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राजनीति का दरवाजा खटखटाते सिंधिया राजवंश के चश्मो-ओ-चिराग महाआर्यमन

प्रवीण दुबे
आज राजनीतिक गलियारों से जुड़े सन्दर्भ को व्यवस्थित करते  में एक पुराने  ब्लैक एंड व्हाइट चित्र पर सहसा नजर ठहर गई।
     
23 फरवरी 1970 के इस लगभग 53 वर्ष पुराने फोटो में अटलबिहारी वाजपेयी गम्भीर मुद्रा में कुछ पढ़ रहे हैं और उनके निकट बैठे हैं महारज माधवराव सिंधिया समीप ही राजमाता विजयाराजे सिंधिया माइक से कुछ बोल रही हैं।
इस चित्र पर लिखा  कैप्शन पढ़ा तो उसपर लिखा था माधवराव सिंधिया को जनसंघ की सदस्यता दिलाते अटलबिहारी वाजपेयी तारीख थी 23 फरवरी 1973 साथ ही इस बात का जिक्र भी था कि माधवराव ने 101 रुपए सदस्यता शुल्क जमा करके जनसंघ की सदस्यता ली थी। 
यह ऐतिहासिक चित्र आज बहुत कुछ सोचने को मजबूर कर गया माधवराव से लेकर  महाआर्यमन सिंधिया तक सिंधिया राजवंश के तमाम चेहरे मन मस्तिष्क पर छा से गये।
हम आज कोई सिंधिया राजपरिवार का राजनीतिक विश्लेषण करने नहीं जा रहे लेकिन इतना अवश्य है कि सिंधिया राजवंश में युवा हो चुकी नई पीढ़ी के  चश्मो-ओ-चिराग  महाआर्यमन सिंधिया के कदम  राजनीति की तरफ बढ़ते अवश्य देख रहे हैं।
हम इसपर आगे कुछ लिखे इससे पहले आपको यह बताना जरूरी है कि भारतीय राजनीति में सिंधिया राजवंश की तुलना अन्य राजनीतिक घरानों से की जाए तो नेहरू-गाँधी वंश के बाद कई और वंश जैसे मुलायम और लालू, पायलट, करुणानिधि और कश्मीर में अब्दुल्ला घराना भारतीय राजनीति का हिस्सा बन चुके हैं।
लेकिन तथ्यात्मक रूप से यह कहा जा सकता है कि सिंधिया राजवंश इन सभी राजनीतिक घरानों से   ज्यादा वजनदारी के साथ भारतीय राजनीति से जुड़ा रहा है।
     
तथ्य इस बात के गवाह हैं कि ग्वालियर का सिंधिया घराना, जिसका कोई न कोई सदस्य 1957 से ले कर अब तक भारतीय संसद या विधानसभा का सदस्य रहा है जबकि 1991 से 1996 तक पाँच वर्ष का समय ऐसा भी रहा है जब नेहरू वंश का कोई सदस्य भारतीय संसद का सदस्य नहीं रहा ।
हां वर्तमान लोकसभा का कुछ कालखंड जरूर ऐसा रहा जब सिंधिया राजवंश के कोई सदस्य सदन में नहीं था लेकिन ज्योतिरादित्य सिंधिया के राज्यसभा में पहुंचते ही यह शून्य भर गया है।
आइये उस विषय पर लौटते हैं जिसका उल्लेख हमने ऊपर किया है। सिंधिया राजपरिवार के युवराज अर्थात केंद्रीयमंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के पुत्र महाआर्यमन सिंधिया के राजनीति में आने के संकेत पिछले एकमाह से साफतौर पर महसूस किये जा रहे हैं।
     
पिछले माह ज्योतिरादित्य सिंधिया ने राजमाता की पुण्य तिथि पर खुद उनका परिचय कराया था।   यह भी बताया था कि ये कहां के रहने वाले और इनका कार्य क्या है? वे सबकुछ बेटे को समझाकर बता रहे थे।
अब एकबार पुनः आज महाआर्यमन सिंधिया के जन्मदिन पर जयविलास ने जो कुछ प्लानिंग की है व जिस प्रकार से महाआर्यमन सिंधिया के बैनर होडिंग चमक रहे हैं उससे साफतौर पर यह संकेत मिल रहा है या दूसरे शब्दों में कहा जाए कि दिया जा रहा है कि सिंधिया राजवंश के यह युवराज अब अपने पिता की राजनीतिक विरासत में साझेदार बनने को तैयार है।
इसे देखकर ऐसा लगता है कि अब वह दिन दूर नहीं जब ग्वालियर वासियों के सामने एकबार फिर वह ऐतिहासिक क्षण आने वाला है जब अपने बाबा व पिता की तरह महाआर्यमन सिंधिया को विधिवत रूप से भाजपा की सदस्यता ग्रहण कराई जाएगी।
लेकिन यह देखना दिलचस्प होगा की यह ऐतिहासिक पल कब आएगा ?  ऐसा इसलिए क्योंकि एकतरफ भाजपा राजनीति में वंशवाद का विरोध करती रही है तो दूसरी ओर अकेले मध्यप्रदेश की बात करें तो शिवराज सिंह से लेकर नरेंद्र सिंह और गोपाल भार्गव से लेकर प्रभात झा तक नेतापुत्रों की लंबी फ़ौज भाजपा के द्वार पर दस्तक देती दिखाई दे रही है।
ऐसी स्थिति में पार्टी के सामने कथनी व करनी का प्रश्न तो है ही साथ ही सबको सन्तुष्ट करने की समस्या भी है।  हां इन सबसे बड़ी मुसीबत की बात तो आम व जमीनी कार्यकर्ताओं को मौका देने की भी है यदि इन नेता पुत्रों को ही मौका मिलता है तो आम कार्यकर्ता का क्या होगा ?
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