प्रवीण दुबे
भोपाल 17 अगस्त 2026/आज 17 अगस्त 2026 को भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन ने अपनी नई राष्ट्रीय टीम घोषित की है। मध्यप्रदेश की बात करें तो मध्यप्रदेश से 6 नेताओं को सीधे राष्ट्रीय टीम में जगह मिली है। इसके अलावा दो ऐसे नेता भी हैं जिनका मध्यप्रदेश से महत्वपूर्ण संबंध है—सौदान सिंह और तरुण चुघ—लेकिन उन्हें एमपी कोटे के छह नामों में गिनना उचित नहीं होगा। उधर मध्यप्रदेश की दृष्टि से एक मजेदार बात यह है कि ग्वालियर से सम्बन्ध रखने वाले मध्यप्रदेश के बड़े भाजपा नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया से जुड़े लोगों को राष्ट्रीय कार्यकारिणी में कोई तवज्जो नहीं मिली है वहीं उनकी बुआ जो राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री रही उन्हें बड़ी जिम्मेदारी देते हुए उपाध्यक्ष बनाया गया।
मध्यप्रदेश के 6 नाम लाल सिंह आर्य ग्वालियर-चंबल/गोहद राष्ट्रीय उपाध्यक्ष,गजेंद्र सिंह पटेल खरगोन राष्ट्रीय महामंत्री कविता पाटीदार इंदौर/महू राष्ट्रीय मंत्री विष्णु दत्त शर्मा (वीडी शर्मा) मूलतः मुरैना, वर्तमान राजनीतिक क्षेत्र खजुराहो प्रकोष्ठ संकुल संयोजक,बंसीलाल गुर्जर मंदसौर किसान मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष,आशीष ऊषा अग्रवाल ग्वालियर राष्ट्रीय मीडिया सह-संयोजक
एक महत्वपूर्ण बात: सौदान सिंह, जो विदिशा जिले के रहने वाले हैं, को राष्ट्रीय सह-संगठन महामंत्री बनाया गया है और तरुण चुघ, जो मध्यप्रदेश से राज्यसभा सांसद हैं लेकिन मूल रूप से पंजाब के हैं, को राष्ट्रीय कार्यालय प्रभारी बनाया गया है। इसलिए यदि “मध्यप्रदेश से जुड़े चेहरों” की व्यापक सूची बनाई जाए तो संख्या 8 हो जाती है।
किसे झटका लगा?
यहां सबसे ज्यादा चर्चा कैलाश विजयवर्गीय, प्रहलाद पटेल, नरोत्तम मिश्रा और अरविंद भदौरिया जैसे नेताओं की हो रही है। एक ताजा राजनीतिक विश्लेषण में इन नामों को राष्ट्रीय टीम में जगह न मिलने से निराश खेमे के रूप में चिन्हित किया गया है।
सबसे दिलचस्प मामला वीडी शर्मा का है। पिछले दिनों उन्हें केंद्र में संभावित मंत्री के तौर पर भी चर्चा में बताया जा रहा था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से उनकी मुलाकात भी हुई थी। अब उन्हें राष्ट्रीय संगठन में जिम्मेदारी मिल गई है। इसका अर्थ यह निकाला जा सकता है कि फिलहाल पार्टी ने उन्हें सरकार से ज्यादा संगठन में इस्तेमाल करने का फैसला किया है।
नरोत्तम मिश्रा के लिए भी यह फैसला राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। वे लंबे समय तक मध्यप्रदेश भाजपा के सबसे प्रभावशाली रणनीतिक चेहरों में रहे हैं और दतिया उपचुनाव के टिकट विवाद के बाद उनकी भूमिका को लेकर विशेष निगाह थी। उपचुनाव में उनके टिकट कटने के बाद पार्टी के भीतर असंतोष भी सामने आया था।
सिंधिया खेमा खाली हाथ
सीधे तौर पर देखें तो नितिन नबीन की नई राष्ट्रीय टीम में ज्योतिरादित्य सिंधिया के किसी प्रमुख समर्थक को राष्ट्रीय पद नहीं मिला है।
यानी तुलसी सिलावट, गोविंद सिंह राजपूत, प्रद्युम्न सिंह तोमर, महेंद्र सिंह सिसोदिया जैसे सिंधिया समर्थक नेताओं में से किसी को राष्ट्रीय पदाधिकारी नहीं बनाया गया।
इस लिहाज से सिंधिया खेमे को राष्ट्रीय संगठन में प्रतिनिधित्व नहीं मिला है।
यह स्थिति पिछले साल की भाजपा राष्ट्रीय परिषद की तस्वीर से भी अलग नहीं है, जहां सिंधिया को स्थान मिला था लेकिन उनके समर्थक नेताओं को राष्ट्रीय परिषद में वैसा प्रतिनिधित्व नहीं मिला था।
तो क्या सिंधिया को तवज्जो नहीं मिली?
