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त्वरित टिप्पणी : असफल हुई शांति वार्ता और आसुओं में बह गए आतंकी देश पाकिस्तान के शांति दूत बनने के इरादे

      त्वरित टिपणी – प्रवीण दुबे

अमेरिका और ईरान के बीच चल रही समझौता वार्ता का विफल होना एक बार फिर वैश्विक शांति के लिए चिंताजनक संकेत है दूसरी ओर असफल हुई शांति वार्ता के बाद आतंकवादियों की सबसे बड़ी पनाहगाह वाले मुल्क पाकिस्तान के शांति दूत बनने के इरादे भी आसुओं में बह गए उसकी भूमिका केवल दलाली और मैसेजंर मुल्क तक ही सिमट कर रह गई । शांति वार्ता बेनतीजा रहने से शांति के कूटनीतिक प्रयासों के टूटने के साथ ही पश्चिम एशिया में युद्ध का खतरा पुनः मंडराने लगा है। यह स्थिति केवल दो देशों के बीच तनाव तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव पूरी दुनिया की आर्थिक, सामरिक और राजनीतिक स्थिरता पर पड़ सकता है।
अमेरिका और ईरान के बीच विवाद नया नहीं है। परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंधों और क्षेत्रीय प्रभाव को लेकर वर्षों से दोनों देशों के बीच अविश्वास बना हुआ है। हाल के महीनों में जिस प्रकार वार्ता की उम्मीद जगी थी, उससे यह विश्वास बना था कि शायद तनाव कम होगा, लेकिन वार्ता के असफल होते ही हालात फिर से पुराने मोड़ पर आ खड़े हुए हैं।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच पाकिस्तान की भूमिका भी ध्यान आकर्षित कर रही है। पाकिस्तान लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय मंच पर खुद को एक मध्यस्थ या ‘शांति दूत’ के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश करता रहा है। वर्तमान संकट में भी वह स्वयं को क्षेत्रीय ‘चौधरी’ के रूप में स्थापित करने की महत्वाकांक्षा रखता है। हालांकि, उसका पिछला रिकॉर्ड—चाहे आतंकवाद के मुद्दे पर हो या आंतरिक अस्थिरता—उसे इस भूमिका के लिए विश्वसनीय नहीं बनाता।
वास्तविकता यह है कि किसी भी क्षेत्रीय या वैश्विक संकट में मध्यस्थ बनने के लिए विश्वसनीयता, स्थिरता और निष्पक्षता आवश्यक होती है। पाकिस्तान इन तीनों कसौटियों पर अभी भी संघर्ष करता दिखाई देता है। ऐसे में उसकी सक्रियता अधिकतर राजनीतिक अवसरवाद के रूप में देखी जा रही है, न कि वास्तविक शांति प्रयास के रूप में।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या दुनिया एक और बड़े युद्ध के लिए तैयार है? पहले से ही वैश्विक अर्थव्यवस्था महंगाई, ऊर्जा संकट और भू-राजनीतिक तनावों से जूझ रही है। यदि अमेरिका और ईरान के बीच टकराव बढ़ता है, तो इसका सीधा असर तेल की कीमतों, व्यापार मार्गों और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा पर पड़ेगा। भारत जैसे देशों के लिए भी यह स्थिति चुनौतीपूर्ण होगी, क्योंकि उनका ऊर्जा आयात और क्षेत्रीय संतुलन इससे प्रभावित होगा।
इस परिस्थिति में आवश्यकता है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय—विशेषकर संयुक्त राष्ट्र और प्रमुख वैश्विक शक्तियां—तत्काल सक्रिय भूमिका निभाएं। संवाद के रास्ते को फिर से खोलना ही एकमात्र समाधान है। युद्ध किसी भी समस्या का स्थायी हल नहीं होता, बल्कि यह नई समस्याओं को जन्म देता है।
अंततः, यह समय शक्ति प्रदर्शन का नहीं, बल्कि संयम और कूटनीति का है। यदि विश्व नेतृत्व इस मौके को गंवाता है, तो इसके परिणाम दूरगामी और विनाशकारी हो सकते हैं। शांति की पहल जितनी जल्दी होगी, मानवता के लिए उतना ही बेहतर होगा।
Praveen dubey@shabd shakti news. in

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