भारत में गर्भपात को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाया है। इस फैसले में कोर्ट ने कहा है कि गर्भपात के लिए किसी भी महिला को अपने पति की सहमति लेने की आवश्यकता नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला एक तलाकशुदा व्यक्ति की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। इस केस में गर्भपात कराने से पहले महिला को पति की इजाजत लेने की मांग को लेकर कराया गया था।
पत्नी से अलग हो चुके एक पति की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी भी बालिग महिला को बच्चे को जन्म देने या फिर गर्भपात कराने का फैसला लेने का अधिकार है। महिला के लिए यह जरूरी नहीं कि गर्भपात का फैसला वह पति की सहमति के बाद ले।
गौरतलब है कि 1885 में विवाहित कपल ने तनाव बढ़ने के बाद 1999 से पत्नी अपने मायके में रह रही थी। लेकिन 2003 के बाद वह दोनों सहमति से दोबारा साथ रहने लगे, दोबारा तनाव के बाद दोनों ने तलाक ले लिया। हालांकि इस बीच महिला गर्भवती हो गई। महिला ने गर्भपात कराने का फैसला लिया, जिसका उसके पति ने विरोध किया। पति ने गर्भपात कराने के दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया। बाद में पति ने पत्नी के खिलाफ केस कर दिया और 30 लाख रूपये मुआवजे की मांग की।
इसी मामले पर कोर्ट ने यह अहम फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले पर सहमति जताते हुए कहा कि मानसिक रूप से विक्षिप्त महिला को अधिकार है कि वह अपना गर्भपात करा सके।