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार —सिंधिया को व्यक्तिगत रूप से नुकसान नहीं, लेकिन उनके खेमे को संगठनात्मक लाभ भी नहीं मिला।
सिंधिया खुद केंद्र सरकार में महत्वपूर्ण मंत्रालय संभाल रहे हैं और पार्टी के राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित नेता हैं। इसलिए उन्हें राष्ट्रीय संगठन में कोई पद नहीं दिया गया, इसे सीधे “सिंधिया की उपेक्षा” कहना सही नहीं होगा।
लेकिन राजनीति में असली संकेत यह है कि उनके साथ भाजपा में आए पुराने समर्थकों में से किसी को नबीन की राष्ट्रीय टीम में जगह नहीं मिली।
इसका मतलब यह निकाला जा सकता है कि भाजपा नेतृत्व मध्यप्रदेश में “सिंधिया फैक्टर” को बनाए रखते हुए संगठन का नियंत्रण पुराने भाजपा संगठनात्मक ढांचे के हाथों में रखना चाहता है।
मेरे हिसाब से नितिन नबीन की टीम में मध्यप्रदेश के छह नामों को चार हिस्सों में पढ़ना चाहिए। पहला—संगठन
लाल सिंह आर्य और वीडी शर्मा जैसे अनुभवी संगठनात्मक चेहरों को जिम्मेदारी मिली है।
दूसरा—सामाजिक समीकरण गजेंद्र पटेल के जरिए आदिवासी/निमाड़ क्षेत्र, कविता पाटीदार के जरिए महिला और ओबीसी प्रतिनिधित्व तथा बंसीलाल गुर्जर के जरिए किसान और गुर्जर समाज को साधने का संदेश है।
बंसीलाल गुर्जर को किसान मोर्चे की राष्ट्रीय कमान देना विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि वे मंदसौर क्षेत्र के पुराने किसान नेता हैं और 2017 के किसान आंदोलन के बाद इस क्षेत्र की किसान राजनीति से उनका जुड़ाव रहा है। तीसरा—
ग्वालियर के आशीष ऊषा अग्रवाल को राष्ट्रीय मीडिया सह-संयोजक बनाना मध्यप्रदेश के मीडिया संगठन को राष्ट्रीय स्तर पर ले जाने का संकेत है। चौथा—पुराने दिग्गजों की जगह नई संगठनात्मक पीढ़ी। कैलाश विजयवर्गीय, प्रहलाद पटेल और नरोत्तम मिश्रा जैसे पुराने ताकतवर नेताओं को राष्ट्रीय टीम से बाहर रखकर पार्टी ने यह संकेत दिया है कि हर बड़े नेता को राष्ट्रीय संगठन में पद देना जरूरी नहीं है।
कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है नितिन नबीन की पहली राष्ट्रीय टीम में मध्यप्रदेश की हिस्सेदारी कमजोर नहीं, बल्कि काफी मजबूत है—लेकिन यह हिस्सेदारी “सत्ता के बड़े चेहरों” की बजाय “संगठन और सामाजिक समीकरण” पर आधारित है।
सबसे बड़ा संदेश यह है कि भाजपा ने सिंधिया को अलग से चुनौती नहीं दी, लेकिन सिंधिया खेमे को राष्ट्रीय संगठन में जगह देकर मजबूत भी नहीं किया। इसके उलट वीडी शर्मा, लाल सिंह आर्य, गजेंद्र पटेल, बंसीलाल गुर्जर, कविता पाटीदार और आशीष अग्रवाल जैसे संगठनात्मक चेहरों को आगे बढ़ाया गया है।
इसलिए मध्यप्रदेश भाजपा की अंदरूनी राजनीति के लिहाज से इसे “सिंधिया की उपेक्षा” से ज्यादा “संगठन की स्वायत्तता और पुराने भाजपा कैडर को प्राथमिकता” के रूप में पढ़ना ज्यादा उचित होगा।
और ग्वालियर-चंबल के लिहाज से सबसे बड़ी खबर आशीष ऊषा अग्रवाल और लाल सिंह आर्य—दोनों का राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचना है। लाल सिंह आर्य को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और आशीष अग्रवाल को राष्ट्रीय मीडिया सह-संयोजक बनाया जाना इस क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण संगठनात्मक बढ़त है।