प्रवीण दुबे
2018 के बाद से भाजपा में लगातार शामिल हुए कांग्रेसियों ने अब भाजपा की रीति नीतियों को भी प्रभावित करना शुरू कर दिया है चौंकने वाली बात तो यह है कि अभी भी कई दिग्गज कांग्रेसियों के भाजपा के सम्पर्क में लगातार बने रहने की खबरें सूत्रों के हवाले से प्राप्त हो रही हैं।
साफ है आगामी विधानसभा चुनावों से पहले पार्टी एकबार पुनः कांग्रेस के लिए अपने दरवाज़े खोल सकती है यदि ऐसा होता है तो भाजपा के सम्पूर्ण कांग्रेसीकरण को कोई टाल नहीं पाएगा।
भाजपा में कांग्रेस के घुसपैठ की समस्या पार्टी के लिए कितनी नुकसान देह बन चुकी है इसका सबसे ताजा उदाहरण निगम मंडल आयोग आदि शासी निकयों में नियुक्तियों को लेकर पार्टी नेतृत्व पर लगातार पड़ रहा दबाव है।
सूत्रों की माने तो ज्योतिरादित्य सिंधिया अपने लगभग पांच समर्थक नेताओं की नियुक्ति को लेकर अड़ गए हैं यही वजह है कि पार्टी नेतृत्व दबाव के चलते पूरी तरह से फाईनल हो चुकी सूची को जारी करने की हिम्मत नहीं नहीं जुटा पा रहा है।
खबर तो यहां तक है कि सिंधिया के मन माफिक बदलाव किए जाने पर सहमति भी बन गई है केवल एक दो नामों पर भी सिंधिया पीछे हटने को तैयार नहीं हैं।
यही स्थिति पहले भी उप चुनाव में टिकट वितरण, मंत्रीमंडल गठन, मंत्रियों के विभाग बंटवारे, जिला और प्रदेश कार्यकारिणी में नियुक्ति आदि को लेकर भी सामने आती रही हैं।
इस कारण भाजपा में जबरदस्त हलचल देखी जा रही है पार्टी के पुराने नेता व कार्यकर्त्ता दबी जुबान इस तरह की दबाव की राजनीति का विरोध कर रहे हैं।
नाम न छापने की शर्त पर कई नेताओं का कहना है कि भाजपा को अपने मूल चरित्र को सुरक्षित रखना है तो कांग्रेस से भाजपा में आने वाले नेताओं को लेकर संगठन स्तर पर अपनी रीतियों नीतियों में बदलाव करना ही होगा अन्यथा वह दिन दूर नहीं जब भाजपा का पूर्ण कांग्रेसीकरण हो जाएगा
क्या सच में ‘कांग्रेसीकरण’ हो रहा है?
‘
कांग्रेसीकरण’ शब्द राजनीतिक रूप से एक आरोप भी है और एक चिंता भी।हालांकि, इसे पूरी तरह तथ्यात्मक मान लेना जल्दबाजी होगी। लेकिन यह जरूर स्पष्ट है कि:
निर्णय प्रक्रिया में बदलाव महसूस किया जा रहा है
व्यक्तिगत प्रभाव पहले की तुलना में अधिक दिख रहा है
संगठनात्मक अनुशासन पर दबाव बढ़ा है
आगे की राह
आगामी विधानसभा चुनावों से पहले भाजपा के सामने दोहरी चुनौती है पहली चुनावी मजबूती बनाए रखना दूसरा संगठनात्मक संतुलन कायम रखना।
यदि पार्टी कांग्रेस से आने वाले नेताओं के लिए स्पष्ट और पारदर्शी नीति बनाती है, तो यह विवाद काफी हद तक नियंत्रित हो सकता है। अन्यथा, आंतरिक असंतोष भविष्य में बड़ी राजनीतिक समस्या बन सकता है।
समाधान बहुत जरूरी
भाजपा का विस्तार उसकी ताकत है, लेकिन वही विस्तार यदि संगठनात्मक असंतुलन का कारण बने, तो यह चुनौती भी बन सकता है। ‘कांग्रेसीकरण’ की बहस केवल आरोप-प्रत्यारोप नहीं, बल्कि एक गहरी संगठनात्मक चिंता का संकेत है—जिसका समाधान समय रहते करना पार्टी नेतृत्व के लिए बेहद जरूरी होगा।