प्रवीण दुबे
जहां छोटे छोटे गैरराजनीतिक, सामाजिक संगठनों में पद प्राप्त करने को लेकर जबरदस्त प्रतिस्पर्धा औऱ मारा मारी देखने को मिलती है वहीं दुनिया का सबसे बड़ा गैरराजनीतिक संगठन होने के बाबजूद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में शीर्ष पदों पर आसीन पदाधिकारी बिना किसी महत्वाकांछा के त्याग की अनूठी मिसाल प्रस्तुत करते हैं।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुख्यालय नागपुर में आज
चुनाव का दिन हैं। यहां अन्य संगठनों से हटकर चुनाव को लेकर न कोई तनाव दिखाई देता है न कोई प्रतिस्पर्धा ऐसा इसलिए क्योंकि संघ में व्यक्ति को कोई स्थान नहीं होता वहां कार्य की प्रधानता है यही वजह है कि संघ के संविधान के अनुसार हर तीन वर्ष में चुनाव तो होते हैं लेकिन इसमें त्याग का ऐसा अनूठा आदर्श प्रस्तुत होता है कि माहौल भावुक हो उठता है।
बड़े से बड़े पद पर आसीन स्वयंसेवक जब खुद आगे आकर पद त्यागने की इच्छा व्यक्त करके अपने निकटस्थ को लाकर उक्त स्थान पर आरूढ़ करता है और कुर्सी छोड़ सामान्य स्वयंसेवक की कतार में आकर बैठ जाता है तो आंखे छलछला जाती हैं। कौन भूल सकता है पूर्व सरसंघचालक ,बालासाहेब और रज्जू भईया सुदर्शन जीी के पद त्यागने के छणों को। आँखे नम हो उठती हैं जब उन प्रसंगों को हम पढ़ते हैं।
वर्तमान की बात की जाये तो सरसंघचालक के बाद सरकार्यवाह का पद सबसे बड़ा होता है। 2009 में इंदौर निवासी भय्याजी जोशी सरकार्यवाह चुने गए थे। बड़ा पद होने और उत्कृष्ट कार्यकाल के बावजूद तीन साल बाद स्वतः पद छोड़ने की इच्छा व्यक्त करके सबको चोंका दिया था हालांकि उन्हें पुनः एक ओर कार्यकाल के लिए यह जिम्मेदारी सौंपी गई 2015 में उन्होंने पुनः यह कहते हुए की ज्यादा ऊर्जावान किसी युवा को यह दायित्व दिया जाना चाहिये लेकिन कार्यकुशलता को देखते हुए उन्हें एकबार पुनः यह पद दिया गया,अनुशासन देखिए कि जहां संगठन के निर्णय को भय्याजी जी ने स्वीकार किया वहीं इसके खिलाफ चुनाव सभागार से दूसरा कोई नाम इस पद के लिए सामने नहीं आया। इसी प्रकार अन्य सभी बड़े पदों व कार्यकारणी के लिए भी सर्वसहमति से चुनाव सम्पन्न हो जाता है।
इस समय संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक नागपुर में जारी है। इस बार चुनाव होने हैं भय्याजी ने पुनः पद त्याग की इच्छा जताई है सम्भावना है आयु और स्वास्थ्य को देखते हुए इस पद पर बदलाव कर दिया जाएगा। एक बार पुनः पूरी दुनिया देखेगी संघ में पदत्याग की अनूठी कार्यपद्धति।
कैसे चुने जाते हैं सरकार्यवाह
वर्तमान सरकार्यवाह नए सरकार्यवाह की चुनाव प्रकिया शुरू करने के आग्रह के बाद मंच से नीचे उतर जाएंगे. इसके बाद सबसे वरिष्ठ सह सरकार्यवाह के चुनाव के लिए चुनाव अधिकारी की घोषणा करेंगे.
इसके बाद चुनाव अधिकारी चुनावी प्रक्रिया की शुरुआत करते हुए नए सरकार्यवाह के लिए नाम मांगेंगे. केंद्रीय प्रतिनिधियों के इस चुनाव में केंद्रीय प्रतिनिधि ही वोटर होते हैं, लेकिन कोई भी प्रचारक वोटर नहीं होता.
अगर किसी को कोई नाम देना होता है तो वो 3 से 4 अनुमोदक के साथ नाम प्रस्ताव कर सकता है. लेकिन आम तौर पर सरकार्यवाह का चुनाव सर्व सम्मति से होता है.
नए सरकार्यवाह का नाम चुनाव अधिकारी बताते हैं और सभी लोग ॐ उच्चारण के साथ हाथ उठाकर नए सरकार्यवाह का चुनाव सम्पन्न कराते हैं. अगले दिन सरसंघचालक और सरकार्यवाह अपनी कार्यकारणी का ऐलान करते हैं.
हर तीन साल पर होती है ये बैठक
हर तीन वर्ष पर प्रतिनिधि सभा की संगठन मुख्यालय नागपुर में होने वाली बैठक में संघ के सरकार्यवाह (एक तरह से कार्यकारी प्रमुख) का चुनाव किया जाता है. इसके साथ ही संघ के अन्य प्रमुख पदाधिकारियों की नियुक्ति भी होती है. सभी पदाधिकारियों का कार्यकाल तीन साल का होता है.
