प्रवीण दुबे
चुनाव में जनता का विश्वास हासिल करना ही सत्ता परिवर्तन का संवैधानिक रास्ता, भीड़तंत्र और हिंसा से सरकार बदलने की सोच लोकतंत्र के लिए चिंताजनक
देश में इन दिनों ‘रिजीम चेंज’ यानी सत्ता व्यवस्था में बदलाव को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं जारी हैं। विपक्ष सवाल उठा रहा है कि रिजीम चेंज की बात से सत्ता पक्ष बेचैन और घबराया हुआ क्यों है? लेकिन सवाल यह भी है कि क्या लोकतंत्र में सत्ता परिवर्तन की मांग और उसे हासिल करने के तरीके के बीच के अंतर को जानबूझकर नजरअंदाज किया जा रहा है? ऐसा प्रतीत होता है कि विपक्ष एक बार फिर इस मुद्दे को लेकर नैरेटिव अर्थात भ्रम की स्थिति पैदा करने का प्रयास कर रहा है।
यह बात किसी से छिपी नहीं है कि विपक्ष का मूल उद्देश्य सत्ता पक्ष को चुनौती देना और सत्ता परिवर्तन के लिए जनता के बीच जाना होता है। लोकतंत्र में विपक्ष की यह भूमिका पूरी तरह स्वाभाविक और आवश्यक है। लेकिन सत्ता परिवर्तन का भी एक निर्धारित संवैधानिक और लोकतांत्रिक तरीका है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इसी संदर्भ में कहा है कि चुनाव में हमें हराइए, जनता का विश्वास हासिल कीजिए और प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठिए। लोकतंत्र की मूल भावना भी यही है कि सरकार का भविष्य जनता तय करे, न कि कोई भीड़ या दबाव समूह।
लेकिन सवाल तब गंभीर हो जाता है, जब लोकतांत्रिक तरीके से सत्ता परिवर्तन की बात करने के बजाय बांग्लादेश और नेपाल जैसे देशों की घटनाओं की तर्ज पर भारत में भी सत्ता परिवर्तन की बातें और धमकियां सामने आने लगें। क्या दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में सरकार बदलने के लिए ऐसी परिस्थितियां पैदा करने की कल्पना की जा सकती है, जिनमें चुनावी प्रक्रिया के बजाय सड़कों पर भीड़ का दबाव निर्णायक बन जाए?
यदि युवाओं को किसी राजनीतिक उद्देश्य के लिए भड़काने, उनके मन में व्यवस्था के प्रति आक्रोश पैदा करने और उन्हें दूसरे देशों की घटनाओं की तर्ज पर सत्ता परिवर्तन के लिए सड़कों पर उतरने का आह्वान किया जाता है, तो ऐसे प्रयासों पर गंभीर विमर्श होना चाहिए। जंतर-मंतर जैसे स्थानों पर विरोध प्रदर्शन करना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन किसी आंदोलन का उद्देश्य यदि संवैधानिक संस्थाओं पर अनुचित दबाव बनाना या निर्वाचित सरकार को गैर-लोकतांत्रिक तरीके से हटाना हो, तो यह निश्चित रूप से चिंता का विषय है।
विदेशी फंडिंग के सहारे युवाओं के दिमाग में जहर भरने अथवा उन्हें देश की संवैधानिक व्यवस्था के विरुद्ध इस्तेमाल करने जैसे आरोप भी अत्यंत गंभीर हैं। ऐसे आरोपों को केवल राजनीतिक बयानबाजी के आधार पर सत्य नहीं माना जा सकता; इनके समर्थन में ठोस प्रमाण आवश्यक हैं। लेकिन यदि किसी भी स्तर पर विदेशी धन का इस्तेमाल भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था को अस्थिर करने के लिए किया जाता है, तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और कानून के अनुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।
