इस भयानक युद्ध में सदाशिवराव भाऊ के अतिरिक्त विश्वास राव पेशवा, जनकोजी राव सिंधिया और मराठा तोपखाना के प्रभारी इब्राहिम खान गार्दी बलिदान हुये
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वर्ष 1761 में जनवरी माह का पूरा अंतिम पखवाड़ा हमलावर अहमदशाह अब्दाली की भारत में लूट, सामूहिक नरसंहार और अत्याचार से भरा है । इसी पखवाड़े में पानीपत का तीसरा युद्ध हुआ था । जिसमें मराठों की हार हुई । अब्दाली सामूहिक नरसंहार करके आगे बढ़ा और जनवरी के अंतिम सप्ताह दिल्ली पहुँचा । उसने 25 जनवरी को नगर में प्रवेश किया । पूरा दिन हत्या लूट और महिलाओं के अपहरण का सिलसिला चला ।
भारत के इतिहास में कुछ ऐसी घटनाएं दर्ज हैं जिनके स्मरण मात्र से रोंगटे खड़े हो जाते हैं । पानीपत के तीसरे युद्ध और उसके बाद का समूचा घटनाक्रम ऐसा ही है । अपनी जीत के बाद हमलावर अहमदशाह अब्दाली ने पंजाब से लेकर दिल्ली तक लाशों के ढेर लगा दिये थे । अब्दाली का यह आक्रमण 1760 में हुआ था । अब्दाली के भारत पर कुल छै आक्रमण हुये । लेकिन इस बार उसने क्रूरता के सारे रिकार्ड तोड़ दिये थे । वह अक्टूबर 1760 में गजनी से चला था और नवम्बर तक पंजाब आ गया था । उसने मराठों को घेरने के लिये पानीपत में मोर्चा बंदी कर ली थी । भारत के दो शासक एक रूहेलखंड का नजीबुद्दौला और दूसरे अवध के नबाब सिराजुद्दीन उसकी मदद कर रहे थे । इस युद्ध की पृष्टभूमि में इतिहास की दो घटनाएँ थीं। एक घटना 1757 की थी । अब्दाली का आक्रमण हुआ, उसने दिल्ली पर अधिकार कर लिया था । लेकिन मराठों की मार से भागा । इस युद्ध में रोहेलों ने मराठों की सहायता की थी । युद्घ के बाद दिल्ली की सुरक्षा व्यवस्था मराठों के पूरी तरस नियंत्रण में थी । लेकिन आगे चल कर रुहेलों ने राजस्व रोक दिया था । लेकिन मराठे अनुशासन प्रिय थे । उनकी दृष्टि में राजस्व रोकना विद्रोह की सीमा में था । दत्ताजी शिन्दे के नेतृत्व में मराठ सेना ने सख्ती से राजस्व वसूला था । इससे रुहेले बाहरी तौर पर तो झुके पर भीतरी तौर पर षड्यंत्र करने लगे । नजब खाँरुहेले ने अब्दाली से गुप्त संधि की और दत्ताजी को दिल्ली बुलाया । धोखे से हत्या करके दिल्ली अपने आधीन कर ली । दिल्ली पर पुनः अधिकार पाने के लिये सदाशिव भाऊ के नेतृत्व मराठा सेना पूना से रवाना हुई और पुनः दिल्ली को अपने नियंत्रण में ले ली । यह बात एक धर्मगुरु शाह वलीउल्लाह को पसंद नहीं थी वह मराठों को काफिर कहता था और दिल्ली को मराठों से मुक्त चाहता था । उसने मराठों से दिल्ली की मुक्ति केलिये अब्दाली को पत्र लिखा । (वलीउल्लाह के पत्र की प्रति रामपुर के पांडुलिपि संग्रहालय में उपलब्ध है )। यह जानकारी अवध के नबाब सिराजुद्दौला और रूहेलखंड के नबाब नजीबुद्दौला को भी हुई । अंततः मराठा शक्ति को समाप्त करने की रणनीति बनी । दुर्योग से उन दिनों मराठा साम्राज्य के भीतर अनेक आंतरिक मतभेद उभरे इससे पेशवा का ध्यान दिल्ली से कम हुआ । सूचना तंत्र भी कमजोर हुआ । इसका पूरा लाभ उठाकर