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पॉसिटिविटी अनलिमिटेड व्याख्यान की निंदा भारत के संतों व महानुभावों के अपमान की नीच हरकत है

ये राजनीति भी बड़ी अजीब है राजनीति करने वालों को हर काम में राजनीति ही दिखाई देती है फिर चाहे वह कितना ही अच्छा या सकारात्मक कार्य हो। अब देश के तमाम सामाजिक धार्मिक महानुभावों,संतों आदि के सहयोग से कोरोनाकाल में उपजी मेंटल निगेटिविटी को दूर करने पॉसिटिविटी अनलिमिटेड व्याख्यान माला की शुरुआत को ही राजनीतिक चश्मे से देखा जा रहा है। इसे मानसिक दिवालियेपन की पराकाष्ठा कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होना चाहिए । आगे बढ़ने से पूर्व आपको यह जानना जरूरी है की पॉसिटिविटी अनलिमिटेड व्याख्यान माला आखिर है क्या। कोविड रिस्पांस टीम (सीआरटी), समाज हितैषी नागरिक, धार्मिक, सामाजिक संगठनों की एक ऐसी पहल है जो कोरोना संकट काल में महामारी से निपटने के लिए भारत के व्यापक प्रयासों के बीच समाज में सकारात्मक वातावरण का निर्माण करने के लिए ‘’Positivity Unlimited : हम जीतेंगे’ व्याख्यान श्रृंखला का आयोजन कर रही है।

यह व्याख्यान श्रृंखला अक्षय तृतीय के अवसर पर 11 से 15 मई तक आयोजित की जा रही है। व्याख्यान श्रृंखला में सद्गुरु जग्गी वासुदेव, पूज्य आचार्य प्रमाणसागर जी, श्री श्री रविशंकर जी, श्री अज़ीम प्रेमजी,  पूजनीय शंकराचार्य विजयेंद्र सरस्वती जी, पद्म विभूषण सोनल मानसिंह जी, आचार्य विद्यासागर जी, पूज्य महंत संत ज्ञानदेव सिंह जी संबोधित करेंगे। व्याख्यान श्रृंखला का समापन 15 मई को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी के उद्बोधन के साथ होगा।
हम जीतेंगे — ‘Positivity Unlimited’” विचार मंथन व्याख्यान श्रृंखला के पीछे का मूल विचार कोविड-19 के पश्चात समाज से डर, निराशा, लाचारी और नकारात्मकता को दूर करने के लिए आत्मविश्वास पैदा करना और कोविड-19 के बाद लोगों को आगामी प्रयासों के लिए प्रेरित करना है।
अभी इस व्याख्यान माला का एक ही दिन गुजरा है की इस पर राजनीतिक हमले शुरू कर दिए गए हैं। तमाम वामपंथी व कांग्रेसी राजनीतिज्ञों को देश में सकारात्मक माहौल तैयार करने की यह साफ सुथरी परिकल्पना पसंद नहीं आ रही। इन लोगों को  देश के जनमानस को कोरोना महामारी की डरावनी तस्वीर से बाहर निकालकर उनके मस्तिष्क में सकारात्मक ऊर्जा संचार करने का प्रयास पसंद नहीं आ रहा। वे इस पॉसिटिविटी एक्टिविटी को प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी के लिए सकारात्मक वातावरण तैयार किये जाने से जोड़कर  भाजपा और आरएसएस का अभियान निरूपित कर रहे हैं। आखिर इस सोच और इस मानसिकता को क्या कहा जाए ? इस विरोध के पीछे भारतीय स्वस्थ सनातन परंपरा को न पनपने देने का वामपंथी व कांग्रेसी सोच मुख्य वजह है। इन लोगों के पेट में प्रत्येक उस बात अथवा आयोजन से मरोड़ उठती है जिसमें भारतीय मानबिन्दुओं व वैचारिकता का प्रगटीकरण होता है।
 यही कारण है की राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हो अथवा देश की  माटी से जुड़े साधु संत अथवा समाजसेवी यह सभी इन्हें काटने दौड़ते हैं। इन्हें तो भारत के खिलाफ षडयंत्र रचने वाली मियां ख़लीफ़ा, ग्रेटा जैसी विदेशी ताकतें पसंद हैं।
यह तो विदेश से छपने वाले लेंसेन्ट जैसे भारत विरोधी पर्चों का चीख चीखकर समर्थन करते नहीं अघाते।
देश का दुर्भाग्य देखिए चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर और कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने पॉजिटिविटी ड्राइव को प्रोपेगैंडा बताया है। प्रशांत किशोर ने कहा कि देश में दुख के माहौल और हर तरफ त्रासदियों के बीच पॉजिटिविटी के नाम पर झूठ और प्रोपेगैंडा फैलाने की लगातार कोशिश हो रही है।
यह घिनौना है। अभी हाल ही में कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक में प्रधानमंत्री मोदी की निंदा का ऐसा ही राग अलापा गया था जिसका जवाब सोनिया गांधी को लिखे पत्र में भाजपा अध्यक्ष नड्डा ने दिया था।
जहां तक कांग्रेस भाजपा के बीच  आरोप प्रत्यारोप की बात है तो इसे पक्ष विपक्ष की राजनीतिक घटनाक्रम माना जा सकता है लेकिन इसमें देश के तमाम धर्मगुरुओं, सामाजिक धार्मिक महानुभावों की एक अच्छी पहल को भी राजनीतिक विद्वेष के वशीभूत होकर आरोप लगाना बेहद शर्मनाक ही नहीं एक नीच हरकत से कम नहीं कही जा सकती इसकी जितनी निंदा की जाए कम है। 
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