इसी संदर्भ में वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण की भूमिका और उनके बयानों को लेकर भी बहस सामने आती रही है। यदि उनके किसी बयान में बांग्लादेश की तर्ज पर भारत में रिजीम चेंज की बात कही गई है, तो उसके वास्तविक संदर्भ और शब्दों को सामने रखकर ही निष्पक्ष मूल्यांकन किया जाना चाहिए। लोकतंत्र में किसी भी व्यक्ति को सरकार की आलोचना करने, आंदोलन करने और सत्ता परिवर्तन की मांग रखने का अधिकार है, लेकिन किसी भी संवैधानिक व्यवस्था को हिंसा या गैर-कानूनी दबाव के जरिए बदलने का समर्थन स्वीकार्य नहीं हो सकता।
प्रशांत भूषण वर्ष 2011 में कश्मीर के मुद्दे पर जनमत संग्रह संबंधी अपनी टिप्पणी को लेकर भी विवादों में रहे थे। उस समय एक सार्वजनिक आयोजन में कुछ लोगों ने उनके साथ मारपीट की और उनके कपड़े तक फाड़ दिए थे। यह घटना भी याद दिलाती है कि राजनीतिक और वैचारिक मतभेदों का जवाब हिंसा से देना किसी भी स्थिति में उचित नहीं है। इसी तरह, अफजल गुरु की फांसी से संबंधित मामले में आधी रात को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई की मांग को लेकर उनकी भूमिका भी सार्वजनिक चर्चा का विषय रही थी। किसी मामले में न्यायिक हस्तक्षेप की मांग करना अपने आप में गैर-कानूनी नहीं है; न्यायिक प्रक्रिया के भीतर उठाए गए कदमों और हिंसा या भीड़ के दबाव के बीच स्पष्ट अंतर समझना जरूरी है।
भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। यहां सरकारें चुनाव के माध्यम से बनती हैं और चुनाव के माध्यम से ही बदली जाती हैं। प्रधानमंत्री हो या विपक्ष का कोई नेता, कोई भी व्यक्ति संविधान से ऊपर नहीं है। सत्ता पक्ष को भी विपक्ष की आलोचना और लोकतांत्रिक विरोध को सहन करना चाहिए, वहीं विपक्ष की जिम्मेदारी है कि वह अपनी राजनीतिक लड़ाई संवैधानिक मर्यादाओं के भीतर लड़े।
भीड़ की ताकत को जनता का जनादेश मान लेना लोकतंत्र की मूल भावना के विपरीत है। किसी आंदोलन में बड़ी संख्या में लोगों का शामिल होना अपने आप में किसी निर्वाचित सरकार को हटाने का संवैधानिक आधार नहीं बन सकता। इसी प्रकार, सुप्रीम कोर्ट सहित संवैधानिक संस्थाओं पर भीड़ के दबाव के जरिए निर्णय बदलवाने की कोशिश न्याय व्यवस्था की स्वतंत्रता के लिए उचित नहीं है। संस्थाओं के फैसलों से असहमति जताने के लिए कानूनी और लोकतांत्रिक रास्ते उपलब्ध हैं।
विपक्ष यदि वास्तव में रिजीम चेंज चाहता है, तो उसके लिए सबसे प्रभावी और वैध रास्ता जनता के बीच जाना, अपना राजनीतिक विकल्प प्रस्तुत करना और चुनाव में बहुमत हासिल करना है। जनता का विश्वास जीतकर सरकार बनाना लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति है। इसके विपरीत, हिंसा, गैर-कानूनी दबाव या असंवैधानिक तरीकों से सत्ता परिवर्तन का सपना देखना देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर कर सकता है।
अंततः सवाल सत्ता परिवर्तन की मांग का नहीं, बल्कि उसके तरीके का है। लोकतंत्र में सरकार बदलने की इच्छा रखना गलत नहीं है, लेकिन उस इच्छा को पूरा करने का अधिकार किसी भीड़, समूह या व्यक्ति को संविधान से ऊपर जाकर नहीं मिल सकता। भारत की राजनीतिक व्यवस्था का भविष्य न सड़कों पर पैदा किए गए दबाव से तय होना चाहिए और न ही हिंसा की धमकियों से, बल्कि जनता के मत और संविधान की मर्यादा से तय होना चाहिए। यही लोकतंत्र की वास्तविक कसौटी है और यही भारत की संवैधानिक व्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत भी है।