प्रवीण दुबे
शहर के प्रमुख धार्मिक स्थल में शामिल सनातन धर्म मंदिर में राजनीतिक गतिविधियां चरम पर हैं यहां मंदिर के चुनावों को लेकर 560 से अधिक सदस्यों ने दो ग्रुप बनाकर एक दूसरे के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है कोई किसी को निपटाने की धमकी दे रहा है तो कोई पुलिस में आवेदन देकर कार्यवाही की मांग कर रहा है।मंदिर के भीतर पूजा पाठ की जगह घिनौने आरोप प्रत्यारोप का दौर लगातार जारी है।
यही हालात कुछ समय पहले शहर के एक और बड़े मंदिर अचलेश्वर महादेव पर भी दिखाई दिया था यहां पर तो इस कदर झगड़े की स्थिति बनी की मामला पुलिस,प्रशासन और कोर्ट कचहरी तक जा पहुंचा स्थिति नियंत्रित करने कलेक्टर को प्रशासक तैनात करना पड़ा है।


लेकिन इसके बावजूद भी समय समय पर यहां सदस्यों के बीच तनातनी पेपरबाजी होती रहती है शहर के कुछ और बड़े धार्मिक स्थलों पर भी सार्वजनिक विवाद सामने आते रहते हैं।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि धार्मिक स्थलों को इस तरह से राजनीति का अखाड़ा बनाना कहां तक उचित है ?
सनातन धर्म मंदिर की ही बात की जाए तो यहां तकरीबन 565 लोग मंदिर के सदस्य बताए जाते हैं। इन लोगों की सूची पर नजर दौड़ाई जाए तो अधिकांश बड़े धन्ना सेठ व्यापारी, समाजसेवी चेहरे नजर आते हैं।
अफसोस की बात है कि यह सदस्यगण सनातन धर्म जैसी बड़े धार्मिक स्थल को चेंबर ऑफ कॉमर्स जैसी व्यापारिक संस्था की तर्ज पर चुनावी राजनीति का अखाड़ा बनाने की धृष्टता दिखा रहे हैं।
यह सदस्यगण मंदिर से जुड़े चुनावों को महज परंपरागत संवैधानिक प्रक्रिया न मानते हुए उसे वर्चस्व और रसूख से जोड़कर देख रहे हैं और ऐसा करते हुए यह भूल गए हैं कि मंदिर जैसे धार्मिक स्थल की अपनी कुछ मान मर्यादा भी होती है ।
आखिर इन्होंने मंदिर की सदस्यता क्या राजनीति करने,एक दूसरे को नीचा दिखाने ,धमकी देने, पुलिस थाने में शिकायत आदि करने के लिए ली थी या इसके पीछे मंदिर से जुड़ी धार्मिक गतिविधियों और उससे जुड़े तमाम सद्कार्यों को अंजाम देना इनका उद्देश्य था।
कमोवेश जब मठ मंदिरों में सदस्यों के बीच वर्चस्व की लड़ाई सिर फ़ुटव्वल तक पहुंच जाती है तो पुलिस प्रशासन को मजबूरन हस्तक्षेप करना पड़ता है और तब मंदिर पर प्रशासक तैनात कर दिया जाता है।
अचलेश्वर महादेव मंदिर इसका बड़ा प्रमाण है यहां ट्रस्ट के सदस्यों में लड़ाई झगड़ा इस कदर बढ़ गया कि वहां संपूर्ण गतिविधियां प्रशासक को संचालित करना पड़ रही हैं। किसी भी धार्मिक स्थल के लिए इससे बड़ी शर्मनाक स्थिति कोई नहीं हो सकती ।
सनातनधर्म मंदिर भी उसी दिशा में बढ़ता दिखाई दे रहा है। 10 अगस्त को प्रस्तावित चुनाव से पहले दोनों ग्रुपों में जोरदार तनाव,आरोप प्रत्यारोप,धमकी ,पुलिस में आवेदन,मतदाता सूची पर विवाद जैसे विषयों पर रोजाना बवाल देखा जा रहा है।
चुनाव शांतिपूर्ण हो पाएंगे इसपर सवालिया निशान खड़ा है और यही बात सनातन धर्म मंदिर को भी अचलेश्वर महादेव मंदिर की।दिशा में ले जा सकती है।
इस बारे में सनातन धर्म मंदिर के चुनाव प्रक्रिया पूर्ण कराने की जिम्मेदारी का निर्वहन कर रहे शहर के वरिष्ठ अभिभाषक और समाजसेवी अरविंद दूतावत से शब्दशक्ति न्यूज ने बातचीत की तो उन्होंने स्वीकार किया कि मंदिर के भीतर और मंदिर के बाहर दोनों ही स्थानों पर राजनीति की जा रही है जबकि होना तो यह चाहिए था कि मंदिर में व्याप्त तमाम कमियों को ठीक किया जाता।
उन्होंने एक और आश्चर्यजनक बात बताई कि मंदिर की 2019 के बाद से नई समिति इस कारण अस्तित्व में नहीं आई है क्योंकि चुनाव ही नहीं कराए गए जबकि नियमानुसार 2022 में ही चुनाव हो जाने चाहिए थे।
अब सबसे बड़ी बात यह है कि चुनाव न कराए जाने और वर्तमान समिति के ही काबिज रहने के मामले में क्या निर्धारित संवैधानिक नियमों का पालन किया गया ?
दूसरा बड़ा सवाल यह है कि मंदिर में आने वाले चढ़ावे और इससे जुड़ी अन्य जानकारियों का नियमानुसार खुलासा किया गया या नहीं ?
किसी धार्मिक स्थल विशेषकर मंदिर जैसे स्थान पर सभी बातों को साफगोई से सार्वजनिक करने की जिम्मेदारी का निर्वहन बेहद आवश्यक होता है और यही वह विषय हैं जिनको लेकर विवाद के हालत पैदा होते हैं और प्रशासन को हस्तपछेप करने का मौका मिलता है जैसा कि अचलेश्वर मंदिर में भी देखने को मिला था।
अच्छा होता शहर के सबसे प्रतिष्ठित मंदिर की धार्मिक मर्यादाओं को कायम रखते हुए सभी सदस्य सर्व सहमति से पदाधिकारियों की निर्वाचन प्रक्रिया को पूर्ण करें और धार्मिक कार्यों को बढ़ावा देने के अपने मूल उद्देश्यों हेतु कार्ययोजना तैयार करें।