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नोबेल शान्ति पुरस्कार जीतने वाली पत्रकार मारिया चलाती हैं न्यूज़ वेबसाइट जबकि दिमित्री का है स्वतंत्र अखबार

शुक्रवार को 2021 के नोबल शांति पुरस्कार की घोषणा कर दी गई. इस साल के नोबेल शांति पुरस्कार मारिया रेस्सा और दिमित्री मुरातोव को देने की घोषणा हुई है. इन दोनों को अभियव्यक्ति की स्वतंत्रता की हिफ़ाज़त के प्रयास करने के लिए ये पुरुस्कार दिया गया है.

नोबेल प्राइज़ देने वाली संस्था की ओर से किए गए ट्वीट में कहा गया है, “इन दोनों ने बोलने की आज़ादी की सुरक्षा करने की कोशिश की है जो लोकतंत्र और शांति की एक ज़रूरी शर्त है.”

मारिया रेस्सा फ़िलीपीन्स के जानी-मानी पत्रकार हैं जो रेपलर नाम की वेबसाइट चलाती हैं. सरकार से मुश्किल सवाल पूछने के कारण, फ़िलीपीन्स में उन्हें कई दिक्कतों का सामना भी करना पड़ा है. रेस्सा का जन्म फ़िलीपीन्स में ही हुआ था लेकिन वे बचपन में ही अमेरिका चली गई थीं. उन्होंने प्रिंसटन यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की है.

दिमित्री मुरातोव भी पत्रकार हैं और उन्होंने नोवाजा गज़ेता नाम के एक स्वतंत्र अख़बार की स्थापना की है. वे दशकों से रूस में बोलने की आज़ादी की हिमायत करते रहे हैं.

इस प्रतिष्ठित पुरस्कार के विजेता को साढ़े आठ करोड़ रुपये के क़रीब राशि मिलती है. इन दोनों का चुनाव 329 उम्मीदवारों में से किया गया है. नोबेल दुनिया के सबसे बड़े पुरस्कारों में से एक हैं. नोबेल शांति पुरस्कार उन छह पुरस्कारों में से एक है जिसकी शुरुआत स्वीडन के वैज्ञानिक, बिज़नेसमैन और समाजसेवी एलफ्रेड नोबल ने की थी

लेकिन राजनीति से संबंध के कारण, शांति पुरस्कार बाकी के पांच नोबेल पुरस्कारों की तुलना में ज़्यादा विवादों में रहा है. हम यहां कुछ ऐसे लोगों के बारे में बता रहें हैं जिन्हें पुरस्कार दिए जाने पर विवाद हुआ और एक शख्स जिसे पुरस्कार नहीं दिए जाने की आलोचना हुई.

बराक ओबामा

कई लोगों ने अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा को नोबेल पुरस्कार दिए जाने पर आपत्ति जताई थी. ख़ुद ओबामा इस पुरस्कार के मिलने से हैरान थे.

उन्होंने साल 2020 में प्रकाशित अपनी जीवनी में लिखा कि पुरस्कार की घोषणा के बाद उन्होंने उनकी पहली प्रतिक्रिया थी, “किस लिए”.

वो नौ महीने पहले ही राष्ट्रपति बने थे और आलोचकों का कहना था कि ये जल्दी में लिया गया फ़ैसला था. ओबामा के पद ग्रहण करने के सिर्फ 12 दिनों बाद ही नोबेल पुरस्कार के नॉमिनेशन की प्रक्रिया ख़त्म हो गई थी.

साल 2015 में नोबेल इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर, गेर लुंडेस्टन ने बीबीसी को बताया था कि जिस कमेटी ने ये फ़ैसला लिया था, उन्हें बाद में इस पर अफ़सोस हुआ था.

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