Homeप्रमुख खबरेंदेश की एकता के लिए सिक्ख गुरु परम्परा का अनुसरण जरूरी:अरुणजी

देश की एकता के लिए सिक्ख गुरु परम्परा का अनुसरण जरूरी:अरुणजी

राष्ट्रोत्थान न्यास ग्वालियर द्वारा जारी ज्ञानप्रबोधनी व्याख्यान माला के तीसरे दिन भारत की गौरवशाली सिक्ख गुरु परम्परा पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के क्षेत्र प्रचारक और विख्यात चिंतक श्री अरुणजी जैन ने अपने सारगर्भित विचार व्यक्त किये। खचाखच भरे  सभागार में श्री जैन ने कहा कि हिन्दुस्तान को एक रखने के लिए सिक्ख गुरु परम्परा के उच्च आदर्शों को अंगीकार करना बेहद आवश्यक है।

अरुणजी ने कहा कि हमारा यह दुर्भाग्य है कि इस देश का इतिहास या तो विदेशियों द्वारा  या फिर विदेशी सोच से प्रभावित इतिहासकारों द्वारा लिखा गया। यही वजह रही कि हम अपनी गौरवशाली महान परम्पराओं के प्रति अनभिज्ञ रहे। इसके पीछे देश कमजोर करने वाली ताकतों का षडयंत्र था।

अरुणजी ने कहा कि जब देश की महान परम्पराओं ,इतिहास और महापुरषों के प्रति गौरव का भाव कम होता है तो राष्ट्र मिट जाता है। इस राष्ट्र को मिटाने के षड़यंत्र में पहले मुगल फिर अंग्रेज लगे रहे।

लेकिन सिक्ख गुरु जैसी परम्पराओं  के कारण यह  देश  आज तक मिट नहीं सका । हमें यह नहीं बताया गया कि किस प्रकार सिक्ख गुरुओं ने इस देश को कायम रखने अपनी कुर्बानियां दी ,शीश कटा दिए पर देश का मान रखा।

अरुणजी ने कहा कि देश के बाहर से होने वाले आक्रमणों से तो निपटा जा सकता है लेकिन घर के भीतर छुपे बैठे जयचन्द सबसे ज्यादा खतरनाक हैं। उन्होंने कहा कि आज देश में तमाम वाममार्गी जयचन्द शेक्षणिक संस्थाओं से लेकर समाज के विविध क्षेत्रों में सक्रिय हैं। ऐसे ही लोगों के कारण शिक्षा संस्थानों में देश विरोधी नारे लगते हैं। ऐसी ही शक्तियों के खिलाफ गुरुनानकदेव व अन्य सिक्ख गुरुओं ने समाज का सिंहस्थ जगाने का कार्य किया था।आज  एकबार पुनः इस बात की आवश्यकता है कि देश का प्रत्येक व्यक्ति इससे प्रेरणा लेकर सिक्ख योद्धा की तरह खड़ा हो।

इससे पूर्व कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि डॉ भल्ला और राष्ट्रोत्थान न्यास के न्यासी डॉ जे एस नामधारी ने अपने विचार व्यक्त किये । आभार राष्ट्रोत्थान न्यास के अध्यक्ष प्रोफेसर राजेन्द्र बांदिल ने व्यक्त किया। इस अवसर पर समरसता पर आधारित स्मारिका का विमोचन किया गया।

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