Homeत्वरित टिप्पणीयह वीरांगना को नमन है या राजनीति ?

यह वीरांगना को नमन है या राजनीति ?

 प्रवीण दुबे
अपने 138 वर्ष के कार्यकाल में कांग्रेस के किसी महासचिव  को वीरांगना लक्ष्मीबाई की समाधि को नमन करने की अक्ल तो आई। किसी ने ठीक ही कहा है “जब जागो तभी सवेरा है” वीरांगना ने 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों से संघर्ष करते हुए इसी ग्वालियर की धरा पर अपने प्रणोत्सर्ग कर दिए थे उसके बाद सिंधिया राजपरिवार के सहयोग से यहां उनका समाधिस्थल निर्माण कराया गया।
1857 के स्वतंत्रता संग्राम के 28 वर्ष बाद एक अंग्रेज अफसर ए ओ ह्यूम ने 1885 में कांग्रेस की स्थापना की । इस प्रकार 139 वर्षों के इतिहास में नेहरू गांधी परिवार के लगभग प्रत्येक सदस्य जिनमें देश के प्रथम प्रधानमंत्री रहे जवाहरलाल नेहरू से लेकर दो अन्य प्रधानमंत्री क्रमशः इंदिरागंधी और राजीव गांधी के अलावा संजय गांधी, पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी उनके पुत्र राहुल गांधी पुत्री प्रियंका गांधी ने विविध प्रयोजनों से ग्वालियर का दौरा किया। लेकिन इनमें से किसी को भी कभी विधिवत वीरांगना की शहादत को नमन करने की याद नहीं आई। 
वरिष्ठ पत्रकार लेखक राकेश अचल का इस बारे में कहना है कि कांग्रेस की लंबी परंपरा को तोड़कर उनकी महासचिव वीरांगना की समाधि पर जा रहीं हैं यह स्वागत योग्य कदम है। वे कहते हैं देर ही से सही इस विषय को लेकर कांग्रेस को सद्बुद्धि तो आई। 
एक अन्य वरिष्ठ पत्रकार डॉ केशव पांडेय ने भी इस बात को आश्चर्यजनक बताया कि नेहरू गांधी परिवार का कोई सदस्य वीरांगना की समाधि पर श्रद्धानवत होने जा रहा है। उन्होंने कहा कि राजनीतिक लाभ उठाने के उद्देश्य से प्रियंका को लक्ष्मीबाई की याद आई है। एक अन्य वरिष्ठ पत्रकार देव श्रीमाली ने भी इसे एक स्वस्थ परंपरा करार दिया। 
 
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जवाहरलाल नेहरू से लेकर प्रियंका गांधी तक जब किसी भी नेहरू गांधी परिवार के सदस्य ने वीरांगना की समाधि को इतना महत्व नहीं दिया तो अब ऐसा क्या हो गया कि कांग्रेस सचिव प्रियंका गांधी ने ग्वालियर पहुंचने के साथ ही वीरांगना की समाधि पर श्रद्धासुमन अर्पित करने का निर्णय लिया है।
 
इस बारे में राजनेतिक विश्लेषकों का मानना है कि प्रियंका गांधी का लक्ष्मीबाई की समाधि पर जाने के पीछे मूलतः सिंधिया राजवंश पर निशाना साधना मुख्य कारण है। लेकिन इसका कितना लाभ कांग्रेस को मिलेगा यह तो अभी कहना थोड़ा जल्दबाजी होगी,लेकिन जानकारों का इतना अवश्य मानना है कि ऐसा करके कांग्रेस खासकर गांधी परिवार ने भाजपा को हमले करने का एक और मौका दे दिया है।
 
सबसे बड़ी बात यह है कि जो कांग्रेस इस मुद्दे पर सिंधिया को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश कर रही है उसी कांग्रेस को उस वक्त न तो माधवराव और न ज्योतिरादित्य सिंधिया में कोई खोट नजर आई जब वे कांग्रेस में थे और तो और इन्ही प्रियंका गांधी के साथ ज्योतिरादित्य सिंधिया को राहुल गांधी ने 2019 के लोकसभा चुनाव में  यूपी का प्रभारी बनाकर भेजा था। तब प्रियंका ने खुशी खुशी इस निर्णय को स्वीकार किया था। 
 
सिंधिया जब कांग्रेस में थे तो इस क्षेत्र में उनकी पार्टी को बड़ी सफलता मिली थी। ज्योतिरादित्य सिंधिया अपने समर्थकों के साथ बीजेपी में गए तो प्रदेश में कांग्रेस की सरकार गिर गई। कांग्रेस इस विधानसभा चुनाव में सिंधिया को सबक सिखाने के लिए उनके क्षेत्र में ज्यादा जोर लगा रही है। सिंधिया के बीजेपी में जाने के बाद पहली कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी उनके गढ़ में आ रही हैं।

वहीं, कांग्रेस में इस बात का मलाल अब भी है कि राज्य में सरकार ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनके समर्थकों की बगावत के कारण गई थी। यही कारण है कि कांग्रेस के तमाम बड़े नेता साढे़ तीन साल से सिंधिया पर सीधे निशाना साधे हुए हैं। वहीं, ग्वालियर-चंबल इलाके में उनका दखल बना हुआ है। कांग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गांधी 21 जुलाई को ग्वालियर प्रवास पर आ रही हैं। इस दौरान उनकी बड़ी आम सभा होने वाली है।

इस सभा में बड़ी तादाद में कार्यकर्ताओं को जुटाने के लिए तमाम बड़े नेता जी-जान लगाए हुए हैं। कांग्रेस की कोशिश है कि प्रियंका गांधी की मौजूदगी में वह अपना शक्ति प्रदर्शन करने में सफल हो। पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह अब भी ज्योतिरादित्य सिंधिया पर हमलावर हैं। उन्होंने पत्रकारों के एक सवाल में कहा भी कि 1857 में गढ़ ढह गया था और अब एक बार फिर गढ़ ढहने वाला है।

गौरतलब है कि ग्वालियर चंबल में विधानसभा की 34 सीटें हैं। प्रियंका गांधी ग्वालियर की रैली से इन सभी सीटों को साधने की कोशिश करेंगी। कांग्रेस उनकी रैली में भारी भीड़ जुटाने के लिए युद्ध स्तर पर तैयारी कर रही है। अभी अधिकांश सीटों पर बीजेपी का कब्जा है।
 
 
 
 
 

 

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