प्रवीण दुबे
हाल ही में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग UGC द्वारा लागू किया गया “Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026” के कारण पूरे देश में बेचैनी दिखाई दे रही है। विशेषकर सवर्ण समाज से जुड़े संगठन और व्यक्ति यहां तक की कई शिक्षाविद इससे नाराज दिखाई दे रहे हैं कई प्रदेशों में इसके खिलाफ प्रदर्शन की भी खबरें आ रहीं हैं आशंका यह भी व्यक्त की जा रही है कि यदि सरकार ने इस तरफ गंभीरता नहीं दिखाई तो बड़े पैमाने पर प्रदर्शन आंदोलन के हालात पैदा हो सकते हैं। चिंतनीय और चौंकाने वाली बात यह है कि यह अध्यादेश एक ऐसे समय में आया है जब भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था पहले ही शैक्षणिक गुणवत्ता, स्वायत्तता और राजनीतिक हस्तक्षेप जैसे प्रश्नों से जूझ रही है और जो तत्व इसका लाभ उठाना चाहते हैं उनके हाथ एक और हथियार आ गया है।
इस सारे घटनाक्रम के बीच यूजीसी और इसका समर्थन करने वालों का मत भी जानना बहुत आवश्यक है इनका दावा है कि यह अध्यादेश उच्च शिक्षा संस्थानों में जाति-आधारित भेदभाव को समाप्त करने और समान अवसर सुनिश्चित करने के लिए लाया गया है।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल है कि क्या केवल कह देने मात्र से इसे सही ठहरा दिया जाना उचित होगा ?
प्रथम दृष्टया इसके प्रावधान कई गंभीर सवाल भी खड़े करते हैं। देशभर से जिस प्रकार की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं उन्हें देखकर यह कहा जा सकता है कि समाज का सवर्ण समाज और उससे जुड़े तमाम संगठन बेहद उद्वेलित हैं ऐसे में यह जानना बेहद आवश्यक है कि Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026 में आखिर है क्या?
अध्यादेश के मुख्य प्रावधान
नए यूजीसी अध्यादेश के अंतर्गत
हर विश्वविद्यालय और कॉलेज में Equal Opportunity Centre (EOC) स्थापित करना अनिवार्य किया गया है।इसके अंतर्गत Equity Committee का गठन होगा जिसमें सामाजिक वर्गों का प्रतिनिधित्व तय किया गया है।
छात्र, शिक्षक और कर्मचारी किसी भी प्रकार के भेदभाव की शिकायत कर सकते हैं।
नियमों का पालन न करने पर संस्थान की मान्यता, फंडिंग और डिग्री प्रदान करने का अधिकार छीना जा सकता है।
काग़ज़ पर ये प्रावधान आकर्षक लगते हैं, लेकिन व्यवहार में इनके प्रभाव कहीं अधिक जटिल हैं।
सबसे बड़ा सवाल विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता
भारतीय विश्वविद्यालयों की आत्मा उनकी शैक्षणिक स्वतंत्रता है।
यूजीसी का यह अध्यादेश प्रशासनिक नियंत्रण को इतना विस्तृत कर देता है कि
आंतरिक शैक्षणिक निर्णयों पर बाहरी हस्तक्षेप बढ़ सकता है शिक्षक और प्रशासनिक अधिकारी निर्णय लेने से पहले डरेंगे हर अनुशासनात्मक या अकादमिक मतभेद को “भेदभाव” की श्रेणी में डालने का ख़तरा रहेगा
यह अध्यादेश शिक्षा संस्थानों को ज्ञान के केंद्र से अधिक निगरानी तंत्र में बदलने की आशंका पैदा करता है।
क्या हर असहमति भेदभाव है?
आलोचकों का तर्क है कि उच्च शिक्षा में मूल्यांकन, चयन और शोध स्वाभाविक रूप से प्रतिस्पर्धी प्रक्रियाएँ हैं
यदि हर असफलता या असहमति को सामाजिक भेदभाव से जोड़ दिया गया, तो मेधा (Merit) की अवधारणा कमजोर होगी
इस अध्यादेश के बाद शिक्षा संस्थानों का वातावरण आपसी सदभावना समरसता को खतरा भी बढ़ गया है कई बड़े शिक्षाविद तो यहां तक कह रहे हैं कि इस अध्यादेश के कारण शिक्षक–छात्र संबंध अविश्वास के वातावरण में बदल सकते हैं
यह अध्यादेश कहीं न कहीं डर का वातावरण पैदा कर सकता है, जहाँ निर्णय योग्यता से अधिक कानूनी आशंकाओं से प्रभावित होंगे।
राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव
कुछ सामाजिक संगठनों का मानना है कि यह अध्यादेश शिक्षा के क्षेत्र में राजनीतिक विचारधारा को प्रवेश देने का माध्यम बन सकता है जैसा कि पहले से ही JNU जैसे संस्थानों में दिखाई देता रहा है लेकिन अभी कहीं न कहीं उनपर लगाम का रास्ता भी बना हुआ हैं लेकिन इस तरह के अध्यादेश के बाद विदेशों से संचालित देश विरोधी ताकतों को सुनियोजित तरीके से वातावरण बिगाड़ने का मौका मिलेगा,यह सामाजिक संतुलन की जगह वर्गीय विभाजन को और गहरा कर सकता है,सामान्य वर्ग के छात्रों में असुरक्षा की भावना बढ़ा सकता है
राजस्थान, मध्यप्रदेश और उत्तर भारत के कुछ हिस्सों में इसका विरोध इस बात का संकेत है कि यह नियम सर्वसम्मति से स्वीकार्य नहीं है।
यह सही है कुछ संस्थानों में भेदभाव की घटनाएँ हुई हैं वंचित वर्गों को संरक्षण मिलना चाहिए लेकिन सवाल यह है कि क्या कठोर केंद्रीय नियंत्रण ही इसका समाधान है? या फिर संस्थागत सुधार, संवाद और संवेदनशील प्रशासन अधिक प्रभावी रास्ता हो सकता था? लिखने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि इस अध्यादेश के बाद विश्वविद्यालयों पर नौकरशाही का दबाव
शिक्षकों की स्वतंत्र सोच पर अंकुश
नियमों के दुरुपयोग की संभावना बढ़ जाएंगी
यूजीसी का नया अध्यादेश 2026 अपने उद्देश्य में सामाजिक न्याय की बात करता है, लेकिन अपने स्वरूप में केंद्रीकरण और नियंत्रण का संकेत देता है।
यदि इसे बिना संतुलन और विवेक के लागू किया गया तो यह शिक्षा सुधार से अधिक शिक्षा पर नियंत्रण का औज़ार बन सकता है। समानता ज़रूरी है, लेकिन स्वतंत्रता की कीमत पर नहीं,भारत की उच्च शिक्षा को ऐसे नियमों की आवश्यकता है जो न्याय और मेधा दोनों को साथ लेकर चलें, न कि उन्हें आमने-सामने खड़ा करें।