Homeप्रमुख खबरेंसांप निकलने के बाद लाठी पीटने जैसी स्थिति में ग्वालियर पुलिस

सांप निकलने के बाद लाठी पीटने जैसी स्थिति में ग्वालियर पुलिस

चालान काटने ,वीआइपी ड्यूटी में ही नजर आते हैं पुलिस के जवान दिखावटी व अक्खड़ स्वभाव के कारण ठप्प हुआ मुखबिरतंत्र परिणाम लगातर लूट व हत्याएं

एक चर्चित कहावत है सांप निकलने के बाद लाठी पीटना ” ग्वालियर पुलिस के क्रियाकलापों को देखने के बाद यह कहावत उनपर पूरी तरह फिट बैठती है। शनिवार को ग्वालियर में जिस तरह से बदमाशों ने दिन दहाड़े गोलियां चलाकर न केवल 8.28 लाख रुपए लूट लिए बल्कि गनमैन की हत्या भी करडाली । उसके बाद जनसमान्य को यह विश्वास करना मुश्किल हो रहा है कि शहर में पुलिस और कानून व्यवस्था जैसी कोई चीज है।

अभी 30 अप्रैल की लूट को ग्वालियरवासी भूले भी नहीं थे जिसमे बदमाशों  शहर के सर्वाधिक भीड़भाड़ वाले बाजार हुजरात चौराहे से एक कारोबारी से 3 लाख रुपए लूट ले गए थे। यह वारदात भी ठीक उसी अंदाज में अंजाम दी गई थी जैसा की शनिवार को हुआ इसमें भी बदमाश काली बाइक से मुंह पर कपड़ा बांधे हथियार से लैश होकर आए थे ।

थोड़ा और पीछे जाएँ तो लुटेरों ने 27 मई को डी डी नगर से 2.89 लाख , 11 जून को निरावली तिराहे से 4 लाख रुपए और 8 मई 2018 को सिटी सेंटर से 24.20 लाख रुपए लूट लिए थे। 

साफ है बदमाश थोड़े थोड़े अंतराल के बाद ग्वालियर पुलिस को लूट की वारदात करके सीधी चुनौती देते रहे है। और अब उनके हौंसले इस कदर बढ़ गए हैं कि वे लूट के साथ ताबड़तोड़ गोलियां बरसाकर हत्या करने में भी नहीं डर रहे।

आखिर इस स्थिति के लिए कौन जिम्मेदार है ? आज ग्वालियर का व्यापारी वर्ग ख़ौफ़ज़दा है की न मालूम कब कहां बदमाश आ धमकेंगे और लूटपाट को अंजाम देकर रफूचक्कर हो जाएंगे।

निसन्देह यह चिंता का विषय है। पुलिस को विचार करना होगा की आखिर कमजोर कड़ी कहां है। वैसे ग्वालियर पुलिस तंत्र की कार्यशैली का थोड़ा सा अध्ययन करने पर यह बात साफ हो जाती है की जमीनी स्तर पर पुलिस का नेटवर्क पूरी तरह से समाप्त हो चुका है।

खाकी वर्दीधारियों की फ़ौज गुंडे बदमाशों की तलाश की जगह चौराहों पर चालान काटने में अधिक व्यस्त दिखाई देती है। जनता व गली मोहल्लों में सामान्य नागरिकों से पुलिस का संवाद समाप्त  सा दिखाई देता है। चौराहों पर रोबीले अंदाज में साधारण जनता को डांटते फटकारते पुलिस वाले अवश्य दिखाई दे जाते है।

इस वजह से जनता पुलिस से डरकर दूर भागती दिखती है परिणाम पुलिस का मुखबिर तंत्र समाप्त हो गया है। यही वजह है कि गुंडे बदमाश एक के बाद एक लूट आदि की वारदातों को अंजाम दे रहे हैं और पुलिस इनका सुराग लगाने में पूरी तरह नाकाम है।

ग्वालियर पुलिस का मुखबिर तंत्र अगर मजबूत होता तो  एक ही अंदाज में लगातार अंजाम दी जा रही लूट की वारदातों को रोका जा सकता था। ऐसा कर रहे लुटेरों बदमाशों के गुंडा तंत्र को पुलिस ट्रेस करके समाप्त कर देती अब तो उसकी हालत सांप निकल जाने के बाद लाठी पीटने जैसी हो रही है और गुंडों के हौंसले बुलंद है जनता भयभीत है।

ग्वालियर में पनपते गुंडातंत्र को लेकर स्थानीय जनप्रतिनिधियों और राज्य की कमलनाथ सरकार  की भूमिका को भी अछूता नहीं छोड़ा जा सकता है। एक तरफ राज्यसरकार जनहितों को दरकिनार करके पुलिस विभाग में आंख मूंदकर तबादले पर तबादले किये जा रही है तो दूसरी ओर जनप्रतिनिधि पूरी तरह मौन धारण किए हुए हैं। लगातार हो रहे तबादलों के कारण गुण्डे बदमाशों पर पकड़ ढीली हो रही है। इसके लिए स्थानीय स्तर पर जिन पुलिस कर्मियों का मुखबिर तंत्र मजबूत रहा है उन्हें तबादले से मुक्त करना होगा ताकि गुंडे बदमाशों की मुखबिरी लगातार होती रहे। जनप्रतिनिधियों को भी इस बात के लिए दवाब बनाने की जरूरत है कि पुलिस केवल चालान काटने या वीआइपी डियूटी में ही न लगी रहे उसका असल काम शहर की कानून व्यवस्था को दुरुस्त रखना है।

 

 

 

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