नजब खाँ रुहेले ने अवध के नबाब तथा दिल्ली के कुछ मुगल सैनिकों से तालमेल बिठाकर अब्दाली को आक्रमण केलिये आमंत्रण भेज दिया । अब्दाली को जब ये आमंत्रण मिले तो उसने युद्ध की तैयारी आरंभ कर दी । इसकी खबर पेशवा को लगी तो मराठा सेना भी तैयार होने लगी। मराठा साम्राज्य की कमान पेशवा बालाजी बाजीराव के हाथ में थी । उन्होंने सदाशिव राव भाऊ के नेतृत्व में मराठा सेना रवाना की । इस सेना में पेशवा का पुत्र विश्वासराव भी साथ था । मराठों की फौज पूरे वेग से आगे बढ़ी और दिल्ली पहुँची । मराठों ने रुहेलों से दिल्ली को मुक्त किया, दिल्ली की सुरक्षा व्यवस्था बनाई । और पंजाब की ओर बढ़े । इस बार मराठा सेना को स्थानीय शासकों की सहायता कम थी । इससे उन्हें पूरे रास्ते में अपनी चौकियाँ बनाना पड़ीं । रास्ते में व्यवस्था बनाने के लिये अपने सैनिक तैनात करने के कारण उनके सैनिकों की संख्या कम होती गयी । मराठा सेना की शरण में वे हजारों तीर्थ यात्री स्त्री पुरुष भी आ गये, जो तीर्थ के लिये निकले थे लेकिन आक्रमणों के कारण यहाँ वहाँ छुप गये थे । मराठा सेना ने उन्हें अपना संरक्षण दिया और आगे बढ़ी । इस व्यवस्था में भी सैनिक लगे। इतिहास कार मानते हैं कि मराठा सेना में बड़ी संख्या में भेदिये थे जो अब्दाली को मराठा सेना की सभी गतिविधियों की जानकारी दे रहे थे।
अब्दाली मराठों से पहले पानीपत पहुँच गया था । उसने अपनी मोर्चाबंदी पहले कर ली थी । मराठा सेना भी पानीपत पहुँची दिसम्बर 1760 के प्रथम सप्ताह में दोनों सेनाओं का आमना सामना हुआ । दोनों के बीच यह घेराबंदी लगभग डेढ़ माह चली। आमने सामने के युद्ध को लंबा खींचना अब्दाली की योजना थी । इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता कि मराठा सेना में कुछ विश्वासघाती महत्वपूर्ण पद पर होंगे जिन्होंने सदाशिव भाऊ को सीधे युद्ध से रोका होगा । इस मोर्चा बंदी के कुछ दिनों बाद मराठा सेना की रसद रुकने लगी । रोहिलाओं ने न केवल मराठों को रसद मिलने का रास्ता रोका अपितु वे मराठा चौकियों पर छापामार हमले करने लगे । इससे मराठा सेना का पूरा तंत्र ध्वस्त हो गया । इस घेराबंदी से मराठों को अतिरिक्त सैन्य सहायता या रसद मिलना तो दूर सूचनाएँ मिलना भी बंद हो गयीं थीं । भोजन की गंभीर समस्या उत्पन्न हो जाने के बाद मराठों ने सीधा युद्ध करने का निर्णय लिया । मराठा सेना मैदान में आई और भयानक युद्ध छिड़ गया । यह तिथि 14 जनवरी 1761 थी। मराठा सेना कम थी । फिर भी मराठे वीरता से लड़े और भारी पड़े । उन्होंने अब्दाली की सेना का राशन छीन लिया । सदाशिव भाऊ हाथी पर सवार होकर और विश्वास राव घोड़े पर युद्ध कर रहे थे । तभी बंदूक की एक गोली विश्वास राव को लगी । यह गोली शत्रु सेना से नहीं आई थी बल्कि मराठा सेना के भीतर मौजूद अब्दाली के किसी भेदिये ने चलाई थी । विश्वासराव को गिरते हुये सदाशिव राव भाऊ ने देख लिया था । वे तुरन्त हाथी से उतरे और विश्वासराव का शव ढूँढने लगे । जब मराठा सेना ने अपने सेनापति का हाथी