रिक तरीके से विश्वास हासिल करने के भरोसे में टिकी थी। यही कारण है कि वे भारत मे रियासतों के लोकतंत्रीकरण की प्रतीक रही हैं। यही वजह है कि उनके परिवार का संसदीय दखल आज 70 साल बाद भी बरकरार है। उनकी राजनीतिक ताकत जिसे आज इस अर्थ में समझने की जरूरत है कि पद, प्रतिष्ठा और धन ही इस कार्य का अंतिम ध्येय नही है। उनका सांस्कृतिक पक्ष अपनी धार्मिक मान्यताओं और अस्मिता पर गर्व करना सिखाता है। उनका उदारमना व्यक्तित्व समाज के सबसे कमजोर और काबिल लोगों को अपनी प्रतिभा प्रकटीकरण का अवसर उपलब्ध कराता है। उमा भारती से लेकर मप्र की राजनीति में अनेक स्थापित चेहरे राजमाता की छत्रछाया में विकसित हुए हैं। ये क्षत्राणी भारत के लोकजीवन की एक केस स्टडी भी है। सवाल है कि क्या इस शाही शख्सियत के इन पक्षों को प्रतिष्ठित करने की आवश्यकता आज की राजनीति महसूस नही करती है?
(लेखक, पूर्व विधायक एवं मप्र पाठ्य पुस्तक निगम के उपाध्यक्ष हैं।)