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ढोल ताशों की कर्कश ध्वनि के बीच असहाय मतदाता आखिर करे तो क्या करे ?

प्रवीण दुबे

अब जबकि नगर सरकार के लिए जन प्रतिनिधियों के चुनाव में मात्र एक सप्ताह का समय शेष है ऐसा लगता है कि मतदाताओं की आवाज ढोल ताशों की कर्कश ध्वनि के बीच कहीं दब सी गई है। हाथ जोड़े नेताजी आते हैं पीछे दस बीस का फ़ौज फाटा पैर पकड़ते हैं और आगे बढ़ जाते हैं। 

पिछले लगभग दो सप्ताह से शहरवासियों को प्रतिदिन यही नजारा देखने को मिल रहा है। 
चुनाव में न कोई शिकवा है न कोई वादा , शिकवा और वादा तो तब होगा जब जनता की कोई सुने और सुनने के बाद ही कोई वादा करने की स्थिति जन्म लेती है। 
अपने जीवनकाल में कई चुनाव देख चुके वयोवृद्ध मतदाता रामसुन्दर दास से जब शब्दशक्तिन्यूस ने चुनावी माहौल पर कुछ बोलने को कहा तो जैसे उनकी मन की मुराद पूरी हो गई उन्होंने कहा कि चुनाव तो कई देखे लेकिन ऐसा चुनावी माहौल कभी नहीं देखा वो आते हैं और ढपर ढपर करके चले जाते हैं, ऐसा लगता है जैसे पैर छूकर मतदाता का अपमान कर रहे हैं । 
एक अन्य महिला मतदाता जग्गो बाई का कहना था उन्हें न तो हमारी परेशानियों से मतलब है न उनके समाधान का कोई आश्वासन आखिर कैसे तय किया जाए कौन हमारी उम्मीदों पर खरा उतरेगा ? 
इन मतदाताओं की बात काफी हद तक सही भी नजर आती है न कोई घोषणापत्र है न कोई आश्वासन का संदेश आखिर मतदाता कैसे तय करे कि वोट किसे दिया जाए। 
ग्वालियर की बात करें तो यहां  कमल और पंजे के बीच सीधी लड़ाई नजर आ रही है लेकिन दर्जनों वार्ड ऐसे भी हैं जहां इन दोनों राष्ट्रीय दलों के अधिकृत प्रत्याशियों के खिलाफ उनके ही दलों के बाग़ियों ने मोर्चा खोल रखा है।
 साफ है यहां मुकाबला त्रिकोणीय हो चला है। इस स्थिति ने पार्टी से जुड़े नेताओं और कार्यकर्ताओं के लिए तो समस्या खड़ी कर ही दी है साथ ही मतदाताओं के सामने भी विषम परिस्थितियों का जाल बुन गया है। 
चुनाव के प्रारंभिक चरण से लेकर अब अंतिम चरण में पहुंचने तक भाजपा और न ही कांग्रेस के कर्ता धर्ता नेता इस हालत को नियंत्रित कर सके व्यक्तिनिष्ठा और अपने पट्ठों की पैरवी के सामने डैमेज कंट्रोल की जगह ऐसा डैमेज हुआ कि पार्टी , विचार सबकुछ धरा का धरा रह गया। 
ऐसा दिखा ही नहीं कि राष्ट्रीय दलों में समन्वय के साथ रूठे कार्यकर्ताओं को मनाने का कोई कॉलम भी तय होता है। आगे से धीर गम्भीर नजर आने वाले वरिष्ठ नेता जी पिछवाड़े से आग भड़काते रहे अब परिणाम हमारे सामने है मतदाता व कर्तव्यनिष्ठ पार्टीजनों को समझ नहीं आ रहा वे इधर जाएं या उधर।
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