प्रवीण दुबे
मध्यप्रदेश की राजनीति इन दिनों एक नए चलन की ओर बढ़ती दिखाई दे रही है—कैमरे के सामने सख्ती, और कैमरे के पीछे ढिलाई। ग्वालियर में हाल ही में कैबिनेट मंत्री नारायण सिंह का मीडिया के सामने तीखा तेवर दिखाना इसी प्रवृत्ति का एक ताज़ा उदाहरण है। सामान्यतः शांत और शालीन माने जाने वाले मंत्री का यह बदला हुआ अंदाज़ अचानक नहीं है, बल्कि यह उस राजनीतिक संस्कृति का हिस्सा बनता जा रहा है, जहाँ प्रदर्शन ज्यादा और परिणाम कम दिखाई देते हैं।
यह कोई पहला मामला नहीं है। प्रदेश में कई वरिष्ठ मंत्री वर्षों से कैमरे के सामने अधिकारियों को फटकारते, नाराज़गी जताते और सख्ती का दिखावा करते नजर आते रहे हैं। ऐसे दृश्य जनता को क्षणिक संतोष तो देते हैं—मानो कोई उनकी समस्याओं के लिए लड़ रहा हो—लेकिन असल सवाल यह है कि क्या इन दिखावटी नाराज़गियों से व्यवस्था में कोई ठोस बदलाव आता है?
सच्चाई यह है कि मध्यप्रदेश की नौकरशाही पर इन ‘कैमरा-केंद्रित’ कार्रवाइयों का कोई स्थायी असर नहीं पड़ता। नौकरशाही की उदासीनता और जवाबदेही की कमी जस की तस बनी हुई है। हालात यहाँ तक पहुँच चुके हैं कि विकास कार्यों और जनसमस्याओं से जुड़े कार्यक्रमों को भी गंभीरता से नहीं लिया जा रहा। अधिकारी जानते हैं कि कैमरे के सामने मिली फटकार अक्सर वहीं खत्म हो जाती है—न तो कोई ठोस कार्रवाई होती है और न ही कोई जवाबदेही तय होती है।
इस पूरे घटनाक्रम में मीडिया की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। टीआरपी की दौड़ में ऐसे ‘ड्रामाई’ दृश्य प्रमुखता से दिखाए जाते हैं, जिससे वास्तविक मुद्दे पीछे छूट जाते हैं। मंत्री का गुस्सा सुर्खियाँ बन जाता है, लेकिन जनता की समस्या जस की तस बनी रहती है।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जब समस्या स्पष्ट है, तो समाधान क्यों नहीं? क्या वजह है कि प्रदेश स्तर पर सख्त नियम और जवाबदेही तय नहीं हो पा रही? क्यों मुख्यमंत्री स्तर पर नौकरशाही की कार्यप्रणाली में सुधार के लिए ठोस कदम नहीं उठाए जा रहे?
जरूरत इस बात की है कि दिखावे की राजनीति से आगे बढ़कर प्रणालीगत सुधार पर ध्यान दिया जाए। अधिकारियों की जवाबदेही तय हो, कार्यों की नियमित समीक्षा हो और लापरवाही पर सख्त कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। साथ ही, मंत्रियों को भी यह समझना होगा कि कैमरे के सामने गुस्सा दिखाने से ज्यादा जरूरी है नीतिगत और प्रशासनिक सुधार लाना।
अंततः, लोकतंत्र में जनता केवल दृश्य नहीं, परिणाम चाहती है। अगर गुस्सा सिर्फ कैमरे तक सीमित रहेगा, तो विश्वास भी धीरे-धीरे खत्म होता जाएगा। अब वक्त है कि सरकार और प्रशासन दोनों यह तय करें कि वे नौटंकी की राजनीति करेंगे या नतीजों की राजनीति।
कैमरे के सामने गुस्सा दिखाना आसान है, लेकिन व्यवस्था बदलना कठिन। मध्यप्रदेश की जनता अब तेवर नहीं, परिणाम चाहती है—और यही इस “फटकार राजनीति” की असली परीक्षा है।