क्या पानी खलनायक है?
अपर्णा पाटिल
बेचारा जल खलनायक बन गया। कल से घर की बालकनी में जाकर आकाश की तरफ देखती हूं। दिल कहता है अच्छी बारिश हो और दिमाग कहता है…..ऐसा सोचना भी पाप है।
पानी आज खलनायक प्रतीत हो रहा है। पर जिम्मेदार कौन? ग्वालियर में हो रहे इस विध्वंस का वास्तविक खलनायक कौन है? पानी कभी भी हमारी तबाही का विचार तक नहीं कर सकता। यह तो ईश्वर प्रदत्त अमृत है। पर वो ऐसा कर रहा है। महानगर ग्वालियर में।
हमने ग्वालियर में चंद वर्षों में जल को बेघर कर दिया। इसके विचरण करने के ठिकानों पर अतिक्रमण कर लिया। शहर के बड़े बड़े नदी, नालों, बावड़ियों को पाट दिया गया। हम स्वार्थी बनते चले गए। धीरे धीरे पानी के स्वाभाविक निवास विलुप्त होते चले गए।
अब आप ही बताइए वर्षा का पानी जाएगा कहां? उसके स्वाभाविक घर तो हमने खत्म कर दिए। परिणामस्वरूप वो हमारे घरों में प्रवेश करने लगा। तबाही मचाने लगा। इसमें जल का दोष नहीं है। किसी को बेघर करोगे तो वो कहीं ना कहीं तो वो अपना आशियाना तलाशेगा ही। क्योंकि हमारे घर जल का स्वाभाविक आशियाना नहीं है इसलिए तबाही तो होगी ही। तबाही का यह मंजर द्विगुणित होता रहेगा प्रति वर्ष, यदि इस दिशा में कुछ ठोस कदम नहीं उठाए गए।

अब समय आ गया हैं कुछ ठोस करने का। कड़े कदम उठाने का। इस त्रासदी को फुट बॉल ना बनाने का। कांग्रेस से बीजेपी के गोल पोस्ट की तरफ….बीजेपी से कांग्रेस के गोल पोस्ट की तरफ़। गोल कभी होगा नहीं। जनता मैच देखती रहेगी। विध्वंस जारी रहेगा। निरंतर…..
कई देशों की यात्रा कर….देश के सैकड़ों शहरों में जाकर….निगम में तीन वर्ष अति सक्रिय रहकर…में जो निष्कर्ष निकाल पा रही हूं वो ये हैं।
1. किसी भी गली, सड़क का निर्माण नगर नालियों के प्रावधान के ना हो।
2. डांबर सड़क के निर्माण बगैर नालियों के प्रावधान के पूर्णतः प्रतिबंधित हों। यह एक आर्थिक अपराध माना जाए। बगैर नालियों के बनी डांबर सड़क एक वर्ष भी नहीं टिक सकती यदि सड़क के दोनों तरफ पर्याप्त कच्ची भूमि ना हो। शहरी क्षेत्र में यह पर्याप्त कच्ची भूमि संभव नहीं है।
3. नदी नालों पर किए गए अतिक्रमण सख्ती से हटाए जाएं। ( यह बगैर लोह इच्छाशक्ति के संभव नहीं है।) पर इस दिशा में आगे बढ़ना ही होगा।
4. शहर की तीनों विधानसभाओं में ड्रेनेज सिस्टम विकसित करने हेतु विधानसभा वार डीपीआर (डीटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट ) बनवाई जाएं। फिर इस पर अमल हेतु फंड की व्यवस्था। यह सबसे महत्वपूर्ण बिंदु है। यह संभव है। मैंने इस विषय पर पिछली परिषद की बैठक में विस्तृत व्याख्यान दिया था। पर दुर्भाग्यवश इस पर कोई ठहराव नहीं किया गया। मैं आदरणीय सभापति जी से पुनः करबद्ध प्रार्थना करूंगी कि इस पर ठहराव किया जाए। ताकि हम इस दिशा में सामूहिक रूप से आगे बढ़ सकें। सभापति महोदय संवेदनशील है निश्चित ही वो जनहित में, ग्वालियर हित में मेरी प्रार्थना स्वीकार करेंगे।
चलिए इस दिशा में हम अपने अपने गिलहरी प्रयास करें। जल को उसका अपना स्वाभाविक निवास लौटाएं। हम शांति से अपने घरों में रहें और जल को उसके घर में स्वच्छंद विचरण करने दें।