पहले भी अंग्रेज और अंग्रेजियत की चिढ़न, षड्यंत्र का शिकार होते रहे हैं भारतीय खिलाड़ी
त्वरित टिप्पणी: प्रवीण दुबे
भारत की बेटी विनेश फोगाट भले ही दुर्भाग्य पूर्ण ढंग से पेरिस ओलंपिक फाइनल से बाहर कर दी गईं हैं, इसके पीछे भले ही नियमों का हवाला दिया जा रहा है लेकिन खेलों की दुनिया में पूर्व में भी भारत के प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को रोकने या उन्हें नीचा दिखाने के षड्यंत्र होते रहे हैं।
कौन भूल सकता है हॉकी के जादूगर कहे जाने वाले महान खिलाड़ी के साथ की गई बदतमीजी को ,जब यूरोपियन देश ध्यानचंद के उत्कृष्ट खेल के सामने फिसड्डी साबित होने के बाद उनकी हॉकी में ही जादू होने का आरोप लगाने लगे थे

ओलंपिक फाइनल मुकाबले से अयोग्य घोषित किए जाने के बाद निराश भारत की बेटी विनेश फोगाट
वे इस कदर बदतमीजी पर उतारू हो गए थे कि मैच के बीच में ही उनकी हॉकी को तोड़कर झूठे आरोप को सच साबित करने की कोशिश की गई थी।
इतना ही नहीं सबसे लोकप्रिय खेल क्रिकेट में अनेक रिकॉर्ड बनाने वाले महान खिलाड़ी सुनील गावस्कर के साथ तत्कालीन समय में अंग्रेज खिलाड़ियों के अधिपत्य वाले आईसीसी ने इतना दोयम दर्जे का व्यवहार किया गया कि उन्हें डॉन ब्रैडमैन ,गेरी सोवर्स ,रिचर्ड जैसे खिलाड़ियों से कहीं ज्यादा योग्य और बेहतर रिकॉर्ड होने के बावजूद “सर” की उपाधि से सम्मानित नहीं किया गया ।
भारत के तमाम परंपरागत खेलों को ओलम्पिक में शामिल न किया जाना भी भारत के खिलाफ अनदेखी का ही परिणाम कहा जा सकता है।
भारत जैसे विशाल और करोड़ों की आबादी वाले देश के प्रति अंग्रेज मुल्कों की चौधराहट वाली ओलंपिक समिति की घृणित मानसिकता का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि 1894 में गठन के बाद से पेरिस ओलंपिक 2024 तक के 130 वर्षों के कार्यकाल में कभी भी भारत के किसी भी व्यक्ति को इस समिति में पदाधिकारी या सदस्य नहीं बनाया गया।
यही वजह है कि भारत ओलंपिक में कभी भी किसी भी विषय को लेकर पुरजोर तरीके से अपनी बात नहीं रख पाया है।
वर्तमान घटनाक्रम की ही बात की जाए तो दुनिया की 144 करोड़ की सबसे बड़ी आबादी वाले मुल्क की खिलाड़ी को एक झटके में नियमों का हवाला देकर मुकाबले से बाहर कर दिया गया बल्कि तुरत फुरत इस बात की घोषणा भी कर दी गई कि जो क्यूबा की खिलाड़ी सेमीफाइनल में फोगाट से हारी थी वही फोगाट की जगह फाइनल खेलेगी।
आखिर यह कैसी नियमावली है। ये नियम हैं या तानाशाही हमने जो तय कर दिया वही मानना होगा न कोई अपील न कोई दलील।
जहां तक खेल भावना का सवाल है तो इसका सम्मान होना ही चाहिए और इसी में खेलों की खूबसूरती भी निहित है लेकिन इस बात का भी ध्यान रखा जाना बेहद जरूरी है कि खेलों को लेकर जो भी निर्णय लिया जा रहा है उसमें पारदर्शिता का पालन किया गया है या नहीं।
आश्चर्य की बात है कि 24 घंटे के भीतर जो पहलवान तीन कुश्तियों के लिए योग्य था,जिस पहलवान को क्वालीफाई करने से लेकर क्वाटर फाइनल, सेमीफाइनल तक कुश्ती लड़ने के लिए योग्य समझा गया था उसी पहलवान को फाइनल खेलने से ठीक पहले मात्र 100 ग्राम वजन अधिक होने की वजह से बाहर कर दिया जाता है यह बात समझ से परे है। देखना होगा कि भारत किस प्रकार इस अन्याय के खिलाफ आवाज उठाता है।