प्रवीण दुबे
ग्वालियर चंबल अंचल में कांग्रेस के महामंथन और उसमें प्रदर्शित की गई एकता से फिलहाल यह उम्मीद तो जागी है कि विपक्ष अभी जिंदा है और सत्ताधारी दल को चुनौती देने की योजना पर काम जारी है , स्वस्थ लोकतंत्र के लिए यह अच्छे संकेत कहे जा सकते हैं ऐसा इसलिए क्यों कि बिना विपक्ष के सत्ता के बेलगाम होने का खतरा बना रहता है। चूंकि मध्यप्रदेश में कांग्रेस के अलावा कोई अन्य विपक्षी दल दिखाई नहीं देता है अतः सत्ता पर लगाम कसने के लिए उसका दमखम दिखाते रहना बहुत जरूरी है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या समुद्र जैसी विशालता लिए सामने खड़ी सत्तारूढ भाजपा के सामने केवल योजना बनाना,मंथन करना ,एकता प्रदर्शित करना या वोटों का गणित समझाकर भाषण देने से कांग्रेस का हेतु सिध्द हो जाएगा ? यदि इसमें कांग्रेस को सफलता मिल भी जाती है तो क्या उसके शीर्ष नेतृत्व में इतनी क्षमता बची है कि वह अपनी कमजोरियों पर विजय प्राप्त कर पाएंगे ? अर्थात भाजपा की राजनीतिक घातों से अपने घर को सुरक्षित रख पाएंगे ? कांग्रेस के नीति निर्धारकों को पिछले विधानसभा चुनाव में मिली सफलता 18 महीने का कार्यकाल और उसके बाद भाजपा की राजनीतिक चालों व कांग्रेस के भीतर से मिले प्रतिसाद का फायदा उठाकर उसे सत्ताच्युत करने की बात को नहीं भूलना चाहिए । उस समय भी कमोबेश यही स्थिति थी दिग्विजयसिंह भी थे,कमलनाथ थे ,गोविंद सिंह भी ताल ठोकने में पीछे नहीं थे बावजूद इसके भाजपा ने कमजोर कड़ी पर वार करके जमा जमाया खेल बिगाड़कर सत्ता हथिया ली और कांग्रेस हाथ मलती रह गई। आज एकबार फिर कांग्रेस ने खुद को एकजुट करने की कवायद शुरू कर दी है

लेकिन क्या कांग्रेस शीर्ष नेतृत्व ने मध्यप्रदेश में अपनी पुरानी असफलता के कारणों पर मंथन किया है ? मध्यप्रदेश में कांग्रेस के भीतर आज भी तमाम कमजोर कड़ियां मौजूद हैं। राजनीतिक विश्लेषकों की मानी जाए तो कांग्रेस शीर्ष नेतृत्व ने मध्यप्रदेश में एकबार फिर से पुरानी बोतल में नई शराब का प्रयोग दोहराने की गलती की है,पिछले कुछ दिनों से दिग्विजयसिंह पुनः फ्रंट पर सम्मान पाते और अपनी ओर से मुखर होते नजर आ रहे हैं पार्टी शीर्ष नेतृत्व को न जाने क्यों यह समझ नहीं आता कि अब देश की राजनीति करवट ले चुकी है दिग्विजयसिंह जैसे मुखर हिंदुत्व विरोधी और एक वर्ग विशेष के पक्ष में बयानबाजी करने वाले नेता को जनता पसंद नहीं करती बावजूद इसके उन्हें फ्रंट पर लाना आखिर किस बात का संकेत है ? आखिर मध्यप्रदेश की राजनीति में हाशिये पर पहुंचा दिए गए तमाम जन नेता मौजूद हैं उन्हें फ्रंट पर क्यों नही लाया जाता ? उन्हें आखिर उनके क्षेत्र तक ही क्यों समेट दिया गया है ? आखिर कहां हैं कांतिलाल भूरिया ? उन्हें कमलनाथ सरकार के समय मंत्री पद से वंचित रखा गया था। वे केंद्रीय मंत्री तक रह चुके हैं लेकिन कमलनाथ सरकार ने उन्हें मंत्री लायक नहीं समझा था। आज भी वे अनदेखी का शिकार हैं। विंध्य के दबंग नेता पूर्व नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ने कुछ समय पहले ही अपनी पीड़ा एक मंच पर बयां की है। उन्होंने सतना में एक नेता की ओर इशारा करते हुए कह दिया था कि आप बोल दीजिए कि हमें भी कुछ जिम्मेदारी दे दीजिए तो सक्रिय हो जाएंगे। वहीं, प्रदेश कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष अरुण यादव भी उपचुनाव में टिकट को लेकर कुछ समय तक नाराज रहे और बाद में कुछ मीटिंग में भी वह नहीं पहुंचे। कांग्रेस में वरिष्ठ विधायक केपी सिंह कमलनाथ सरकार में मंत्री नहीं बनाए जाने के समय से नाराज चल रहे हैं और सरकार गिरने के बाद से वे सक्रिय दिखाई नहीं दे रहे हैं। सरकार गिरने के बाद नेता प्रतिपक्ष के प्रबल दावेदार माने जाने के बाद भी अब तक उससे वंचित डॉ. गोविंद सिंह को कमेटी में प्रमुख हिस्सा बनाकर खुश करने का प्रयास किया गया है। दिग्विजय सिंह के पुत्र जयवर्धन सिंह, दिग्विजय समर्थक पीसी शर्मा, कमलनाथ समर्थक सुखदेव पांसे, तरुण भनोत, अरुण यादव के भाई सचिन यादव और हर्ष यादव जैसे पूर्व मंत्री भी अब अनदेखी से कुंठाग्रस्त हैं इन्हें हाल ही में राजनीतिक मामलों के लिए बनाई गई समिति में स्थान तक नहीं दिया गया जबकि कमलनाथ सरकार में इन्हें मंत्रीपद से सुशोभित किया गया था। यह तो सिर्फ बानगी भर है कांग्रेस के भीतर बहुत कुछ ऐसा भरा पड़ा है जिसपर मंथन बेहद आवश्यक है।

भाजपा जैसे प्रबल राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी के खिलाफ कांग्रेस को पहले अपने भीतर चौतरफा किले बंदी करनी होगी और उसके बाद जनता का विश्वास हासिल करने के लिए उसके सुख दुख में धरातल स्तर पर काम करना होगा। यह तभी सम्भव है जब यूथ कांग्रेस, महिला कांग्रेस, सेवादल जैसे तमाम सहयोगी संगठन मजबूत हों फिलहाल ये कहीं दिखाई नहीं देते। कांग्रेस नेतृत्व को नहीं भूलना चाहिए कि केवल गाल बजाने से काम नहीं चलने वाला जमीनी स्तर पर संगठन को मजबूत कर काम करने से ही परिणाम सामने आएगा अन्यथा सत्ता मिल भी गई फिर भी उसे कायम रख पाना मुश्किल होगा।