खाली देखा उनमें घबराहट हुई और अफरा तफरी मच गयी । मौके का फायदा अब्दाली ने उठाया उसने ऐलान करा दिया कि सदाशिव भाऊ का सिर काट लिया गया है । इससे हमलावर सैनिकों का जोश बढ़ा और मराठा सेना में भगदड़ शुरू हुई । इसी भगदड़ में किसी ने सदाशिव राव भाऊ का भी सिर काट लिया । यह घटना भी मराठा सेना के भीतर किसी विश्वासघाती का काम था । अब्दाली ने यह ऐलान भी कराया कि जो हथियार डाल देगा उसकी जान बख़्शी जायेगी । मराठा सेना में जो भेदिये थे उन्होंने मराठा सैनिकों को हथियार डालने केलिये प्रेरित किया । मराठा सैनिक घेर लिये गये बड़ी मुश्किल से होल्कर बीस महिलाओं को सुरक्षित निकाल पाये । दोपहर तीन बजे तक यह सब हो गया । इसके बाद महिलाओं को अलग करके पुरूषो का नर संहार हुआ । जो मराठा सैनिक पकड़े गये थे उनमें किसी को जीवित न छोड़ा गया। आसपास के सभी गाँवों में लूट और हत्याओं का दौर चला । अनुमान है कि एक लाख से अधिक लोगों की हत्या की गई । इनमें लगभग चालीस हजार तीर्थयात्री थे । यह मराठा सेना की सबसे बड़ी क्षति थी । जिन महिलाओं को बंदी बनाया गया था उनमें से कुछ को दर्दनाक मौत दी और कुछ को गुलामों के बाजार में बेचने केलिये भेज दिया गया ।
पानीपत में खून की नदियाँ बहा कर और कटे हुये सिरों का ढेर लगाकर अहमदशाह दिल्ली रवाना हुआ । वह 24 जनवरी को दिल्ली पहुँचा। दिल्ली की सुरक्षा व्यवस्था मराठा सैनिकों के हाथ में थी। दिल्ली में तैनात सैनिकों ने रोकने का प्रयास किया लेकिन दोपहर से अधिक मुकाबला न चल सका पूरे नगर में अब्दाली और रुहेले सैनिक फैल गये । सभी मराठा सैनिक और उनके समर्थक बंदी बना लिये गये । शाम तक यह सब हो गया ।अब्दाली ने अगले दिन 25 जनवरी को दिल्ली में प्रवेश किया । उसके सैनिकों ने दिल्ली के सुरक्षा कर्मियों का पकड़कर मारना आरंभ किया 25 जनवरी को पूरे दिन किले के भीतर नर संहार हुआ । मराठों द्वारा नियुक्त एक भी सैनिक जीवित न छोड़ा गया। पूरे नगर की लूटपाट करके अब्दाली बादशाह के महल में घुसा । बादशाह को अपमानित किया और खजाने पर अधिकार कर लिया । दिल्ली में अब्दाली का यह आतंक फरवरी 1761 तक चला । इस आतंक का वर्णन उस समय के मशहूर शायर मीर तकी मीर ने किया है । यह विवरण ‘जिक्र-ए-मीर’ में सुरक्षित हैं। जिसमें कहा गया है- “बंदा अपनी इज्जत थामे शहर में बैठा रहा। शाम के बाद मुनादी हुई कि बादशाह ने अमान दे दी है। रिआया को चाहिए कि परेशान न हो मगर जब घड़ी भर रात गुजरी तो गारतगरों ने जुल्मओ-सितम ढाना शुरू किए। शहर को आग लगा दी। सुबह, जो कि कयामत की सुबह थी, तमाम शाही फौज और रोहिल्ले टूट पड़े और कत्ल व गारत में लग गए। मैं कि फकीर था अब और ज्यादा दरिद्र हो गया, सड़क के किनारे जो मकान था वह भी ढहकर बराबर हो गया”।
इस भयानक युद्ध में सदाशिवराव भाऊ के अतिरिक्त विश्वास राव पेशवा, जनकोजी राव सिंधिया और मराठा तोपखाना के प्रभारी इब्राहिम खान गार्दी भी बलिदान हुये । इस युद्ध में मराठा सेना को जो क्षति हुई उसकी भरपाई फिर कभी न हो सकी ।